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रूस-यूक्रेन युद्ध ने फीकी की दरी कारोबार की चमक
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खैराबाद क्षेत्र में कनायतपुर में दरी फैक्ट्री में काम करते वर्कर। - संवाद
- फोटो : SITAPUR
सीतापुर/खैराबाद। सीतापुर का दरी कारोबार भारत ही नहीं विदेशों तक अपनी चमक बिखेरता है। एक जिला एक उत्पाद में चयनित यहां के दरी उद्योग की चमक इन दिनों फीकी पड़ गई है। दरी कारोबार मंदी के दौर से गुजर रहा है। इसकी वजह यूरोपीय देशों से मिलने वाले आर्डर पर ब्रेक लग जाना है। जिले के आठ एक्सपोर्टर और 40 इकाइयां आर्थिक तंगी से जूझ रही हैं। दो लाख बुनकरों के सामने रोजी रोटी का संकट गहराने लगा है।
जिले में बनने वाली दरियों की विदेशों में काफी मांग है। लिहाजा, बड़े पैमाने पर यहां की दरियां दूसरे देशों में निर्यात की जाती हैं। ओडीओपी में चयनित होने पर दरी कारोबार के रफ्तार भरने की उम्मीद जगी थी। इस महत्वाकांक्षी योजना में शामिल होने पर भी दरी कारोबार को अब तक कोई खास फायदा नहीं मिल सका है। पहले कोरोना काल ने दरी कारोबारियों और बुनकरों की माली हालत खराब कर दी।
इसके बाद यूक्रेन-रुस के युद्ध ने दरी कारोबार की चमक पर ग्रहण लगा दिया है। इस युद्ध से लगभग 40 यूरोपीय देश प्रभावित हुए हैं। इनमें से जर्मनी, फ्रांस, इटली, पुर्तगाल, पोलैंड, यूक्रेन, स्पेन आदि से यहां दरियों का बड़े पैमाने पर आर्डर मिलता था। अब आर्डर मिलने बंद हो गए हैं। इसका सीधा असर दरी कारोबार पर पड़ा है।
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जिले में लगभग आठ एक्सपोर्टर, 40 इकाइयां और दो लाख के आसपास बुनकर हैं। यहां की दरियां नक्काशीदार डिजाइनों के लिए विदेशों तक प्रसिद्ध हैं। चालू वित्तीय वर्ष शुरू होते ही दरी में तेजी से गिरावट आयी। वर्तमान में दरी कारोबार महज 25 प्रतिशत ही रह गया है। हालात यह हैं, कि दरी कारोबारी कंपनी के खर्चे भी नहीं निकाल पा रहे हैं। कारोबार में मंदी से सरकार के खाते में इससे पहुंचने वाले जीएसटी संग्रह पर भी खासा असर देखने को मिला है।
बुनकर दिहाड़ी मजदूरी को विवश
जिले में दरी का कारोबार खैराबाद, ऐलिया, हरगांव, लहरपुर, सकरन, बिसवां, परसेंडी, जहांगीराबाद आदि क्षेत्रों में होता है। दरी कारोबार पर मंदी से बुनकरों व कामगारों के हाथ खाली हो गए हैं। काफी संख्या में बुनकरों को रोजगार की आस में गैर राज्यों को पलायन करना पड़ रहा है। काम बंद होने से कई बुनकर दूसरा रोजगार करने लगे हैं। कोई कपड़े की फेरी कर रहा है तो कोई दिहाड़ी मजदूरी करने को विवश है।
युद्ध ने बिगाड़ा ताना बाना
यूक्रेन और रुस के बीच युद्ध ने दरी उद्योग का तानाबाना ही बिगाड़ दिया है। अगर इसे रोका नहीं गया तो तो हालात और भी खराब हो सकते हैं। यूरोप में सबसे ज्यादा सीतापुर की दरियों की मांग थी। युद्ध की वजह से समूचे यूरोपीय देशों के प्रभावित होने से कारोबार मंदी की मार झेल रहा है। जर्मनी में 9 जनवरी 2023 से 14 जनवरी तक मेला है। वहां हमने बीस लाख रुपये खर्च करके स्टाल बुक कराया है। डर भी लग रहा है कि कहीं यह पैसा भी न डूब जाए क्योंकि भारत में हो रहे मेले भी सफल नही हो रहे हैं।
- सुनील मिश्र, एक्सपोर्टर
कारोबार पर महंगाई की मार
दरी कारोबार पर महंगाई की मार देश से लेकर विदेशों तक है। ऐसे मे दरी उद्योग पर इसका सीधा असर देखा जा रहा है। यूरोप मे तो हालात यह हैं कि अपनी जीविका चलाने के लिए लोगो को संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में शौख व सजावट की चीजों को कौन खरीदेगा। कंटेनर से लेकर मिटीरियरल यार्न में इतनी ज्यादा महंगाई हैं कि दाम सुनकर ग्राहक जवाब ही नहीं देता है।
- प्रदीप दीक्षित, एक्सपोर्टर
70 प्रतिशत की आई गिरावट
हैंडलूम दरी एक्सपोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष इश्तियाक हुसैन उर्फ नब्बन का कहना है कि दरी के कारोबार में 70 प्रतिशत के आसपास गिरावट देखी जा रही है। हालात नहीं सुधरे तो लाखों बुनकरों को अपनी जीविका के लिए भटकना पड़ेगा।
काम न मिलने से बंद हो गए कारखाने
मजलिसपुर निवासी बुनकर अतुल कहते हैं कि तीन माह से काम नहीं मिला तो कारखाने बंद पड़े हैं। दूसरे काम तलाश कर जीविका चलानी पड़ रही है। इस समय परिवार पालने के लिए दरी की जगह चप्पलें बनाकर फेरी करने को मजबूर हैं। बुनकर राजेश भी काम के अभाव में कपड़े की फेरी लगाकर जीविका चला रहे हैं।
एक्सपोर्टरों को दी जाएगी सब्सिडी
उपायुक्त उद्योग आशीष गुप्ता ने बताया कि ओडीओपी के तहत विपणन प्रोत्साहन योजना चलाई जा रही है। इसमें अंतरराष्ट्रीय मेलों का आयोजन कराया जा रहा है। कारोबार को बढ़ावा देने के लिए मेले में स्टॉल लगाने वाले एक्सपोर्टरों को सब्सिडी दी जाएगी। छोटे-छोटे मेलों में भी स्टॉल लगाने पर सब्सिडी दी जा रही है। एक निर्यातक को साल में दो बार मौका मिलेगा। बिसवां में कॉमन फैसलिटी सेंटर भी शुरू किया गया है। जहां कच्चा माल उपलब्ध है। बुनकरों को दूसरा व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रशिक्षण व टूलकिट प्रदान की जाती है। इसके लिए उन्हें उद्योग केन्द्र में आवेदन करना होगा।
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जिले में बनने वाली दरियों की विदेशों में काफी मांग है। लिहाजा, बड़े पैमाने पर यहां की दरियां दूसरे देशों में निर्यात की जाती हैं। ओडीओपी में चयनित होने पर दरी कारोबार के रफ्तार भरने की उम्मीद जगी थी। इस महत्वाकांक्षी योजना में शामिल होने पर भी दरी कारोबार को अब तक कोई खास फायदा नहीं मिल सका है। पहले कोरोना काल ने दरी कारोबारियों और बुनकरों की माली हालत खराब कर दी।
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इसके बाद यूक्रेन-रुस के युद्ध ने दरी कारोबार की चमक पर ग्रहण लगा दिया है। इस युद्ध से लगभग 40 यूरोपीय देश प्रभावित हुए हैं। इनमें से जर्मनी, फ्रांस, इटली, पुर्तगाल, पोलैंड, यूक्रेन, स्पेन आदि से यहां दरियों का बड़े पैमाने पर आर्डर मिलता था। अब आर्डर मिलने बंद हो गए हैं। इसका सीधा असर दरी कारोबार पर पड़ा है।
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जिले में लगभग आठ एक्सपोर्टर, 40 इकाइयां और दो लाख के आसपास बुनकर हैं। यहां की दरियां नक्काशीदार डिजाइनों के लिए विदेशों तक प्रसिद्ध हैं। चालू वित्तीय वर्ष शुरू होते ही दरी में तेजी से गिरावट आयी। वर्तमान में दरी कारोबार महज 25 प्रतिशत ही रह गया है। हालात यह हैं, कि दरी कारोबारी कंपनी के खर्चे भी नहीं निकाल पा रहे हैं। कारोबार में मंदी से सरकार के खाते में इससे पहुंचने वाले जीएसटी संग्रह पर भी खासा असर देखने को मिला है।
बुनकर दिहाड़ी मजदूरी को विवश
जिले में दरी का कारोबार खैराबाद, ऐलिया, हरगांव, लहरपुर, सकरन, बिसवां, परसेंडी, जहांगीराबाद आदि क्षेत्रों में होता है। दरी कारोबार पर मंदी से बुनकरों व कामगारों के हाथ खाली हो गए हैं। काफी संख्या में बुनकरों को रोजगार की आस में गैर राज्यों को पलायन करना पड़ रहा है। काम बंद होने से कई बुनकर दूसरा रोजगार करने लगे हैं। कोई कपड़े की फेरी कर रहा है तो कोई दिहाड़ी मजदूरी करने को विवश है।
युद्ध ने बिगाड़ा ताना बाना
यूक्रेन और रुस के बीच युद्ध ने दरी उद्योग का तानाबाना ही बिगाड़ दिया है। अगर इसे रोका नहीं गया तो तो हालात और भी खराब हो सकते हैं। यूरोप में सबसे ज्यादा सीतापुर की दरियों की मांग थी। युद्ध की वजह से समूचे यूरोपीय देशों के प्रभावित होने से कारोबार मंदी की मार झेल रहा है। जर्मनी में 9 जनवरी 2023 से 14 जनवरी तक मेला है। वहां हमने बीस लाख रुपये खर्च करके स्टाल बुक कराया है। डर भी लग रहा है कि कहीं यह पैसा भी न डूब जाए क्योंकि भारत में हो रहे मेले भी सफल नही हो रहे हैं।
- सुनील मिश्र, एक्सपोर्टर
कारोबार पर महंगाई की मार
दरी कारोबार पर महंगाई की मार देश से लेकर विदेशों तक है। ऐसे मे दरी उद्योग पर इसका सीधा असर देखा जा रहा है। यूरोप मे तो हालात यह हैं कि अपनी जीविका चलाने के लिए लोगो को संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में शौख व सजावट की चीजों को कौन खरीदेगा। कंटेनर से लेकर मिटीरियरल यार्न में इतनी ज्यादा महंगाई हैं कि दाम सुनकर ग्राहक जवाब ही नहीं देता है।
- प्रदीप दीक्षित, एक्सपोर्टर
70 प्रतिशत की आई गिरावट
हैंडलूम दरी एक्सपोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष इश्तियाक हुसैन उर्फ नब्बन का कहना है कि दरी के कारोबार में 70 प्रतिशत के आसपास गिरावट देखी जा रही है। हालात नहीं सुधरे तो लाखों बुनकरों को अपनी जीविका के लिए भटकना पड़ेगा।
काम न मिलने से बंद हो गए कारखाने
मजलिसपुर निवासी बुनकर अतुल कहते हैं कि तीन माह से काम नहीं मिला तो कारखाने बंद पड़े हैं। दूसरे काम तलाश कर जीविका चलानी पड़ रही है। इस समय परिवार पालने के लिए दरी की जगह चप्पलें बनाकर फेरी करने को मजबूर हैं। बुनकर राजेश भी काम के अभाव में कपड़े की फेरी लगाकर जीविका चला रहे हैं।
एक्सपोर्टरों को दी जाएगी सब्सिडी
उपायुक्त उद्योग आशीष गुप्ता ने बताया कि ओडीओपी के तहत विपणन प्रोत्साहन योजना चलाई जा रही है। इसमें अंतरराष्ट्रीय मेलों का आयोजन कराया जा रहा है। कारोबार को बढ़ावा देने के लिए मेले में स्टॉल लगाने वाले एक्सपोर्टरों को सब्सिडी दी जाएगी। छोटे-छोटे मेलों में भी स्टॉल लगाने पर सब्सिडी दी जा रही है। एक निर्यातक को साल में दो बार मौका मिलेगा। बिसवां में कॉमन फैसलिटी सेंटर भी शुरू किया गया है। जहां कच्चा माल उपलब्ध है। बुनकरों को दूसरा व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रशिक्षण व टूलकिट प्रदान की जाती है। इसके लिए उन्हें उद्योग केन्द्र में आवेदन करना होगा।