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तराई की गंगा को है भागीरथ की तलाश

Sat, 04 Jun 2016 10:57 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर Updated Sat, 04 Jun 2016 10:57 PM IST
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The river valley is looking Bhagirath
बूढ़ी राप्ती नदी में अब इतना पानी भी नहीं की जानवर नहा सके। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
कभी जिले में कला, संस्कृति, कृषि, व्यापार, रोजगार का आधार रही नदियां अब खुद के उद्धार के लिए जूझ रही हैं। तराई की गंगा के उपनाम से मशहूर राप्ती को भगीरथ की तलाश है तो बूढ़ी राप्ती, बानगंगा और कूड़ा भी उद्धारक की बाट जोह रही हैं। नदियों के साथ ही तटों पर विकसित हुई पुरातन सभ्यता-संस्कृति की पहचान भी सिकुड़ती जा रही है।
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राप्ती, बूढ़ी राप्ती, बानगंगा, कूड़ा, आमी सहित आधा दर्जन नदी और इतने ही पहाड़ी नालों से घिरे जिले को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने में नदियों का अहम योगदान रहा है। गजट जैसे सरकारी दस्तावेजों में भी जिले के 170 किमी लंबाई में बहने वाली राप्ती के लंबे समय तक नेपाल से बंगाल तक के व्यापार का अहम जरिया होने का उल्लेख है।
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बुजुर्गों की मानें तो बंगाल से आने वाले जूट, मसाले, चाय, मिट्टी का तेल, सीड़ा जैसे सामानों से लदे व्यावसायिक जहाज राप्ती की धारा पकड़कर ही नेपाल तक आते-जाते थे। तब बिस्कोहर, शोहरतगढ़, डुमरियागंज और उसका इस व्यापार का बड़ा केंद्र होता था।
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राप्ती तट पर स्थित बिस्कोहर कस्बे में निर्मित 365 मंदिर और कुएं भी इस व्यापारिक हब की पहचान को स्पष्ट करते हैं। अंग्रेजों ने उसका में क्षेत्र का सबसे बड़ा मालगोदाम भी बनवाया। नदियों की ही देन थी कि काला नमक चावल, गुड़ के लिए यह क्षेत्र देश-विदेश में मशहूर हो सका।
बिस्कोहर की नृत्य कला को दूर-दूर तक पहचान मिली। नदी पर व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही के कारण ही राप्ती व उसकी सहायक बूढ़ी राप्ती व बानगंगा के किनारे डुमरियागंज, बांसी, उसका, शोहरतगढ़ जैसे नगर विकसित हुए।
स्नान-पर्व पर राप्ती तट पर लगने वाले पूर्णिमा, अमावस्या और माघ मेलों की परंपरा को लोग आज तक नहीं भूल पाए हैं। जिले की मिट्टी को उपजाऊ बनाने में इन नदियों का अहम रोल रहा है। गौरवशाली अतीत वाली यह नदियां अब पहचान खोती जा रही है।

अतिक्रमण और उपेक्षा से नदियों के सिकुडने से इस पर निर्भर न सिर्फ व्यापार खत्म हो गया है, बल्कि नगरों की ऐतिहासिक पहचान भी मिट रही है। इसे संजोने के लिए नदियों को संजोने की जरूरत है। पानी से समृद्ध होने पर ही नदियों के साथ क्षेत्र खुशहाल होगा।
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