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Siddharthnagar News: जटायु को रास आई तराई की आबो-हवा... हिमालय की तलहटी बना पसंदीदा ठिकाना

Sun, 04 Jan 2026 12:01 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर Updated Sun, 04 Jan 2026 12:01 AM IST
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Siddharthnagar News: Jatayu liked the climate of the Terai region... the foothills of the Himalayas became his favorite destination
मिठवल क्षेत्र के सिकटा गांव में पोखरे के पास घायल अवस्था में गिद्ध। संवाद
सिद्धार्थनगर। पूर्वी एशिया, चीन, अफगानिस्तान जैसे उच्च पर्वतीय क्षेत्र में पाए जाने वाले दुर्लभ प्रजाति के गिद्ध का बीमार हालत में मिलना भले ही फौरी समस्या हो, लेकिन तराई क्षेत्र के वन्यजीव और पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह एक सुखद खबर है।
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कभी विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकीं दुर्लभ प्रजातियां स्लेंडर-बिल्ड (पतली चोंच वाला गिद्ध) और व्हाइट-रंप्ड (सफेद पूंछ वाला गिद्ध) की लगातार आमद ने संकेत दे दिया है कि यहां की आबोहवा उन्हें खूब रास आ रही है। हिमालय की तलहटी में नेपाल से सटा इलाका, जटायु का पसंदीदा ठिकाना बनकर उभर रहा है।
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डीएफओ नीला एम. का कहना है गिद्धों के संरक्षण की पहल अब रंग लाने लगी है। तराई बेल्ट देश का सबसे भरोसेमंद वर्चुअल वल्चर हैबिटैट बनता जा रहा है। हालांकि, विकास की रफ्तार और आधुनिक खेती के साइड इफेक्ट अब भी इनके अस्तित्व के लिए चुनौती बने हुए हैं।
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हालिया सर्वेक्षणों के मुताबिक सिद्धार्थनगर के साथ ही श्रावस्ती, महाराजगंज और लखीमपुर खीरी समेत हिमालय की तलहटी वाले क्षेत्रों में गिद्धों की नियमित मौजूदगी दर्ज की जा रही है।
नेपाल के तराई क्षेत्रों में व्हाइट-रंप्ड गिद्धों की कॉलोनियां बीते एक दशक से स्थिर हैं, जिसका सीधा असर सीमा से सटे भारतीय इलाकों में भी दिख रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि खुले जंगल, पर्याप्त भोजन और अनुकूल जलवायु ने इस क्षेत्र को गिद्धों के लिए सुरक्षित आश्रय बना दिया है।
भारत की ‘एक्शन प्लान फॉर वल्चर कंजर्वेशन 2020-2025’ को आगे बढ़ाते हुए 2026 में सैटेलाइट टैगिंग, सामुदायिक जागरूकता और सीमा-पार सहयोग को और मजबूत करने की तैयारी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन साधा गया तो तराई क्षेत्र आने वाले वर्षों में गिद्धों का सबसे सुरक्षित और स्थायी ठिकाना बन सकता है।

30 हजार वर्ग किमी क्षेत्र को गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र के रूप में किया जा रहा विकसित : त्तराखंड और नेपाल के बीच कॉर्बेट से कतर्नियाघाट तक फैले करीब 30 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसी कड़ी में महाराजगंज (फरेंदा) में दुनिया का पहला एशियाई राजा गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र स्थापित किया गया है। तराई के गांवों में गिद्ध रेस्तरां भी संचालित हो रहे हैं, जहां डाइक्लोफेनाक मुक्त मांस उपलब्ध कराकर सुरक्षित भोजन सुनिश्चित किया जा रहा है। संवाद
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