{"_id":"62b4a60b9a57d81141242515","slug":"refer-patients-to-get-rid-of-written-studies-siddharthnagar-news-gkp4413878153","type":"story","status":"publish","title_hn":"लिखा पढ़ी से मुक्ति के लिए मरीजों को कर देते हैं रेफर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लिखा पढ़ी से मुक्ति के लिए मरीजों को कर देते हैं रेफर
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लिखा पढ़ी से मुक्ति के लिए मरीजों को कर देते हैं रेफर
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल के चिकित्सक परेशान
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल की इमरजेंसी सेवा में ड्यूटी करने वाले चिकित्सक इलाज के बजाए कागजी कोरम पूरा करने में परेशान हैं। सामान्य स्थिति वाले मारपीट और हादसे के शिकार मरीजों से जान छुड़ाने और लिखा-पढ़ी से बचने के लिए सीएचसी और पीएचसी उन्हें जिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। ऐसे 15 से 20 मामले रोज पहुंच रहे हैं। ऐसे में चिकित्सक के साथ स्टाफ भी परेशान है। चिकित्सकों के आवाज उठाने के बाद भी जिम्मेदार बेखबर हैं।
मरीजों का उसके घर के पास और उचित समय पर इलाज हो सके, इसके लिए जिले में सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ब्लॉक मुख्यालयों पर बनाए गए हैं, लेकिन ये रेफरल केंद्र बन चुके हैं। यहां मरीजों से जान छुड़ाने का कार्य किया जा रहा है। खास कर मारपीट और दुघर्टना के मामलों में ऐसा किया जा रहा है। रेफर प्रक्रिया से इमरजेंसी सेवा में ड्यूटी करने वाले चिकित्सक भी आजिज आ चुके हैं। पुलिस केस का मामला होने के कारण चिकित्सक पहले कागजी कोरम पूरा करते हैं, फिर मरीज का इलाज करते हैं। बुुधवार को ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक डॉ. एके वर्मा ने बताया कि 12 मेडिकोलीगल कर चुके हैं। उनका कहना था कि यह सामान्य केस हैं। सीएचसी और पीएचसी पर भी इनका इलाज संभव है।
..
गवाही देने से बचने के लिए करते हैं रेफर
मारपीट और हादसे के मामले में इलाज करने वाले चिकित्सकों को चार्ट भरना होता है। इसमें शरीर के किन-किन हिस्सों में चोट लगी है। चोट कितनी गंभीर हो सकती है। इससे जान जा सकती थी या नहीं आदि का उल्लेख होता है। उसी मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर पुलिस केस दर्ज करती है। फिर चिकित्सक को मुकदमे में बयान के लिए कोर्ट में गवाही देना पड़ता है। इसी से बचने के लिए रेफर कर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं।
विज्ञापन
...
ड्यूटी के बाद गवाही में कट जाती है उम्र
मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी में तैनात एक पूर्व चिकित्सक ने बताया कि जिला अस्पताल में तैनात रहने वाले चिकित्सक की उम्र रिटायर होने के बाद गवाही में कट जाती है। जितने मामलों में मेडिकल बनाते हैं, उनमें चिकित्सक को गवाही के लिए बुलाया जाता है। अस्वस्थ होने के बावजूद गवाही में जाना पड़ता है। इसलिए चिकित्सक मेडिकोलीगल करने से बचते हैं।
---
मरीजों को होती है परेशानी
रेफर मरीजों को भी परेशानी होती है। वजह जिला अस्पताल तक जाने में समय बर्बाद होता। इससे गंभीर मरीज की जान का खतरा बढ़ जाता है। इमरजेंसी वार्ड के आंकड़ों के अनुसार माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में प्रतिमाह 450-600 मरीज हादसे और मारपीट के मामले में रेफर होकर आते हैं। ऐसे में मरीज के साथ ही चिकित्सक और संबंधित थाने की पुलिस को भागदौड़ करना पड़ता है।
...
कोट
सामान्य केस जिला अस्पताल रेफर करना गलत है। इस संबंध में सभी सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को निर्देश दिए जा चुके हैं। एक बार फिर निर्देश दिए जाएंगे। इसके बाद भी सुधार नहीं हुआ तो कार्रवाई की जाएगी।
डॉ. डीके चौधरी, प्रभारी सीएमओ, सिद्धार्थनगर
विज्ञापन
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल के चिकित्सक परेशान
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल की इमरजेंसी सेवा में ड्यूटी करने वाले चिकित्सक इलाज के बजाए कागजी कोरम पूरा करने में परेशान हैं। सामान्य स्थिति वाले मारपीट और हादसे के शिकार मरीजों से जान छुड़ाने और लिखा-पढ़ी से बचने के लिए सीएचसी और पीएचसी उन्हें जिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। ऐसे 15 से 20 मामले रोज पहुंच रहे हैं। ऐसे में चिकित्सक के साथ स्टाफ भी परेशान है। चिकित्सकों के आवाज उठाने के बाद भी जिम्मेदार बेखबर हैं।
मरीजों का उसके घर के पास और उचित समय पर इलाज हो सके, इसके लिए जिले में सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ब्लॉक मुख्यालयों पर बनाए गए हैं, लेकिन ये रेफरल केंद्र बन चुके हैं। यहां मरीजों से जान छुड़ाने का कार्य किया जा रहा है। खास कर मारपीट और दुघर्टना के मामलों में ऐसा किया जा रहा है। रेफर प्रक्रिया से इमरजेंसी सेवा में ड्यूटी करने वाले चिकित्सक भी आजिज आ चुके हैं। पुलिस केस का मामला होने के कारण चिकित्सक पहले कागजी कोरम पूरा करते हैं, फिर मरीज का इलाज करते हैं। बुुधवार को ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक डॉ. एके वर्मा ने बताया कि 12 मेडिकोलीगल कर चुके हैं। उनका कहना था कि यह सामान्य केस हैं। सीएचसी और पीएचसी पर भी इनका इलाज संभव है।
विज्ञापन
..
गवाही देने से बचने के लिए करते हैं रेफर
मारपीट और हादसे के मामले में इलाज करने वाले चिकित्सकों को चार्ट भरना होता है। इसमें शरीर के किन-किन हिस्सों में चोट लगी है। चोट कितनी गंभीर हो सकती है। इससे जान जा सकती थी या नहीं आदि का उल्लेख होता है। उसी मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर पुलिस केस दर्ज करती है। फिर चिकित्सक को मुकदमे में बयान के लिए कोर्ट में गवाही देना पड़ता है। इसी से बचने के लिए रेफर कर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं।
विज्ञापन
...
ड्यूटी के बाद गवाही में कट जाती है उम्र
मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी में तैनात एक पूर्व चिकित्सक ने बताया कि जिला अस्पताल में तैनात रहने वाले चिकित्सक की उम्र रिटायर होने के बाद गवाही में कट जाती है। जितने मामलों में मेडिकल बनाते हैं, उनमें चिकित्सक को गवाही के लिए बुलाया जाता है। अस्वस्थ होने के बावजूद गवाही में जाना पड़ता है। इसलिए चिकित्सक मेडिकोलीगल करने से बचते हैं।
---
मरीजों को होती है परेशानी
रेफर मरीजों को भी परेशानी होती है। वजह जिला अस्पताल तक जाने में समय बर्बाद होता। इससे गंभीर मरीज की जान का खतरा बढ़ जाता है। इमरजेंसी वार्ड के आंकड़ों के अनुसार माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में प्रतिमाह 450-600 मरीज हादसे और मारपीट के मामले में रेफर होकर आते हैं। ऐसे में मरीज के साथ ही चिकित्सक और संबंधित थाने की पुलिस को भागदौड़ करना पड़ता है।
...
कोट
सामान्य केस जिला अस्पताल रेफर करना गलत है। इस संबंध में सभी सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को निर्देश दिए जा चुके हैं। एक बार फिर निर्देश दिए जाएंगे। इसके बाद भी सुधार नहीं हुआ तो कार्रवाई की जाएगी।
डॉ. डीके चौधरी, प्रभारी सीएमओ, सिद्धार्थनगर