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क्रोध पर नियंत्रण करना जरूरी
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Updated Sat, 16 Apr 2016 11:14 PM IST
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डुमरियागंज में निकाली गई श्रीराम सीता की झांकी।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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तहसील क्षेत्र के सेमरा बनकसिया गांव में चल रहे श्रीशतचंडी महायज्ञ व संगीतमय प्रवचन के छठवें दिन शुक्रवार की रात अयोध्या धाम से आए कथावाचक पंडित राकेश शास्त्री ने श्रद्धालुओं को क्रोध पर नियंत्रण की नसीहत दी। कहा कि क्रोध पाप का मूल है।
मानव को क्रोध पर नियंत्रण पाने की समझ होनी चाहिए। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम क्रोध की प्रतीक ताड़का का वध करते हैं। महाराजा जनक के धनुष यज्ञ में पहुंचकर शिव धनुष तोड़ते हैं। परशुराम के क्रोध को शांत कर उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
इस प्रकार ताड़का वध से भगवान परशुराम से मिलन तक श्रीराम कथा में कथा वाचक ने विभिन्न प्रसंगों के साथ-साथ राम विवाह तक के पहलुओं को छुआ। कथा को गति देते हुए व्यास पीठ से कथा मर्मज्ञ पंडित राकेश शास्त्री ने कहा कि युवा रूप में भगवान श्रीराम राजा जनक के धनुष यज्ञ की सूचना पाकर गुरू विश्वामित्र के साथ जनकपुरी की ओर चल पड़ते हैं। ऋषि पत्नी जड़वत आहिल्या का उद्धार करते हैं।
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इसके बाद श्रीराम अनुज, लक्ष्मण व गुरु विश्वामित्र के साथ जनकपुरी में प्रवेश करते हैं। पंडित शास्त्री ने श्रीराम और सीता के विवाह का विस्तार से वृतांत सुनाया। इससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। इस दौरान बृजनंदन शुक्ल, हरिश्चंद्र शुक्ल, मनोज, संजय, प्रदीप, हरिशंकर, रामकिशोर, बालकृष्ण, रामकपिल शुक्ला, राप्ती शुक्ला, मुरली प्रताप और परिवेश आदि मौजूद रहे।
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मानव को क्रोध पर नियंत्रण पाने की समझ होनी चाहिए। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम क्रोध की प्रतीक ताड़का का वध करते हैं। महाराजा जनक के धनुष यज्ञ में पहुंचकर शिव धनुष तोड़ते हैं। परशुराम के क्रोध को शांत कर उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
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इस प्रकार ताड़का वध से भगवान परशुराम से मिलन तक श्रीराम कथा में कथा वाचक ने विभिन्न प्रसंगों के साथ-साथ राम विवाह तक के पहलुओं को छुआ। कथा को गति देते हुए व्यास पीठ से कथा मर्मज्ञ पंडित राकेश शास्त्री ने कहा कि युवा रूप में भगवान श्रीराम राजा जनक के धनुष यज्ञ की सूचना पाकर गुरू विश्वामित्र के साथ जनकपुरी की ओर चल पड़ते हैं। ऋषि पत्नी जड़वत आहिल्या का उद्धार करते हैं।
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इसके बाद श्रीराम अनुज, लक्ष्मण व गुरु विश्वामित्र के साथ जनकपुरी में प्रवेश करते हैं। पंडित शास्त्री ने श्रीराम और सीता के विवाह का विस्तार से वृतांत सुनाया। इससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। इस दौरान बृजनंदन शुक्ल, हरिश्चंद्र शुक्ल, मनोज, संजय, प्रदीप, हरिशंकर, रामकिशोर, बालकृष्ण, रामकपिल शुक्ला, राप्ती शुक्ला, मुरली प्रताप और परिवेश आदि मौजूद रहे।