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चार करोड़ खर्च फिर भी नहीं चले मिनी वाटर टैंक
सिद्धार्थनगर/ अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 03 May 2017 11:35 PM IST
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जिले में अदहाल पड़ा वाटर टैंक
- फोटो : अमर उजाला
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जेई एईएस प्रभावित गांवों में बने मिनी वाटर टैंक पानी देने से पहले ही दम तोड़ चुके हैं। दूषित पानी से होने वाली बीमारी से बचाने के लिए शासन ने प्रभावित गांवों में मिनी वाटर टैंक की बनवाया था, इससे लोगों को शुद्ध पानी मिल सके। चार करोड़ रुपये पानी को शुद्ध करने में बह गए लेकिन लोगों को शुद्ध पानी नहीं मिला। जिम्मेदारों की उदासीनता के चलते अधिकांश वाटर टैंक खराब हो चुके हैं और लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।
जिले में हर वर्ष दर्जनों मासूम, जेई एईएस की चपेट आने से दम तोड़ देते हैं। चिकित्सीय जांच में पानी के दूषित पाए जाने की पुष्टि हुई। बीमारी से निजात पाने के लिए जेई एईएस से प्रभावित गांवों में वर्ष 2012- 13 में जल निगम की ओर से मिनी वाटर टैंक की स्थापना शुरू की गई। जलनिगम की माने तो जिले में जेई एईएस से प्रभावित गांवों में लगभग 380 मिनी वाटर टैंक की स्थापना की गई, इसकी क्षमता पांच हजार लीटर पानी की थी। वाटर टैंक तो बनवा दिया गया, मगर वह हैंडओवर होने के महज कुछ ही दिनों तक चला। वहीं कुछ हैंडओवर ही नहीं हो पाए हैं। अधिकांश वाटर टैंक से पानी सप्लाई ही शुरू नहीं हुई है। स्थित यह है कि किसी टैंक में पानी फिल्टर करने के लिए लगा मोटर खराब हो चुका है तो किसी की पाइप ही खराब है। कहीं टोटी ही नहीं है तो कहीं टैंक बनने के बाद से पानी की सप्लाई नहीं शुरू हो सका। वहीं निर्माण में अनियमितता किए जाने के कारण चार वर्ष में ही दीवार से प्लास्टर टूटकर गिर रहे हैं। जिस लिहाज से वाटर टैंक का निर्माण करवाया गया था और लोगों को आस थी कि अब शुद्ध पानी मिलेगा, वह अब सपना बनकर रह गया। विभागीय जिम्मेदार इससे बेखबर हैं। इस संबंध में एक्सईएन जलनिगम पवन कुमार यादव ने बताया कि निर्माण की जिम्मेदारी विभाग की थी। निर्माण होने के बाद अधिकांश वाटर टैंकों को ग्राम पंचायतों को हैंडओवर किया जा चुका है। जो शेष होंगे जांच करवाकर हैंडओवर कर दिया जाएगा।
इतने लागत में हुआ एक वाटर टैंक का निर्माण
विभाग की माने तो एक वाटर टैंक पर एक लाख 29 हजार खर्च हुए हैं। इस औसत से 380 वाटर के टैंक के निर्माण में लगभग चार करोड़ 90 लाख रुपये पानी के नाम पर खर्च कर दिया गया, लेकिन लोगों को पानी का बूंद तक नसीब नहीं हुआ।
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जिले में हर वर्ष दर्जनों मासूम, जेई एईएस की चपेट आने से दम तोड़ देते हैं। चिकित्सीय जांच में पानी के दूषित पाए जाने की पुष्टि हुई। बीमारी से निजात पाने के लिए जेई एईएस से प्रभावित गांवों में वर्ष 2012- 13 में जल निगम की ओर से मिनी वाटर टैंक की स्थापना शुरू की गई। जलनिगम की माने तो जिले में जेई एईएस से प्रभावित गांवों में लगभग 380 मिनी वाटर टैंक की स्थापना की गई, इसकी क्षमता पांच हजार लीटर पानी की थी। वाटर टैंक तो बनवा दिया गया, मगर वह हैंडओवर होने के महज कुछ ही दिनों तक चला। वहीं कुछ हैंडओवर ही नहीं हो पाए हैं। अधिकांश वाटर टैंक से पानी सप्लाई ही शुरू नहीं हुई है। स्थित यह है कि किसी टैंक में पानी फिल्टर करने के लिए लगा मोटर खराब हो चुका है तो किसी की पाइप ही खराब है। कहीं टोटी ही नहीं है तो कहीं टैंक बनने के बाद से पानी की सप्लाई नहीं शुरू हो सका। वहीं निर्माण में अनियमितता किए जाने के कारण चार वर्ष में ही दीवार से प्लास्टर टूटकर गिर रहे हैं। जिस लिहाज से वाटर टैंक का निर्माण करवाया गया था और लोगों को आस थी कि अब शुद्ध पानी मिलेगा, वह अब सपना बनकर रह गया। विभागीय जिम्मेदार इससे बेखबर हैं। इस संबंध में एक्सईएन जलनिगम पवन कुमार यादव ने बताया कि निर्माण की जिम्मेदारी विभाग की थी। निर्माण होने के बाद अधिकांश वाटर टैंकों को ग्राम पंचायतों को हैंडओवर किया जा चुका है। जो शेष होंगे जांच करवाकर हैंडओवर कर दिया जाएगा।
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इतने लागत में हुआ एक वाटर टैंक का निर्माण
विभाग की माने तो एक वाटर टैंक पर एक लाख 29 हजार खर्च हुए हैं। इस औसत से 380 वाटर के टैंक के निर्माण में लगभग चार करोड़ 90 लाख रुपये पानी के नाम पर खर्च कर दिया गया, लेकिन लोगों को पानी का बूंद तक नसीब नहीं हुआ।
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