{"_id":"628bd712ccba1c61726c5efb","slug":"dialisis-without-nefrologist-siddharthnagar-news-gkp4379046135","type":"story","status":"publish","title_hn":"नेफ्रोलॉजिस्ट के बिना ही हो रहा डायलिसिस","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नेफ्रोलॉजिस्ट के बिना ही हो रहा डायलिसिस
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नेफ्रोलॉजिस्ट के बिना ही हो रहा डायलिसिस
लखीमपुर खीरी में बिना चिकित्सक के डायलिसिस से दो दिन पहले एक मरीज की चली गई थी जान
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल में डायलिसिस की सुविधा तो मरीजों को कई साल से मिल रही है, लेकिन यहां पर नेफ्रोलॉजिस्ट के चिकित्सक नहीं हैं। उनकी दी गई सलाह पर फिजिशियन की देखरेख में मरीजों का डायलिसिस किया जाता है। विशेषज्ञ चिकित्सक के अभाव में किसी अनहोनी के होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। हाल ही में लखीमपुर जिले में बिना विशेषज्ञ की देखरेख के डायलिसिस करते समय एक मरीज की मौत होने का आरोप लग चुका है। अस्पताल प्रशासन को इसे संज्ञान में लेने की जरूरत है।
किडनी की खराबी की समस्या से बीमार हुए मरीजों के इलाज में सबसे अहम योगदान डायलिसिस का है। ऐसा चिकित्सकों का कहना है। दोनों किडनी जवाब दे चुकी है। उसके बाद भी चिकित्सक की सलाह पर समय-समय पर मरीज का डायलिसिस होता रहे तो वह सामान्य जीवन जी सकता है। बशर्ते इसमें चिकित्सक की सलाह बेहद जरूरी है। माधव प्रसाद त्रिपाठी से संबद्ध जिला अस्पताल में पिछले कई वर्ष से डायलिसिस की सुविधा उपलब्ध है। यहां पर एक दिन में 25 मरीजों का डायलिसिस होता है, लेकिन यहां पर इसके विशेषज्ञ चिकित्सक तैनात नहीं हैं। इस वार्ड के संचालन में और मरीजों के देखरेख में नेफ्रोलॉजिस्ट चिकित्सक का होना बेहद जरूरी है। यहां फिजिशियन को जिम्मेदारी देकर वार्ड चलवाया जा रहा है। ऐसे में किसी मरीज के साथ बड़ी परेशानी होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि अगर उसके विशेषज्ञ चिकित्सक रहते तो वह अपने हिसाब से जरूरत के अनुसार मरीज का इलाज करते। लेकिन इस पर अभी तक जिम्मेदार ध्यान नहीं दे रहे हैं।
सलाह पर होता है डायलिसिस
दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर सहित अन्य स्थानों पर स्थित मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक के पास मरीजों को इलाज चल रहा है। उनके द्वारा पर्चे पर डायलिसिस कब और एक माह में कितनी बार कराना है। यह जानकारी दे दी जाती है। उसी आधार पर यहां उनका डायलिसिस होता है। अब वहां से केवल सलाह मिली है। डायलिसिस के बाद उनके शरीर पर क्या असर पड़ रहा है, यह कैसे समझा जा सकता है। फिलहाल, वार्ड के संचालन की जिम्मेदारी संभालने वाले चिकित्सक मरीजों के सेहत की जांच करते रहते हैं।
विज्ञापन
10 बेड का वार्ड, होता है 25 का डायलिसिस
जिला अस्पताल के तीसरे मंजिल पर स्थित डायलिसिस की सुविधा अपने आप में जिले के लिए बड़ी चीज है। क्योंकि इसके लिए लोगों को बाहर जाना पड़ता था। इसके एवज में उन्हें रुपये खर्च करना पड़ता था। 10 बेड के वार्ड में प्रतिदिन 25 मरीजों का डायलिसिस होता है।
बोले जिम्मेदार
डायलिसिस नेफ्रोलॉजिस्ट चिकित्सक की सलाह पर ही की जाती है। जो टीम लगी हुई वह प्रशिक्षण प्राप्त है। साथ ही वार्ड के संचालन के लिए नोडल डॉक्टर नामित हैं जो मरीजों की देखरेख करते हैं। हर समय वार्ड में आते हैं।
-शुभम गिरि, मैनेजर डायलिसिस वार्ड, जिला अस्पताल, सिद्धार्थनगर
विज्ञापन
लखीमपुर खीरी में बिना चिकित्सक के डायलिसिस से दो दिन पहले एक मरीज की चली गई थी जान
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल में डायलिसिस की सुविधा तो मरीजों को कई साल से मिल रही है, लेकिन यहां पर नेफ्रोलॉजिस्ट के चिकित्सक नहीं हैं। उनकी दी गई सलाह पर फिजिशियन की देखरेख में मरीजों का डायलिसिस किया जाता है। विशेषज्ञ चिकित्सक के अभाव में किसी अनहोनी के होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। हाल ही में लखीमपुर जिले में बिना विशेषज्ञ की देखरेख के डायलिसिस करते समय एक मरीज की मौत होने का आरोप लग चुका है। अस्पताल प्रशासन को इसे संज्ञान में लेने की जरूरत है।
किडनी की खराबी की समस्या से बीमार हुए मरीजों के इलाज में सबसे अहम योगदान डायलिसिस का है। ऐसा चिकित्सकों का कहना है। दोनों किडनी जवाब दे चुकी है। उसके बाद भी चिकित्सक की सलाह पर समय-समय पर मरीज का डायलिसिस होता रहे तो वह सामान्य जीवन जी सकता है। बशर्ते इसमें चिकित्सक की सलाह बेहद जरूरी है। माधव प्रसाद त्रिपाठी से संबद्ध जिला अस्पताल में पिछले कई वर्ष से डायलिसिस की सुविधा उपलब्ध है। यहां पर एक दिन में 25 मरीजों का डायलिसिस होता है, लेकिन यहां पर इसके विशेषज्ञ चिकित्सक तैनात नहीं हैं। इस वार्ड के संचालन में और मरीजों के देखरेख में नेफ्रोलॉजिस्ट चिकित्सक का होना बेहद जरूरी है। यहां फिजिशियन को जिम्मेदारी देकर वार्ड चलवाया जा रहा है। ऐसे में किसी मरीज के साथ बड़ी परेशानी होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि अगर उसके विशेषज्ञ चिकित्सक रहते तो वह अपने हिसाब से जरूरत के अनुसार मरीज का इलाज करते। लेकिन इस पर अभी तक जिम्मेदार ध्यान नहीं दे रहे हैं।
विज्ञापन
सलाह पर होता है डायलिसिस
दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर सहित अन्य स्थानों पर स्थित मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक के पास मरीजों को इलाज चल रहा है। उनके द्वारा पर्चे पर डायलिसिस कब और एक माह में कितनी बार कराना है। यह जानकारी दे दी जाती है। उसी आधार पर यहां उनका डायलिसिस होता है। अब वहां से केवल सलाह मिली है। डायलिसिस के बाद उनके शरीर पर क्या असर पड़ रहा है, यह कैसे समझा जा सकता है। फिलहाल, वार्ड के संचालन की जिम्मेदारी संभालने वाले चिकित्सक मरीजों के सेहत की जांच करते रहते हैं।
विज्ञापन
10 बेड का वार्ड, होता है 25 का डायलिसिस
जिला अस्पताल के तीसरे मंजिल पर स्थित डायलिसिस की सुविधा अपने आप में जिले के लिए बड़ी चीज है। क्योंकि इसके लिए लोगों को बाहर जाना पड़ता था। इसके एवज में उन्हें रुपये खर्च करना पड़ता था। 10 बेड के वार्ड में प्रतिदिन 25 मरीजों का डायलिसिस होता है।
बोले जिम्मेदार
डायलिसिस नेफ्रोलॉजिस्ट चिकित्सक की सलाह पर ही की जाती है। जो टीम लगी हुई वह प्रशिक्षण प्राप्त है। साथ ही वार्ड के संचालन के लिए नोडल डॉक्टर नामित हैं जो मरीजों की देखरेख करते हैं। हर समय वार्ड में आते हैं।
-शुभम गिरि, मैनेजर डायलिसिस वार्ड, जिला अस्पताल, सिद्धार्थनगर