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ढलते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती महिलाओं ने की पूजन
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ढलते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती महिलाओं ने की पूजा
छठ महापर्व में व्रती महिलाओं ने पूजन कर किया प्रसाद ग्रहण
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। सूर्योपासना के महापर्व छठ पर शुक्रवार की शाम को नदी-घाटों पर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। दोपहर बाद से ही घाटों पर व्रती महिलाओं का आना शुरू हो गया। सायंकाल 5.21 बजे के शुभ मुहूर्त में जल में खड़े होकर भगवान भास्कर को पूरे भक्ति भाव से अर्घ्य दिया और अपनी मनोकामना पूर्ण करने की स्तुति की। कोरोना के भय से कई मोहल्लों में अस्थायी घाट बनाकर ही पूजा की गई। भीड़ के कारण कई जगहों पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया गया। सुरक्षा के मद्देनजर घाटों पर महिला और पुरुष पुलिस कर्मी तैनात रहे।
शहर के विभिन्न मोहल्लों से व्रती महिलाएं और परिजन शाम से ही छठी माता का गीत गाते हुए जमुआर नाला स्थित घाट पर पहुंचे। ढलते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए श्रद्धालु बांस की बनी टोकरियों में पूजन सामग्री, केला, गन्ना, फल, ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पूड़ी, खजूर, सूजी का हलवा, चावल का बना लड्डू और दूध आदि लेकर पूजा स्थल पर पहुंच गए। घर के पुरुषों ने सिर पर दौरी में रखे प्रसाद सामग्री को घाटों तक पहुंचाया। घर से लोकप्रिय एवं परंपरागत छठ गीतों को गाती हुईं व्रती महिलाओं ने वेदियों के पास पहुंचकर प्रसाद सामग्री को चढ़ाया और दीयों को जलाया। इसके बाद वह विधि-विधान से छठ मैया के पूजन में जुट गईं। शाम को जैसे ही सूर्यास्त की बेला आई, कतार में खड़ी होकर व्रतियों ने अर्घ्य दिया और अपनी मनोकामना पूर्ण करने का आशीर्वाद मांगा। शाम को भीड़ का अलौकिक दृश्य नदी घाटों पर दिखा। व्रतियों को कोई परेशानी न हो, इसके लिए नगरपालिका प्रशासन और ग्राम पंचायत की ओर से प्रकाश के साथ ही अन्य सुविधाओं की व्यवस्था की गई थी। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से जुड़े लोगों ने भी घाटों पर पहुंचकर लोगों का सहयोग किया। बांसी में राप्ती नदी तट पर स्थित रानी मोह भक्त लक्ष्मी स्नान घाट, डुमरियागंज में राप्ती तट पर, शोहरतगढ़ में शिवबाबा घाट और गढ़ाकुल पोखरे पर स्थित घाट समेत विभिन्न स्थानों और घर में व्रती महिलाओं ने ढलते सूर्य को अर्घ्य देकर पूजन किया। पूजा घाटों पर सुरक्षा और शांति व्यवस्था के पुलिस तैनात रही।
सूर्य को अर्घ्य देने का विधान
पं. सुधाकर त्रिपाठी बताते हैं कि छठ पर्व में दो दिन सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है। षष्ठी तिथि में अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है जबकि सप्तमी को प्रात: कालीन उदित होते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। अस्त होते हुए सूर्य और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देना ऋतु और कालचक्र के परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है। सूर्य की गति और रोशनी से कृषि फलित होती है। हमारे देश में सूर्य पूजा की परंपरा पहले से है। ऐसी मान्यता है कि इनकी आराधना से रोग मुक्ति और सुख-समृद्धि बनी रहती है।
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आज उगते सूर्य को दिया जाएगा अर्घ्य
21 नवंबर की भोर में नदी, तालाब में खड़े होकर उगते सूर्य को व्रती महिलाएं अर्घ्य देंगी। चौथे दिन सुबह के अर्घ्य के साथ छठ का समापन हो जाता है, इसके बाद विधिवत पूजा कर प्रसाद बांटा जाता है। छठ पर्व में सूर्य की आराधना का बड़ा महत्व है, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार छठी माता को सूर्य देवता की बहन माना जाता है। छठ पर्व में सूर्य की उपासना करने से छठ माता खुश होती हैं और घर परिवार में सुख शांति तथा संपन्नता प्रदान करती है, नि:संतान को संतान सुख की प्राप्ति होती है।
पुत्र की मनौती के लिए भरी कोसी
छठ पूजन के दौरान पुत्र प्राप्ति की मनौती के लिए व्रती महिलाएं कोसी भरती हैं। कोसी मिट्टी का कटोरानुमा बड़ा सा पात्र होता है, इसके ऊपरी किनारों पर सात दीये बने होते हैं। जिन महिलाओं को बेटा नहीं होता है वह छठ पूजा में कोसी भरती हैं। कोसी भरने वाले व्रतियों का अनुष्ठान कठिन होता है। ठंड के बावजूद उन्हें कमर भर पानी में चार घंटे शाम को और दो घंटे सुबह खड़ा होकर सूर्य देवता की पूजा करनी होती है। मनौती पूर्ण होने और विवाह, मकान आदि मनौतियों के लिए भी श्रद्धालु कोसी भरते हैं।
मेले का लिया आनंद
नदी-घाटों पर युवाओं एवं बच्चों ने छठ पर्व पर आतिशबाजी की और वहां लगे मेले का आनंद उठाया। लोगों ने मनपसंद सामानों की खरीदारी की और विभिन्न खाद्य सामग्रियों का लुत्फ उठाया। लोगों ने एक-दूसरे से मिलकर हर्षित भी हुए और पर्व की बधाई भी दी।
घट को सैनिटाइज कराया
जमुआर नाला स्थित छठ घाट पर नगर पालिका की तरफ ओर से पंडाल, केसरिया और सफेद रंग के गुब्बारे लगाए गए थे। नगर पालिका अध्यक्ष श्याम बिहारी जायसवाल ने बताया कि कोरोना संक्रमण से सुरक्षा एवं बचाव के लिए सभी वेदियों, सीढ़ी की रेलिंग और कुर्सियों को सैनिटाइज कराया गया। घाट पर महिलाओं के लिए अलग से चेंजिंग रूम की व्यवस्था की गई।
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छठ महापर्व में व्रती महिलाओं ने पूजन कर किया प्रसाद ग्रहण
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। सूर्योपासना के महापर्व छठ पर शुक्रवार की शाम को नदी-घाटों पर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। दोपहर बाद से ही घाटों पर व्रती महिलाओं का आना शुरू हो गया। सायंकाल 5.21 बजे के शुभ मुहूर्त में जल में खड़े होकर भगवान भास्कर को पूरे भक्ति भाव से अर्घ्य दिया और अपनी मनोकामना पूर्ण करने की स्तुति की। कोरोना के भय से कई मोहल्लों में अस्थायी घाट बनाकर ही पूजा की गई। भीड़ के कारण कई जगहों पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया गया। सुरक्षा के मद्देनजर घाटों पर महिला और पुरुष पुलिस कर्मी तैनात रहे।
शहर के विभिन्न मोहल्लों से व्रती महिलाएं और परिजन शाम से ही छठी माता का गीत गाते हुए जमुआर नाला स्थित घाट पर पहुंचे। ढलते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए श्रद्धालु बांस की बनी टोकरियों में पूजन सामग्री, केला, गन्ना, फल, ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पूड़ी, खजूर, सूजी का हलवा, चावल का बना लड्डू और दूध आदि लेकर पूजा स्थल पर पहुंच गए। घर के पुरुषों ने सिर पर दौरी में रखे प्रसाद सामग्री को घाटों तक पहुंचाया। घर से लोकप्रिय एवं परंपरागत छठ गीतों को गाती हुईं व्रती महिलाओं ने वेदियों के पास पहुंचकर प्रसाद सामग्री को चढ़ाया और दीयों को जलाया। इसके बाद वह विधि-विधान से छठ मैया के पूजन में जुट गईं। शाम को जैसे ही सूर्यास्त की बेला आई, कतार में खड़ी होकर व्रतियों ने अर्घ्य दिया और अपनी मनोकामना पूर्ण करने का आशीर्वाद मांगा। शाम को भीड़ का अलौकिक दृश्य नदी घाटों पर दिखा। व्रतियों को कोई परेशानी न हो, इसके लिए नगरपालिका प्रशासन और ग्राम पंचायत की ओर से प्रकाश के साथ ही अन्य सुविधाओं की व्यवस्था की गई थी। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से जुड़े लोगों ने भी घाटों पर पहुंचकर लोगों का सहयोग किया। बांसी में राप्ती नदी तट पर स्थित रानी मोह भक्त लक्ष्मी स्नान घाट, डुमरियागंज में राप्ती तट पर, शोहरतगढ़ में शिवबाबा घाट और गढ़ाकुल पोखरे पर स्थित घाट समेत विभिन्न स्थानों और घर में व्रती महिलाओं ने ढलते सूर्य को अर्घ्य देकर पूजन किया। पूजा घाटों पर सुरक्षा और शांति व्यवस्था के पुलिस तैनात रही।
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सूर्य को अर्घ्य देने का विधान
पं. सुधाकर त्रिपाठी बताते हैं कि छठ पर्व में दो दिन सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है। षष्ठी तिथि में अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है जबकि सप्तमी को प्रात: कालीन उदित होते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। अस्त होते हुए सूर्य और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देना ऋतु और कालचक्र के परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है। सूर्य की गति और रोशनी से कृषि फलित होती है। हमारे देश में सूर्य पूजा की परंपरा पहले से है। ऐसी मान्यता है कि इनकी आराधना से रोग मुक्ति और सुख-समृद्धि बनी रहती है।
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आज उगते सूर्य को दिया जाएगा अर्घ्य
21 नवंबर की भोर में नदी, तालाब में खड़े होकर उगते सूर्य को व्रती महिलाएं अर्घ्य देंगी। चौथे दिन सुबह के अर्घ्य के साथ छठ का समापन हो जाता है, इसके बाद विधिवत पूजा कर प्रसाद बांटा जाता है। छठ पर्व में सूर्य की आराधना का बड़ा महत्व है, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार छठी माता को सूर्य देवता की बहन माना जाता है। छठ पर्व में सूर्य की उपासना करने से छठ माता खुश होती हैं और घर परिवार में सुख शांति तथा संपन्नता प्रदान करती है, नि:संतान को संतान सुख की प्राप्ति होती है।
पुत्र की मनौती के लिए भरी कोसी
छठ पूजन के दौरान पुत्र प्राप्ति की मनौती के लिए व्रती महिलाएं कोसी भरती हैं। कोसी मिट्टी का कटोरानुमा बड़ा सा पात्र होता है, इसके ऊपरी किनारों पर सात दीये बने होते हैं। जिन महिलाओं को बेटा नहीं होता है वह छठ पूजा में कोसी भरती हैं। कोसी भरने वाले व्रतियों का अनुष्ठान कठिन होता है। ठंड के बावजूद उन्हें कमर भर पानी में चार घंटे शाम को और दो घंटे सुबह खड़ा होकर सूर्य देवता की पूजा करनी होती है। मनौती पूर्ण होने और विवाह, मकान आदि मनौतियों के लिए भी श्रद्धालु कोसी भरते हैं।
मेले का लिया आनंद
नदी-घाटों पर युवाओं एवं बच्चों ने छठ पर्व पर आतिशबाजी की और वहां लगे मेले का आनंद उठाया। लोगों ने मनपसंद सामानों की खरीदारी की और विभिन्न खाद्य सामग्रियों का लुत्फ उठाया। लोगों ने एक-दूसरे से मिलकर हर्षित भी हुए और पर्व की बधाई भी दी।
घट को सैनिटाइज कराया
जमुआर नाला स्थित छठ घाट पर नगर पालिका की तरफ ओर से पंडाल, केसरिया और सफेद रंग के गुब्बारे लगाए गए थे। नगर पालिका अध्यक्ष श्याम बिहारी जायसवाल ने बताया कि कोरोना संक्रमण से सुरक्षा एवं बचाव के लिए सभी वेदियों, सीढ़ी की रेलिंग और कुर्सियों को सैनिटाइज कराया गया। घाट पर महिलाओं के लिए अलग से चेंजिंग रूम की व्यवस्था की गई।