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Siddharthnagar News: तनाव के युग में बौद्ध दर्शन महत्वपूर्ण
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सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करती प्रोफेसर सुजाता गौतम। स्रोत विवि
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु में चल रहे वैश्विक बौद्ध चिंतन की ऐतिहासिकता एवं समकालीन प्रासंगिकता विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी मंगलवार को संपन्न हुई।
संगोष्ठी में देश-विदेश से बड़ी संख्या में विद्वानों, शोधार्थियों एवं छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की। डीडीयू के दर्शनशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सभाजीत मिश्र ने कहा कि वैश्विक अशांति और तनाव के युग में बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने युद्ध को समस्या का समाधान नहीं, बल्कि अहंकारजनित संकट बताया और कहा कि बुद्ध का दर्शन शांति, करुणा और सत्य के सार्वकालिक मूल्य पर आधारित है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के पूर्व अधिष्ठाता प्रो. हरीश कुमार शर्मा ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा में बौद्ध चिंतन का योगदान अत्यंत समृद्ध और गर्व का विषय है। सम्राट अशोक ने इसे वैश्विक पहचान दिलाई, जो आज भी विश्व शांति के लिए प्रेरणास्रोत है।
मुख्य अतिथि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. एमपी अहिरवार ने कहा कि बौद्ध दर्शन मानव कल्याण के लिए समर्पित है। यह सत्य, समता, स्वतंत्रता तथा बंधुता जैसे मूल्यों पर आधारित है। उन्होंने इसे भारत के विश्व गुरु बनने की दिशा में सहायक बताया।
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विशिष्ट अतिथि के रूप में बीएचयू की प्रो. सुजाता गौतम ने कहा कि बौद्ध दर्शन वर्तमान बाजारवादी संकटों का समाधान पंचशील सिद्धांतों में प्रस्तुत करता है। यह स्त्री विमर्श और लिंग समानता के दृष्टिकोण से भी अत्यंत प्रासंगिक है। प्रो. लालजी श्रावक ने बौद्ध दर्शन की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बौद्ध दर्शन सामाजिक बुराइयों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने कहा कि बौद्ध चिंतन वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अनुभवजन्यता पर आधारित है।
प्रो. सत्येंद्र दुबे ने सभी अतिथियों का स्वागत किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. दीपक बाबू (पूर्व अध्यक्ष, वाणिज्य संकाय) ने किया। कार्यक्रम का संयोजन अंतरराष्ट्रीय बौद्ध केंद्र के ओएसडी प्रो. सुशील कुमार तिवारी ने किया। संगोष्ठी के दौरान प्रतिभागियों ने ऑनलाइन व ऑफलाइन माध्यम से शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। विश्वविद्यालय के अनेक शिक्षकगण, शोधार्थी उपस्थित रहे।
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सिद्धार्थनगर। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु में चल रहे वैश्विक बौद्ध चिंतन की ऐतिहासिकता एवं समकालीन प्रासंगिकता विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी मंगलवार को संपन्न हुई।
संगोष्ठी में देश-विदेश से बड़ी संख्या में विद्वानों, शोधार्थियों एवं छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की। डीडीयू के दर्शनशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सभाजीत मिश्र ने कहा कि वैश्विक अशांति और तनाव के युग में बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने युद्ध को समस्या का समाधान नहीं, बल्कि अहंकारजनित संकट बताया और कहा कि बुद्ध का दर्शन शांति, करुणा और सत्य के सार्वकालिक मूल्य पर आधारित है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के पूर्व अधिष्ठाता प्रो. हरीश कुमार शर्मा ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा में बौद्ध चिंतन का योगदान अत्यंत समृद्ध और गर्व का विषय है। सम्राट अशोक ने इसे वैश्विक पहचान दिलाई, जो आज भी विश्व शांति के लिए प्रेरणास्रोत है।
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मुख्य अतिथि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. एमपी अहिरवार ने कहा कि बौद्ध दर्शन मानव कल्याण के लिए समर्पित है। यह सत्य, समता, स्वतंत्रता तथा बंधुता जैसे मूल्यों पर आधारित है। उन्होंने इसे भारत के विश्व गुरु बनने की दिशा में सहायक बताया।
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विशिष्ट अतिथि के रूप में बीएचयू की प्रो. सुजाता गौतम ने कहा कि बौद्ध दर्शन वर्तमान बाजारवादी संकटों का समाधान पंचशील सिद्धांतों में प्रस्तुत करता है। यह स्त्री विमर्श और लिंग समानता के दृष्टिकोण से भी अत्यंत प्रासंगिक है। प्रो. लालजी श्रावक ने बौद्ध दर्शन की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बौद्ध दर्शन सामाजिक बुराइयों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने कहा कि बौद्ध चिंतन वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अनुभवजन्यता पर आधारित है।
प्रो. सत्येंद्र दुबे ने सभी अतिथियों का स्वागत किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. दीपक बाबू (पूर्व अध्यक्ष, वाणिज्य संकाय) ने किया। कार्यक्रम का संयोजन अंतरराष्ट्रीय बौद्ध केंद्र के ओएसडी प्रो. सुशील कुमार तिवारी ने किया। संगोष्ठी के दौरान प्रतिभागियों ने ऑनलाइन व ऑफलाइन माध्यम से शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। विश्वविद्यालय के अनेक शिक्षकगण, शोधार्थी उपस्थित रहे।