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प्राकृतिक खेती कर मिट्टी सुधारें, उपज बढ़ाएं
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डुमरियागंज के परसपुर में कृषक गोष्ठी को संबोधित करते डॉ. प्रदीप कुमार।
- फोटो : SIDDHARTHNAGAR
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प्राकृतिक खेती कर मिट्टी सुधारें, उपज बढ़ाएं
डुमरियागंज। प्राकृतिक खेती कृषि की प्राचीन पद्धति है। यह भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखती है। प्राकृतिक खेती में रासायनिक कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता है। इस प्रकार की खेती में जो तत्व प्रकृति में पाए जाते हैं, उन्हीं को खेती में कीटनाशक के रूप में काम में लिया जाता है। प्राकृतिक खेती से उर्वरा शक्ति में सुधार के साथ पैदावार में वृद्धि होती है। ये बातें सोमवार को कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप कुमार ने कहीं।
परसपुर में आयोजित कृषि गोष्ठी में उन्होंने किसानों को बताया कि पिछले कई वर्षों से खेती में काफी नुकसान देखने को मिल रहा है। इसका मुख्य कारण हानिकारक कीटनाशकों का उपयोग है। इसमें लागत भी बढ़ रही है। कृषि वैज्ञानिक शेष नारायण सिंह ने बताया कि भूमि के प्राकृतिक स्वरूप में भी बदलाव हो रहे हैं, जो काफी नुकसान भरे हो सकते हैं। रासायनिक खेती से प्रकृति में और मनुष्य के स्वास्थ्य में काफी गिरावट आई है।
डॉ. एसके मिश्रा ने बताया कि किसानों की पैदावार का आधा हिस्सा उर्वरक और कीटनाशक में ही खर्च हो जाता है। यदि किसान खेती में अधिक मुनाफा कमाना चाहता है तो उसे प्राकृतिक खेती की तरफ अग्रसर होना चाहिए। डॉ. सरबजीत ने बताया कि खेती में खाने-पीने की चीजें उगाई जाती हैं। इन खाद्य पदार्थों में जिंक और आयरन जैसे कई सारे खनिज तत्व उपस्थित होते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं।
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नीलम सिंह ने बताया की रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग से ये खाद्य पदार्थ अपनी गुणवत्ता खो देते हैं। इससे हमारे शरीर पर बुरा असर पड़ता है। इस दौरान रंगीलाल, बृजभूषण शरण प्रजापति, राम बहादुर, दिनेश यादव, संगीता, सुरेखा, लक्ष्मी, अनीता आदि मौजूद रहीं।
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डुमरियागंज। प्राकृतिक खेती कृषि की प्राचीन पद्धति है। यह भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखती है। प्राकृतिक खेती में रासायनिक कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता है। इस प्रकार की खेती में जो तत्व प्रकृति में पाए जाते हैं, उन्हीं को खेती में कीटनाशक के रूप में काम में लिया जाता है। प्राकृतिक खेती से उर्वरा शक्ति में सुधार के साथ पैदावार में वृद्धि होती है। ये बातें सोमवार को कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप कुमार ने कहीं।
परसपुर में आयोजित कृषि गोष्ठी में उन्होंने किसानों को बताया कि पिछले कई वर्षों से खेती में काफी नुकसान देखने को मिल रहा है। इसका मुख्य कारण हानिकारक कीटनाशकों का उपयोग है। इसमें लागत भी बढ़ रही है। कृषि वैज्ञानिक शेष नारायण सिंह ने बताया कि भूमि के प्राकृतिक स्वरूप में भी बदलाव हो रहे हैं, जो काफी नुकसान भरे हो सकते हैं। रासायनिक खेती से प्रकृति में और मनुष्य के स्वास्थ्य में काफी गिरावट आई है।
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डॉ. एसके मिश्रा ने बताया कि किसानों की पैदावार का आधा हिस्सा उर्वरक और कीटनाशक में ही खर्च हो जाता है। यदि किसान खेती में अधिक मुनाफा कमाना चाहता है तो उसे प्राकृतिक खेती की तरफ अग्रसर होना चाहिए। डॉ. सरबजीत ने बताया कि खेती में खाने-पीने की चीजें उगाई जाती हैं। इन खाद्य पदार्थों में जिंक और आयरन जैसे कई सारे खनिज तत्व उपस्थित होते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं।
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नीलम सिंह ने बताया की रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग से ये खाद्य पदार्थ अपनी गुणवत्ता खो देते हैं। इससे हमारे शरीर पर बुरा असर पड़ता है। इस दौरान रंगीलाल, बृजभूषण शरण प्रजापति, राम बहादुर, दिनेश यादव, संगीता, सुरेखा, लक्ष्मी, अनीता आदि मौजूद रहीं।