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तेजगढ़ की माटी में झलकता है क्रांति का तेज

Sun, 26 Jan 2014 05:45 AM IST
Siddhartha nagar
Siddhartha nagar Updated Sun, 26 Jan 2014 05:45 AM IST
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सिद्धार्थनगर। अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करने पर यातनाओं की अति। तेजगढ़ गांव और यहां रहने वाले हमारे पुरखों की कहानी है। जिले के बांसी तहसील के इस गांव की माटी में आज भी क्रांति का तेज महसूस होता है। अंग्रेज अधिकारियों की शह पर स्थानीय सामंत का स्वतंत्रता सेनानी द्वारिका प्रसाद यादव और 56 किसानों पर अत्याचार। उस पर भी मन न भरा तो तीन बार पूरे गांव को राख कर दिया गया। लेकिन इस अग्नि से विरोध की ज्वाला और भी धधक उठी।
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जब महात्मा गांधी ने विदेशी बहिष्कार आंदोलन शुरू किया तब इसकी जानकारी पाकर तेजगढ़ गांव में नमक बनाने की भट्ठी शुरू की गई। तेजगढ़ गांव में नमक की भट्ठी चलने की बात सुनकर स्थानीय सामंत इसकी जानकारी अंग्रेजाें के पास ले गया। फिर अपनी फौज और बांसी थाने की पुलिस लेकर गांव में स्थापित भट्ठी तुड़वा दी और गांव फुंकवा दिया। भट्ठी स्थापित कराने में वाले द्वारिका प्रसाद यादव भागने में सफल हो गए। लेकिन अंग्रेजों ने उनके पिता अयोध्या प्रसाद को बहुत यातनाएं दीं। बाद में पुन: गांव आकर द्वारिका यादव ने लोगों को संगठित किया और सामंत अष्टभुजा प्रसाद चंगेरा के अत्याचार के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। द्वारिका प्रसाद यादव के सहयोगी विशुनसहाय पांडेय, जगन्नाथ मुराव, सीताराम बढ़ई रहे। ग्रामीणों को एकजुटता की भनक लगते ही राजा चंगेरा ने तेजगढ़ को दुबारा जलवा दिया और द्वारिका यादव सहित उनके अन्य सहयोगियों को जबरिया घर से निकालकर उनके घर में दूसरे लोगों को बसा दिया।
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वर्ष 1922 में ब्र्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध असहयोग आंदोलन जोरों पर था। क्षेत्र के तेजगढ़ के अलावा भगौतापुर, अडगड़हवा, मधुकरपुर, हरैया आदि गांवों के लोग भी आंदोलन में शामिल हो गए। संगठन की मजबूती को देखकर गोरखपुर से 13 कांग्रेसी क्षेत्र में पहुंचे और राजा चंगेरा के अत्याचार के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया, जिसमें मिठवल क्षेत्र के गिरी बाबा का महत्वपूर्ण योगदान था। आंदोलन को समाप्त करवाने के लिए राजा चंगेरा ने सभी आंदेालनकारियों के पैर घोड़े में बांधकर मीलों घसीटा। समय बीता 1942 में करो या मरो नारे का यहां व्यापक असर पड़ा। बांसी आर्य समाज मंदिर में कांग्रेसियों ने द्वारिका प्रसाद यादव की अगुवाई में गुप्त बैठक कर बांसी तहसील का खजाना लूटने, बांसी उसका टेलीफोन लाइन काटने तथा बांसी थाने में पर कब्जा करने की योजना बनाई। 21 अगस्त 1942 की रात्रि में इस योजना को अमल में लाया गया। मधुकरपुर गांव के पास बांसी उसका टेलीफोन लाइन काट दी गई लेकिन मुखबिरी के कारण यह योजना सार्थक नहीं हुई और अंग्रेजों ने क्षेत्र के 56 किसानों को गिरफ्तार कर उन्हें जेल में डाल दिया। साथ ही इनसे मनमाना जुर्माना वसूला गया। लोगों से बदला लेने के लिए एक बार फिर राजा चंगेरा ने तेजगढ़ गांव को जलवा दिया। आजादी के बाद तेजगढ़ गांव को अलग पहचान देने के लिए तत्कालीन केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री के डी. मालवीय की पुत्री आशा सेठ ने गांधी ग्राम के नाम से नवाजा और अंग्रेजों के कहर का शिकार हुए 56 किसानों के सम्मान में सिला पट्टिक ा भी लगवाई।
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चंगेरा को मारने के लिए आए आजाद
बांसी के सामंत अष्टभुजा प्रसाद चंगेरा के बढ़ते अत्याचारों को समाप्त करने के लिए स्वतंत्रा संग्राम के महान सेनानी चंद्रशेखर आजाद ने इस क्षेत्र में गुप्त प्रवास किया था, जिससे बहुत कम लोग परिचित हैं। बताते हैं कि 1922 से 1942 के बीच की बात है, बांसी में अंग्रेजों के पिछलग्गू सामंत राजा अष्टभुजा प्रसाद चंगेरा ने तेजगढ़ गांव को तीसरी बार जलवा कर किसानों को जेल में बंद करा दिया। तब बांसी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लाला हरनारायण ने किसानों पर हो रहे अत्याचार की बात चंद्रशेखर आजाद तक पहुंचाई। इसके बाद आजाद यहां राजा चंगेरा को भेष बदलकर मारने आ पहुंचे। उन्हें तिवारीपुर गांव में शेषदत्त त्रिपाठी के घर मित्र बनाकर ठहराया गया। वह 14 दिन तक स्थानीय भेष भूषा में यहां रहे। गुप्तचरों की सूचना पर राजा चंगेरा को इस बात की जानकारी हो गई। राजा मौका देख भाग खड़ा हुआ और आजाद अपने मकसद में सफल नहीं हो सके। आजाद भले ही अपने मकसद में सफल न हो सके हो लेकिन अपने प्रवास के दौरान आजाद ने स्थानीय ग्रामीणों में स्वतंत्रता की जो अलख जगाई थी, उसके बल बूते पर यहां के 56 किसान लंबे समय तक अंग्रेजों से मोर्चा लेते रहे। आजादी के बाद वर्ष 2000 में तेजगढ़ गांव में तत्कालीन उद्यान मंत्री धनराज यादव ने अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की यादों को जिंदा रखने के लिए एक पार्क और स्मारक निर्मित कराया।
क्रांति की स्मृतियों पर चढ़ी उपेक्षा की ध
सिद्धार्थनगर। स्वतंत्रता सेनानी दिवंगत बुधई राम के बलिदान को आज तक शोहरतगढ़वासी नहीं भुला पाए हैं। तत्कालीन मंत्री दिवंगत दिनेश सिंह ने इनकी स्मृतिमें सवा तीन लाख की लागत से कस्बे के अंबेडकरनगर वार्ड में स्मृति पार्क का शिलान्यास 11 अक्टूबर 2005 को किया था। इस स्मृति पार्क को प्रकाशमान रखने के उद्देश्य से हाईमास्ट और बिजली व्यवस्था पर हजारों रुपये खर्च किए गए। पार्क में सुबह-शाम घूमने आने वालों नागरिकों के बैठने के लिए दस सीमेंट की सीटों का भी निर्माण भी हुआ। साथ ही विभिन्न प्रजातियों के फूलों के पौधे भी लगाए गए थे। मगर आज यहां बदहाली है। आलम यह है कि जनरेटर के अलावा साइकिल रखने के रूप में इस पार्क का इस्तेमाल किया जा रहा है।

स्वतंत्रता आंदोलनों में शोहरतगढ़ का सेनानियों के लिए सुरक्षित पनाहगार बना था। इस स्थान पर नित्य प्रतिदिन देश को आजाद करने के लिए गतिविधियां संचालित होती थीं। पुलिस भी इस स्थान को अतिसंवेदनशील मानते हुए अक्सर इस स्थल पर छापेमारी करती रहती थी। दिवंगत बुधई राम अपने अभिन्न मित्र दिवंगत परमेश्वर दत्त पांडेय के साथ दर्जनों बार जेल गए। अंग्रेजों को शिकस्त देने की योजनाएं इसी स्थल से बनाई जाने के कारण अंग्रेजों की कुदृष्टि इस स्थल पर विशेष रूप से रहती थी। 29 अप्रैल 1930 को क्रांतिकारियों की बैठक होनी थी। किसी मुखबिर ने इसकी सूचना अंग्रेज पुलिस वालों को दी। दिवंगत बुधईराम ने दो घंटे पूर्व ही बैठक समाप्त कर दी थी। जब पुलिस ने दबिश दी तो परमेश्वर दत्त पांडेय और बुधई राम को पुलिस ने पकड़ लिया। इन दोनों सेनानियों को अंग्रेज पुलिस ने बर्बरतापूर्वक घोड़े के टापों से रौंदा। इसमें बुधईराम के सिर में गंभीर चोटें आईं और मौके पर ही इनकी मौत हो गई। जबकि परमेश्वर दत्त का देहांत जेल कैंप लखनऊ में हुआ। इनके देशभक्ति के कारनामों को जिंदा रखने के लिए मंत्री दिवंगत दिनेश सिंह ने वर्ष 2005 में अंबेडकरनगर में स्मृति स्मारक पार्क का निर्माण कराया। नगर पंचायत को इसकी देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी गई। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अलावा इस पार्क की सुधि कभी नहीं ली जाने के कारण यह स्मारक की फर्श भी दरकने लगी है। पौधों की स्थिति भी अत्यन्त खराब है। सीटें टूटकर अपनी बदहाली की दास्तां स्वयं बयां कर रही हैं।
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