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Shravasti News: थाईलैंड से पहुंचे दल ने गंधकुटी पर की प्रार्थना
Thu, 20 Mar 2025 12:33 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, श्रावस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, श्रावस्ती
Updated Thu, 20 Mar 2025 12:33 AM IST
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तपोस्थली स्थित गंधकुटी पर मौजूद भिक्षु व अनुयायी।
कटरा (श्रावस्ती)। बुद्ध की तपोस्थली श्रावस्ती बुधवार को अनुयायियों से गुलजार रही। तपोस्थली पहुंचे थाईलैंड के 45 सदस्यीय दल ने भिक्षु देवानंद के नेतृत्व में गंधकुटी पर प्रार्थना की। इसके बाद दल के सदस्यों ने तपोस्थली का भ्रमण किया।
भिक्षु देवानंद ने कहा कि भगवान बुद्ध जब पाटलिपुत्र पहुंचे, तो राजा बिंबिसार ने कीमती हीरे, मोती और रत्न उन्हें पेश किए। इसके बाद मंत्रियों, सेठों, साहूकारों ने उपहार उन्हें अर्पित किए और बुद्धदेव ने उन सबको एक हाथ से स्वीकार कर लिया। इतने में एक बुजुर्ग महिला लाठी टेकते वहां आई। बुद्धदेव को प्रणाम कर वह बोली, भगवन जिस समय आपके आने का समाचार मिला, उस समय मैं यह अनार खा रही थी। मेरे पास कोई दूसरी चीज न होने के कारण मैं इस अधखाए फल को ही ले आई हूं। भगवान बुद्ध ने दोनों हाथ सामने कर वह फल ग्रहण किया। राजा बिंबिसार ने जब यह देखा तो उन्होंने बुद्धदेव से पूछा कि हम सबने आपको कीमती और बड़े-बड़े उपहार दिए जिन्हें आपने एक हाथ से ग्रहण किया, लेकिन जूठे फल को दोनों हाथों से ग्रहण किया, ऐसा क्यों। यह सुन बुद्धदेव बोले कि राजन आप सबने बहुमूल्य उपहार दिए हैं, लेकिन यह सब आपकी संपत्ति का दसवां हिस्सा भी नहीं है। आपने यह दान दीन व गरीबों की भलाई के लिए नहीं किया है। इसलिए आपका यह दान सात्विक दान की श्रेणी में नहीं आ सकता। इसके विपरीत इस वृद्ध ने अपने मुंह का कौर ही मुझे दे डाला है। भले ही यह वृद्ध निर्धन है, लेकिन इसे संपत्ति की कोई लालसा नहीं है। यही कारण है कि इसका दान मैंने खुले हृदय से स्वीकारा।
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भिक्षु देवानंद ने कहा कि भगवान बुद्ध जब पाटलिपुत्र पहुंचे, तो राजा बिंबिसार ने कीमती हीरे, मोती और रत्न उन्हें पेश किए। इसके बाद मंत्रियों, सेठों, साहूकारों ने उपहार उन्हें अर्पित किए और बुद्धदेव ने उन सबको एक हाथ से स्वीकार कर लिया। इतने में एक बुजुर्ग महिला लाठी टेकते वहां आई। बुद्धदेव को प्रणाम कर वह बोली, भगवन जिस समय आपके आने का समाचार मिला, उस समय मैं यह अनार खा रही थी। मेरे पास कोई दूसरी चीज न होने के कारण मैं इस अधखाए फल को ही ले आई हूं। भगवान बुद्ध ने दोनों हाथ सामने कर वह फल ग्रहण किया। राजा बिंबिसार ने जब यह देखा तो उन्होंने बुद्धदेव से पूछा कि हम सबने आपको कीमती और बड़े-बड़े उपहार दिए जिन्हें आपने एक हाथ से ग्रहण किया, लेकिन जूठे फल को दोनों हाथों से ग्रहण किया, ऐसा क्यों। यह सुन बुद्धदेव बोले कि राजन आप सबने बहुमूल्य उपहार दिए हैं, लेकिन यह सब आपकी संपत्ति का दसवां हिस्सा भी नहीं है। आपने यह दान दीन व गरीबों की भलाई के लिए नहीं किया है। इसलिए आपका यह दान सात्विक दान की श्रेणी में नहीं आ सकता। इसके विपरीत इस वृद्ध ने अपने मुंह का कौर ही मुझे दे डाला है। भले ही यह वृद्ध निर्धन है, लेकिन इसे संपत्ति की कोई लालसा नहीं है। यही कारण है कि इसका दान मैंने खुले हृदय से स्वीकारा।
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