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पराली प्रबंधन कर बढ़ा रहे भूमि की उर्वरा शक्ति

Wed, 18 Nov 2020 09:44 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 18 Nov 2020 09:44 PM IST
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Increasing fertility of land by managing stubble
श्रावस्ती। किसान फसल काटने के बाद धान की पराली को खेतों में जला देते थे। इससे जहां भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट होती थी, वहीं प्रदूषण भी बढ़ता था। जिसे देखते हुए शासन ने न सिर्फ इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया, बल्कि पराली जलाने वाले किसानों पर कार्रवाई भी की जा रही है। ऐसे में जमुनहा क्षेत्र में किसानों की ओर से शुरू की गई एक नई पहल उनके लिए वरदान साबित हो रही है। पराली प्रबंधन अपनाकर आसपास के किसान जहां खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ा रहे हैं वहीं फसल की पैदावार भी अच्छी हो रही है।
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श्रावस्ती कृषि प्रधान जिला होने के बावजूद यहां 80 फीसदी किसान अब पशु आधारित की जगह मशीन के सहारे खेती कर रहे हैं। भूसा व पुआल की आवश्यकता नहीं होने के कारण किसान अपनी फसल को कंबाइन मशीन से कटा रहे हैं। वहीं खेतों में बची पराली व डंठल को खेतों में ही जला देते हैं।
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इससे जहां वातावरण में प्रदूषण का मानक बढ़ता है वहीं आसपास के खेतों में लगी फसलों के नष्ट होने का खतरा बना रहता है। उधर खेतों में जीवाश्म व जीवाणुओं के मर जाने से उर्वरक क्षमता भी कम होती है। इसे देखते हुए शासन ने न सिर्फ कंबाइन मशीन से फसल कटाई पर रोक लगाई है, बल्कि पराली जलाने वाले किसानों के विरुद्ध मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेजने के साथ ही उनसे जुर्माना भी वसूलने का निर्देश दिया है।
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ऐसे में जमुनहा क्षेत्र के जमुनहा भवनियापुर निवासी एक किसान वेदमित्र आर्य पुत्र ओमप्रकाश की पराली प्रबंधन की तकनीक किसानों को लाभ पहुंचा रही है। इसे अपनाकर आसपास के किसान न सिर्फ अपनी पैदावार बढ़ा रहे हैं, बल्कि इससे खेतों की उर्वरा शक्ति भी बढ़ रही है।
वेदमित्र बताते हैं कि वह पिछले कई सालों से पराली प्रबंधन करते रहे हैं। इससे गेहूं के खेत में पराली से छाया तो मिलती ही है। साथ ही खेतों में अनावश्यक घास फूस भी नहीं होती है। फसल में पहली बार पानी देने से ही यूरिया डालने के बाद से पराली जमीन से चिपक जाती है। इससे खेत में नमी भी बरकरार रखती है। इससे पौधों का विकास भी अच्छा होता है और उपज भी काफी बढ़ जाती है।
वेदमित्र ने इंटर तक कृषि विषय से पढ़ाई की है। इंटरमीडिएट के बाद से ही वह खेती के कार्यों में रुचि लेने लगा। पिछले तीन वर्षों से लगातार वह अपने खेतों में धान काटने के बाद पराली को एकत्र करके खेत में ही एक स्थान पर लगा देता है। इसके साथ ही गेहूं बोने के बाद में पराली को ऊपर से एक परत के रूप में डाल देता है।
इससे गेहूं के पौधों के अंकुरण में कोई रुकावट नहीं होती है। बीज बोने के बाद पहली बार पानी लगाने व यूरिया डालने के बाद पराली खाद के रूप में परिवर्तित हो जाती है। इससे पैदावार काफी अच्छी होती है। इस विधि को घुमना, बासीगढ़ी आदि गांव में भी किसान अपनाकर लाभ ले रहे हैं।

पोषक तत्वों के अभाव में खेत अनुत्पादक होते हैं। इससे खेत धीरे धीरे बंजर हो जाते हैं। किसानों को चाहिए कि वह यह नई तकनीक अपनाएं या फिर पराली को बेचकर अतिरिक्त आय प्राप्त करें। ऐसा करने से खेतों में पोषक तत्वों की वृद्धि होगी। - आरपी राना, जिला कृषि अधिकारी
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