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मदिरा पान सामाजिक बुराई, इससे रहें दूर
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कटरा (श्रावस्ती)। जिला ग्राम्य विकास विभाग बहराइच की ओर से सोमवार को महामाया राजकीय महाविद्यालय इकौना में एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। मद्य निषेध विभाग की ओर से आयोजित इस कार्यशाला में मौजूद छात्र-छात्राओं को मदिरापान से होने वाले दुष्प्रभाव के बारे में जागरूक किया गया।
कार्यशाला में महाविद्यालय के प्राचार्य धर्मेंद्र कुमार गुप्ता ने कहा कि मदिरापान एक सामाजिक बुराई है। मदिरा पीने से आनंद का अनुभव होता है इसमें संदेह नहीं। परंतु मदिरा पीने के पश्चात मनुष्य में तर्क करने की शक्ति खत्म हो जाती है। वह अच्छे-बुरे और नैतिक-अनैतिक में फर्क नहीं कर पाता। उसका दिमाग शिथिल पड़ जाता है और वह विवेक शून्य हो जाता है।
जिला प्रशिक्षण अधिकारी चंद्र कुमार वर्मा ने कहा कि शराबबंदी पर कानून की धारा 21 के तहत संविधान ने राज्यों को अधिकार दिया है कि वह सार्वजनिक सम्मति के अनुसार शराबबंदी के नियमों को बनाएं। देश में भी इस विषय में तीव्र मतभेद है कि क्या शराबबंदी को कानून द्वारा बंद करना उचित है या सार्वजनिक सम्मति उत्पन्न करके सामाजिक सुधार के रूप में इसे धीरे-धीरे प्रचलित करना चाहिए।
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समाजसेवी प्रदीप बौद्ध ने कहा कि शराब बंदी के विरोध में तर्क विरोधियों का कथन है कि सदाचार को बलपूर्वक उत्पन्न नहीं किया जा सकता। इसे तो शिक्षा द्वारा बचपन से चरित्र में अंकित किया जा सकता है। विरोधियों का यह भी कथन है कि शराबबंदी से राष्ट्रीय आय में व्यर्थ की कमी उत्पन्न हो जाएगी। भारत की आमदनी पहले से ही कम है और शिक्षा, स्वास्थ्य, निर्माण आदि के अनेकों कार्य इसी कमी के कारण रुके पड़े हैं। इस मौके पर इंदु गौतम, प्रोफेसर दिलीप कुमार, उपेंद्र कुमार सोनी सहित काफी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहीं।
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कार्यशाला में महाविद्यालय के प्राचार्य धर्मेंद्र कुमार गुप्ता ने कहा कि मदिरापान एक सामाजिक बुराई है। मदिरा पीने से आनंद का अनुभव होता है इसमें संदेह नहीं। परंतु मदिरा पीने के पश्चात मनुष्य में तर्क करने की शक्ति खत्म हो जाती है। वह अच्छे-बुरे और नैतिक-अनैतिक में फर्क नहीं कर पाता। उसका दिमाग शिथिल पड़ जाता है और वह विवेक शून्य हो जाता है।
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जिला प्रशिक्षण अधिकारी चंद्र कुमार वर्मा ने कहा कि शराबबंदी पर कानून की धारा 21 के तहत संविधान ने राज्यों को अधिकार दिया है कि वह सार्वजनिक सम्मति के अनुसार शराबबंदी के नियमों को बनाएं। देश में भी इस विषय में तीव्र मतभेद है कि क्या शराबबंदी को कानून द्वारा बंद करना उचित है या सार्वजनिक सम्मति उत्पन्न करके सामाजिक सुधार के रूप में इसे धीरे-धीरे प्रचलित करना चाहिए।
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समाजसेवी प्रदीप बौद्ध ने कहा कि शराब बंदी के विरोध में तर्क विरोधियों का कथन है कि सदाचार को बलपूर्वक उत्पन्न नहीं किया जा सकता। इसे तो शिक्षा द्वारा बचपन से चरित्र में अंकित किया जा सकता है। विरोधियों का यह भी कथन है कि शराबबंदी से राष्ट्रीय आय में व्यर्थ की कमी उत्पन्न हो जाएगी। भारत की आमदनी पहले से ही कम है और शिक्षा, स्वास्थ्य, निर्माण आदि के अनेकों कार्य इसी कमी के कारण रुके पड़े हैं। इस मौके पर इंदु गौतम, प्रोफेसर दिलीप कुमार, उपेंद्र कुमार सोनी सहित काफी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहीं।