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यहां विकास कभी नहीं बना मुद्दा, जाति-धर्म पर होता रहा चुनाव

Sun, 23 Jan 2022 11:15 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 23 Jan 2022 11:15 PM IST
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Development never became an issue here, elections were held on caste-religion
श्रावस्ती। चुनाव में विकास जिले का कभी भी मुद्दा नहीं रहा। इसीलिए किसी भी प्रत्याशी ने अपना स्थानीय स्तर पर संकल्प पत्र यहां जारी ही नहीं किया। यहां चुनाव का 1962 से लेकर 2012 तक केवल एक ही मुद्दा था वह था हिंदू बनाम मुस्लिम। इसीलिए यहां सभी दलों को प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला।
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राजनीति का आधार ही विकास है। भले ही राजनीतिक दल उसे पूरा न करें। इसके बावजूद चुनाव के दौरान स्थानीय स्तर पर चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी अपना-अपना संकल्प पत्र जारी करते हैं। वह अपने होल्डिंग में इस बात का अब तक उल्लेख करते आए हैं कि वह जब जीतेंगे तो क्या करेंगे। लेकिन श्रावस्ती जिले की दोनों विधानसभा सीटों में यह नियम व परंपरा कभी भी लागू नहीं हुई। यहां चुनाव का मुद्दा कभी भी विकास नहीं बन पाया। जबकि देखा जाए तो 1997 में गठित इस जिले में समस्या ही समस्या है। यहां आवागमन के लिए निजी बसों की ओर देखना पड़ा रहा है।
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एक लंबा समय बीत जाने के बाद इस जनपद को बस डिपो नहीं मिल पाया। उत्तर प्रदेश का संभवत: यह इकलौता जिला है जिसका एक कोना भी रेलवे लाइन को नहीं छूता। प्रतिवर्ष राप्ती नदी में आने वाली बाढ़ लाखों लोगों को विस्थापित कर देती है। शिक्षा के नाम पर परिषदीय व माध्यमिक स्कूल हैं। जिले में 12 लाख आबादी पर मात्र एक राजकीय डिग्री कॉलेज है। चिकित्सा के क्षेत्र में भी संयुक्त जिला चिकित्सालय केवल रेफरल इकाई के रूप में कार्यरत है। यह वह मुद्दे हैं जिनका सामना प्रतिदिन सभी को करना होता है।
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इसके अलावा सिंचाई के संसाधन न होना, भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र के गांवों की अपनी कई समस्याएं हैं। जिले की दो तहसील जिला मुख्यालय से जुड़ी नहीं हैं। जिसके चलते सुबह घर से निकले लोग देर रात वापस पहुंच पाते हैं। जबकि दूरी 30-35 किलोमीटर हीे है। यह सब समस्याएं ऐसी हैं जिनसे जीवन चलाना भी कठिन हो जाता है। इसके बावजूद यह कभी भी स्थानीय स्तर पर विधानसभा चुनाव में मुद्दा नहीं बन पाया। लेकिन चुनाव हर पांच वर्ष में होता है और उसका आधार केवल धार्मिक समीकरण ही होता है।

1962 से 2012 तक धर्म ही रहा चुनावी मुद्दा
श्रावस्ती 1952 में बहराइच का ही अंग हुआ करता था। उस समय इकौना पूर्वी व पश्चिमी के नाम से 1952 में पहला चुनाव हुआ। जिसे भिनगा व इकौना विधानसभा का नाम दिया गया। 1952 में कांग्रेस के आरके राव भिनगा विधानसभा में व बाबू शिवशरण लाल इकौना विधानसभा क्षेत्र से जीतकर सदन पहुंचे। यह जोड़ी 1957 में भी कायम रही। यह वह दौर था जब वोट का प्रतिशत 12 से 13 प्रतिशत के बीच होता था। यह वह लोग थे जो जिले की राजनीति का चेहरा हुआ करते थे। इनका योगदान स्वतंत्रता आंदोलन में भी था। 1962 आते-आते स्थिति बदली। देश में कांग्रेस के खिलाफ स्वतंत्र पार्टी ने मोर्चा खोल दिया। उस समय मुन्नू सिंह व इकौना से मंगल प्रसाद चुनाव जीते। यहीं से राष्ट्रीय मुद्दों व उसका प्रभाव जिले में समाप्त हो गया। यहीं से धार्मिक समीकरण पर चुनाव हुआ। दोनों विधानसभाओं में 2012 तक हिंदू बनाम मुस्लिम का मुद्दा छाया रहा। इस मुद्दे का लाभ सपा, बसपा, भाजपा व जनसंघ सभी को हुआ। हर चुनाव में जीतने वाला यदि हिंदू होता था तो उससे हारने वाला मुस्लिम, वहीं तीन बार भिनगा विधानसभा में तो एक बार इकौना जिसे आज श्रावस्ती विधानसभा कहते हैं वहां मुस्लिमों को प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। दोनों चुनाव में इन लोगों से हारने वाला हिंदू प्रत्याशी ही था। जीतने वाला दल बदलता रहा लेकिन समीकरण वहीं का वहीं कायम रहा।
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