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करमूखेड़ी से उठी थी किसानों की पहली आवाज
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, शामली
Updated Tue, 13 Dec 2016 12:14 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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शामली। 30 साल से लगातार किसान की लाठी बनकर भाकियू देश का बड़ा किसान संगठन बन चुका है। संगठन ने पहली बार 13 दिसंबर 1986 में करमूखेड़ी बिजलीघर पर किसानों की आवाज को बुलंद किया था। मंगलवार को भाकियू के आंदोलन की वर्षगांठ है।
हरियाणा के कंझावला के किसान नेता चौधरी बलवीर सिंह ने भाकियू की स्थापना करके शामली के किसानों को बिजली-गन्ना की समस्याओं के खिलाफ लड़ने का मंत्र फुंका था। किसान आंदोलन के जनक हरियाणा के कंझावला गांव के बलवीर सिंह के साथ देवेंद्र सोंटा, डॉ. सतेंद्र भौराखुर्द, जयदेव आदि किसान जुड़ गए।
करमूखेड़ी बिजलीघर पर तीन दिन तक चले धरना में कोई भी अफसर नहीं पहुंचा था। किसान अफसरों को एक माह का एल्टीमेटम देकर अपना बेमियादी धरना समाप्त करके चले गए। 25 जनवरी 1987 में किसानों ने फिर भाकियू ने दोबारा धरना दिया था। जिसके बाद बालियान खाप के चौधरी महेंद्र सिंह
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टिकैत को सिसौली में एक पंचायत में किसानों के आंदोलन भाकियू की बागडोर सौंपी गई।
उन्होंने भाकियू को मजबूत करने के उद्देश्य से देशखाप, गठवाला खाप, बत्तीसा खाप को जोड़ा। देशखाप के चौधरी सुखवीर सिंह, छपरौली के कैप्टन भोपाल सिंह, चौगामा खाप के चौधरी मांगेराम पंवार, गठवाला के चौधरी हरिकिशन मलिक समेत सभी खापो को किसानों को एक मार्च 1987 को करमूखेड़ी बिजलीघर धरने का ऐलान किया गया।
एक मार्च 1987 को किसानों की भीड़ के सामने प्रशासन टिक नही सका। निहत्थे किसानो पर पुलिस एवं पीएसी की गोली से जयपाल सिंह मलिक लिसाढ़, अकबर अली सिंभालका शहीद हो गए। जिसके बाद गुस्साए किसानों ने करमूखेड़ी बिजलीघर को फूूंक दिया था। इस हंगामे में एक पीएसी का जवान की मौत भी हो गई थी।
एक अप्रैल की रैली के बाद हुए थे बिजली बिल माफ
शामली। एक अप्रैल 1987 को करमू बिजलीघर पर रैली में स्वामी अग्निवेश समेत देश भर के किसानों नेताओं ने हिस्सा लिया। रैली में दूसरे दिन बिजली के बिल माफ करने की कर मांग उठी। भाकियू की रैली के बाद वीर बहादुर सिंह की सरकार झुक गई और किसानों के बिजली माफ करने की घोषणा की गई।
किसानों के आग्रह पर तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह सिसौली में 11 अगस्त 1987 को आए। मेरठ के रजक नगर, पांच किसानों की मौत के बाद जेल भरो आंदोलन मेेरठ कमिश्नरी आंदोलन, 25 अक्तूबर 1988 को दिल्ली वोट क्लब, तीन अगस्त 1989 नईमा कांड को लेकर भोपा में 39 दिनों तक आंदोलन चलाया गया। आंदोलन से नईमा कांड के बाद किसानों का न्याय मिला।
‘सुविधाएं देकर गांवों से पलायन रोकना होगा’
शामली। भाकियू अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत ने कहा है कि पलायन को रोकने के लिए गांवों में शहर जैैैसी सुविधाएं देनी होंगी। बिजली विभाग में भ्रष्टाचार, फसलों के कम मूल्य से किसान त्रस्त थे।
जिससे भाकियू को आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। पिछले तीस सालों में किसानों के हालात बदले हैं। 40 रुपये से लेकर गन्ने का भाव 300 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचा है। बिजली आपूर्ति में सुधार हुआ है और बिजली बिल जमा कराने की सुविधा के लिए प्रदेश सरकार ने ओटीएस स्कीम लागू की है। भाकियू के संघर्ष से किसानों के हालात सुधरे हैं। नरेश टिकैत ने साफ किया कि सरकार को किसानों के हित के लिए बेहतर कदम उठाने होंगे। उनकी फसल के वाजिब दाम दिलाना होगा, तभी गांवों से पलायन रुकेगा।
सिसौली में बनी भाकियू की राजधानी
शामली। किसानों के आंदोलन के बाद सिसौली किसानों के भाकियू की राजधानी बनाई गई। हर माह की 17 तारीख को पंचायत होती थी। हर किसान आंदोलन की रणनीति सिसौली मुख्यालय पर तैयार होती थी। किसान आंदोलन से प्रभावित होकर मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक सिसौली पहुंचे।
17 सितंबर 1990 को सिसौली में प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी आए। 17 सितंबर 1993 में डंकल प्रस्ताव के विरोध में दिल्ली लालकिला पर रैली आयोजित की गई। दस अगस्त 1996 को सिसौली में प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा पहुंचे। किसानों की जंग लड़ते हुए किसानों के मसीहा बाबा टिकैत 15 मई 2011 को जीवन की अंतिम सांस ली। मौजूदा दौर में भाकियू की कमान उनके बड़े पुत्र चौधरी नरेश टिकैत के पास है। उनका कहना है कि पिछले 30 सालों में भाकियू के आंदोलन में बदलाव आए हैं।
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हरियाणा के कंझावला के किसान नेता चौधरी बलवीर सिंह ने भाकियू की स्थापना करके शामली के किसानों को बिजली-गन्ना की समस्याओं के खिलाफ लड़ने का मंत्र फुंका था। किसान आंदोलन के जनक हरियाणा के कंझावला गांव के बलवीर सिंह के साथ देवेंद्र सोंटा, डॉ. सतेंद्र भौराखुर्द, जयदेव आदि किसान जुड़ गए।
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करमूखेड़ी बिजलीघर पर तीन दिन तक चले धरना में कोई भी अफसर नहीं पहुंचा था। किसान अफसरों को एक माह का एल्टीमेटम देकर अपना बेमियादी धरना समाप्त करके चले गए। 25 जनवरी 1987 में किसानों ने फिर भाकियू ने दोबारा धरना दिया था। जिसके बाद बालियान खाप के चौधरी महेंद्र सिंह
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टिकैत को सिसौली में एक पंचायत में किसानों के आंदोलन भाकियू की बागडोर सौंपी गई।
उन्होंने भाकियू को मजबूत करने के उद्देश्य से देशखाप, गठवाला खाप, बत्तीसा खाप को जोड़ा। देशखाप के चौधरी सुखवीर सिंह, छपरौली के कैप्टन भोपाल सिंह, चौगामा खाप के चौधरी मांगेराम पंवार, गठवाला के चौधरी हरिकिशन मलिक समेत सभी खापो को किसानों को एक मार्च 1987 को करमूखेड़ी बिजलीघर धरने का ऐलान किया गया।
एक मार्च 1987 को किसानों की भीड़ के सामने प्रशासन टिक नही सका। निहत्थे किसानो पर पुलिस एवं पीएसी की गोली से जयपाल सिंह मलिक लिसाढ़, अकबर अली सिंभालका शहीद हो गए। जिसके बाद गुस्साए किसानों ने करमूखेड़ी बिजलीघर को फूूंक दिया था। इस हंगामे में एक पीएसी का जवान की मौत भी हो गई थी।
एक अप्रैल की रैली के बाद हुए थे बिजली बिल माफ
शामली। एक अप्रैल 1987 को करमू बिजलीघर पर रैली में स्वामी अग्निवेश समेत देश भर के किसानों नेताओं ने हिस्सा लिया। रैली में दूसरे दिन बिजली के बिल माफ करने की कर मांग उठी। भाकियू की रैली के बाद वीर बहादुर सिंह की सरकार झुक गई और किसानों के बिजली माफ करने की घोषणा की गई।
किसानों के आग्रह पर तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह सिसौली में 11 अगस्त 1987 को आए। मेरठ के रजक नगर, पांच किसानों की मौत के बाद जेल भरो आंदोलन मेेरठ कमिश्नरी आंदोलन, 25 अक्तूबर 1988 को दिल्ली वोट क्लब, तीन अगस्त 1989 नईमा कांड को लेकर भोपा में 39 दिनों तक आंदोलन चलाया गया। आंदोलन से नईमा कांड के बाद किसानों का न्याय मिला।
‘सुविधाएं देकर गांवों से पलायन रोकना होगा’
शामली। भाकियू अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत ने कहा है कि पलायन को रोकने के लिए गांवों में शहर जैैैसी सुविधाएं देनी होंगी। बिजली विभाग में भ्रष्टाचार, फसलों के कम मूल्य से किसान त्रस्त थे।
जिससे भाकियू को आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। पिछले तीस सालों में किसानों के हालात बदले हैं। 40 रुपये से लेकर गन्ने का भाव 300 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचा है। बिजली आपूर्ति में सुधार हुआ है और बिजली बिल जमा कराने की सुविधा के लिए प्रदेश सरकार ने ओटीएस स्कीम लागू की है। भाकियू के संघर्ष से किसानों के हालात सुधरे हैं। नरेश टिकैत ने साफ किया कि सरकार को किसानों के हित के लिए बेहतर कदम उठाने होंगे। उनकी फसल के वाजिब दाम दिलाना होगा, तभी गांवों से पलायन रुकेगा।
सिसौली में बनी भाकियू की राजधानी
शामली। किसानों के आंदोलन के बाद सिसौली किसानों के भाकियू की राजधानी बनाई गई। हर माह की 17 तारीख को पंचायत होती थी। हर किसान आंदोलन की रणनीति सिसौली मुख्यालय पर तैयार होती थी। किसान आंदोलन से प्रभावित होकर मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक सिसौली पहुंचे।
17 सितंबर 1990 को सिसौली में प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी आए। 17 सितंबर 1993 में डंकल प्रस्ताव के विरोध में दिल्ली लालकिला पर रैली आयोजित की गई। दस अगस्त 1996 को सिसौली में प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा पहुंचे। किसानों की जंग लड़ते हुए किसानों के मसीहा बाबा टिकैत 15 मई 2011 को जीवन की अंतिम सांस ली। मौजूदा दौर में भाकियू की कमान उनके बड़े पुत्र चौधरी नरेश टिकैत के पास है। उनका कहना है कि पिछले 30 सालों में भाकियू के आंदोलन में बदलाव आए हैं।