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‘सोने की चिड़िया का कैसा हाल बनाया है’
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शामली। लॉकडाउन के चलते माटी की सुगंध पटल से ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवियों ने देश के शहीदों को समर्पित रचनाएं प्रस्तुत कर उन्हें श्रद्धांजलि दीं। मेरठ से सुषमा सवेरा ने सरस्वती वंदना के साथ कवि सम्मेलन की शुरूआत की।
दिल्ली के राष्ट्रीय गीतकार डा. जयसिंह आर्य ने सुनाया कि बेशर्मी को अब फैशन का नाम मिला कैसे?, नंगेपन के विज्ञापन का दाम मिला कैसे ?, किसको दोषी ठहराएं, माया की माया है, सोने की चिड़िया का कैसा हाल बनाया है। हरगोविंद झांब कमल ने पढ़ा नहीं मानने को मैँ तैयार, चरखे से आजादी आई है। हुई हजारों की शहादत, हजारों ने जान गंवाई है। डा. सविता चड्ढा ने अपनी गजल बेशक सच कड़वा होता है, लेकिन सच सच्चा होता है, प्रस्तुत की। विजय प्रेमी का काव्यांश हिंदी के बिना न हिंदुस्तान का है अर्थ कोई, हिंदी हिंद-चेतना की पहली मुस्कान है। राजकुमार रंजन ने तूफानों से घबराए फिर अरमानों का क्या होगा ? दृढ़ता से यदि नहीं अड़े तो, चट्टानों का क्या होगा। प्रेम सागर प्रेम ने शहीदों को सम्मान दिया जो मान मिला सम्मान मिला, तुम पूर्णरूप अधिकारी थे। जन, गण, मन करता नमन तुम्हें, खुद परमेश्वर अधिकारी थे। भारत भूषण वर्मा ने कहा कि शहीदों को नमन मेरा जो न फिर लौट के आएंगे। छाप धरती के सीने पर वो अपनी छोड़ जाएंगे। इनके अतिरिक्त डा. सीमा विजयवर्गीय अलवर, संध्या सरल दिल्ली, तरुणा पुंडीर तरुनिल दिल्ली, सरिता गुप्ता दिल्ली, सुषमा सवेरा प्रीतम सिंह प्रीतम शामली, ओमप्रकाश श्रीवास्तव दतिया आदि ने अपनी ओजस्वी कविताओं से शहीदों को श्रद्धांजलि दी। संचालन डा. सीमा विजयवर्गीय अलवर ने किया।
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शामली। लॉकडाउन के चलते माटी की सुगंध पटल से ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवियों ने देश के शहीदों को समर्पित रचनाएं प्रस्तुत कर उन्हें श्रद्धांजलि दीं। मेरठ से सुषमा सवेरा ने सरस्वती वंदना के साथ कवि सम्मेलन की शुरूआत की।
दिल्ली के राष्ट्रीय गीतकार डा. जयसिंह आर्य ने सुनाया कि बेशर्मी को अब फैशन का नाम मिला कैसे?, नंगेपन के विज्ञापन का दाम मिला कैसे ?, किसको दोषी ठहराएं, माया की माया है, सोने की चिड़िया का कैसा हाल बनाया है। हरगोविंद झांब कमल ने पढ़ा नहीं मानने को मैँ तैयार, चरखे से आजादी आई है। हुई हजारों की शहादत, हजारों ने जान गंवाई है। डा. सविता चड्ढा ने अपनी गजल बेशक सच कड़वा होता है, लेकिन सच सच्चा होता है, प्रस्तुत की। विजय प्रेमी का काव्यांश हिंदी के बिना न हिंदुस्तान का है अर्थ कोई, हिंदी हिंद-चेतना की पहली मुस्कान है। राजकुमार रंजन ने तूफानों से घबराए फिर अरमानों का क्या होगा ? दृढ़ता से यदि नहीं अड़े तो, चट्टानों का क्या होगा। प्रेम सागर प्रेम ने शहीदों को सम्मान दिया जो मान मिला सम्मान मिला, तुम पूर्णरूप अधिकारी थे। जन, गण, मन करता नमन तुम्हें, खुद परमेश्वर अधिकारी थे। भारत भूषण वर्मा ने कहा कि शहीदों को नमन मेरा जो न फिर लौट के आएंगे। छाप धरती के सीने पर वो अपनी छोड़ जाएंगे। इनके अतिरिक्त डा. सीमा विजयवर्गीय अलवर, संध्या सरल दिल्ली, तरुणा पुंडीर तरुनिल दिल्ली, सरिता गुप्ता दिल्ली, सुषमा सवेरा प्रीतम सिंह प्रीतम शामली, ओमप्रकाश श्रीवास्तव दतिया आदि ने अपनी ओजस्वी कविताओं से शहीदों को श्रद्धांजलि दी। संचालन डा. सीमा विजयवर्गीय अलवर ने किया।
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