{"_id":"69445b45bd6176e69a083596","slug":"revised-martyrdom-day-the-secret-of-the-kakori-action-case-was-revealed-by-a-khadi-sheet-shahjahanpur-news-c-122-1-sbly1042-160734-2025-12-19","type":"story","status":"publish","title_hn":"संशोधित-बलिदान दिवस : खादी की चादर से खुला था काकोरी एक्शन केस का राज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
संशोधित-बलिदान दिवस : खादी की चादर से खुला था काकोरी एक्शन केस का राज
विज्ञापन
नगर निगम कार्यालय के बाहर लगीं अमर बलिदानियों की प्रतिमाएं। संवाद
शाहजहांपुर। 19 दिसंबर को काकोरी एक्शन केस के अमर बलिदानियाें का बलिदान दिवस मनाया जाएगा। स्वतंत्रता संग्राम को धार देने के लिए काकोरी रेलवे स्टेशन पर सहारनपुर पैसेंजर ट्रेन को क्रांतिकारियों ने लूटा था। इस लूटकांड का खुलासा खादी की एक चादर से हुआ था। इसके बाद गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू हुआ था।
क्रांतिकारियों ने नौ अगस्त 1925 को काकोरी में ट्रेन लूटने की घटना को अंजाम दिया। ट्रेन डकैती को लेकर पुलिस को प्रमाण नहीं मिले थे। वारदात को अंजाम देने के दौरान रामप्रसाद बिस्मिल ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि कोई भी साथी अपनी कोई चीज ट्रेन में नहीं छोड़ेगा। तब भी एक क्रांतिकारी खादी की चादर को ट्रेन में छोड़ गया। वही चादर पुलिस के हत्थे चढ़ गई थी।
केस की जांच सीआईडी का अधीक्षक हर्टन कर रहा था। संकल्प संस्था के संस्थापक डॉ. अवधेश मणि त्रिपाठी बताते हैं कि कुछ दिन के बाद हर्टन को लूटे गए बड़े नोटों के नंबरों का पता चला, जो शाहजहांपुर के बाजार में चलाए गए थे। पुलिस को मैनपुरी साजिश केस में फरार रामप्रसाद बिस्मिल पर शक बढ़ा और निगरानी शुरू की गई। उसके बाद गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू हुआ था।
विज्ञापन
--
19 दिसंबर को दी गई थी क्रांतिकारियों को फांसी
इतिहासकार डॉ. विकास खुराना बताते हैं कि 19 दिसंबर 1927 को ब्रिटिश हुकूमत की जड़ों को हिलाने वाले काकोरी एक्शन केस के अमर नायकों को फांसी की सजा दी गई थी। बलिदानियों की अमर गाथा ने आजादी के आंदोलन को तेज गति प्रदान की। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से उपजी निराशा के परिणामस्वरूप कई स्वतंत्रता सेनानी सशस्त्र क्रांति की ओर उन्मुख हुए थे। इसका नेतृत्व शाहजहांपुर के पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, ठा. रोशन सिंह ने किया था। उस समय सरकारी खजाने की लूट की चर्चा ब्रिटेन तक के अखबारों में की गई थी। अंग्रेजी सरकार सकते में थी। इस मामले में कुल 40 लोगों को नामजद किया गया। शाहजहांपुर के पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी को आईपीसी की धारा 121 ए, 120 बी के अंतर्गत उम्रकैद व धारा 302 एवं 396 के अंतर्गत फांसी की सजा दी गई।
विज्ञापन
क्रांतिकारियों ने नौ अगस्त 1925 को काकोरी में ट्रेन लूटने की घटना को अंजाम दिया। ट्रेन डकैती को लेकर पुलिस को प्रमाण नहीं मिले थे। वारदात को अंजाम देने के दौरान रामप्रसाद बिस्मिल ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि कोई भी साथी अपनी कोई चीज ट्रेन में नहीं छोड़ेगा। तब भी एक क्रांतिकारी खादी की चादर को ट्रेन में छोड़ गया। वही चादर पुलिस के हत्थे चढ़ गई थी।
विज्ञापन
केस की जांच सीआईडी का अधीक्षक हर्टन कर रहा था। संकल्प संस्था के संस्थापक डॉ. अवधेश मणि त्रिपाठी बताते हैं कि कुछ दिन के बाद हर्टन को लूटे गए बड़े नोटों के नंबरों का पता चला, जो शाहजहांपुर के बाजार में चलाए गए थे। पुलिस को मैनपुरी साजिश केस में फरार रामप्रसाद बिस्मिल पर शक बढ़ा और निगरानी शुरू की गई। उसके बाद गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू हुआ था।
विज्ञापन
19 दिसंबर को दी गई थी क्रांतिकारियों को फांसी
इतिहासकार डॉ. विकास खुराना बताते हैं कि 19 दिसंबर 1927 को ब्रिटिश हुकूमत की जड़ों को हिलाने वाले काकोरी एक्शन केस के अमर नायकों को फांसी की सजा दी गई थी। बलिदानियों की अमर गाथा ने आजादी के आंदोलन को तेज गति प्रदान की। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से उपजी निराशा के परिणामस्वरूप कई स्वतंत्रता सेनानी सशस्त्र क्रांति की ओर उन्मुख हुए थे। इसका नेतृत्व शाहजहांपुर के पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, ठा. रोशन सिंह ने किया था। उस समय सरकारी खजाने की लूट की चर्चा ब्रिटेन तक के अखबारों में की गई थी। अंग्रेजी सरकार सकते में थी। इस मामले में कुल 40 लोगों को नामजद किया गया। शाहजहांपुर के पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी को आईपीसी की धारा 121 ए, 120 बी के अंतर्गत उम्रकैद व धारा 302 एवं 396 के अंतर्गत फांसी की सजा दी गई।