{"_id":"6410b35f62c03653ce080056","slug":"online-studies-made-mobile-addict-now-eyes-are-deceiving-shahjahanpur-news-c-4-1-93288-2023-03-14","type":"story","status":"publish","title_hn":"Shahjahanpur News: ऑनलाइन पढ़ाई ने बनाया मोबाइल का लती, अब नजरें धोखा दे रहीं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Shahjahanpur News: ऑनलाइन पढ़ाई ने बनाया मोबाइल का लती, अब नजरें धोखा दे रहीं
विज्ञापन
- वर्ष 2022-23 में आरबीएसके की 12 टीमों ने लगभग 30 हजार बच्चों की आंखों की जांच की
- कक्षा तीन से इंटरमीडियट तक 3008 बच्चों की नजर कमजोर मिलने पर चश्मे दिए गए
संवाद न्यूज एजेंसी
शाहजहांपुर। ऑनलाइन पढ़ाई और मोबाइल की जिद ने बच्चों की नजर कमजोर कर दी है। वर्ष 2022-23 में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की टीमों द्वारा किए सर्वे से पता चला है कि कोरोना के बाद से यह आंकड़ा दस फीसदी तक पहुंच गया है, जो कि कोरोना से पहले 5-6 फीसदी ही था।
कोरोना महामारी के चलते ऑनलाइन कक्षाओं ने स्कूली बच्चों की मोबाइल और कंप्यूटर पर निर्भरता बढ़ा दी। घंटों चलने वाली क्लास के दौरान स्क्रीन पर नजर टिकाए रखने से आंखों पर काफी दुष्प्रभाव पड़ा। कोरोना का प्रकोप खत्म होने के बाद बच्चे मोबाइल के लती हो गए। अब अगर उन्हें अभिभावक रोकते हैं तो बच्चे रोने लगते हैं। ऐसे में अभिभावकों को न चाहते हुए भी उन्हें मोबाइल से खेलने की छूट देनी पड़ जाती है।
स्वास्थ्य विभाग ने आरबीएसके के तहत बच्चों की आंखों की जांच शुरू की। इसके लिए जिले की 12 टीमों ने 712 स्कूलों में भ्रमण करने के बाद 68,867 बच्चों की जांच की। लगभग 30 हजार बच्चों की आंखों की जांच भी हुई। इनमें कक्षा तीन से इंटरमीडियट तक के 3008 छात्र-छात्राओं की आंखें कमजोर निकली हैं। अंधता निवारण योजना के तहत उन्हें नि:शुल्क चश्मे उपलब्ध कराए गए हैं।
विज्ञापन
वरिष्ठ नेत्र परीक्षण अधिकारी डॉ. दिनेश सक्सेना ने बताया कि सरकारी विद्यालयों में कोरोना से पूर्व 100 में पांच-छह बच्चों की नजर कमजोर निकलती थी। वर्ष 2022-23 में यह प्रतिशत बढ़कर 10 हो गया है। छात्र-छात्राओं के कमजोर खान-पान और कंप्यूटर व मोबाइल पर काम करने के कारण बच्चों के सामने यह दिक्कत आ रही है।
कान्वेंट स्कूलों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत सरकारी विद्यालयों व आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों की जांच की गई, जबकि कांवेंट स्कूलों के लिए सुविधा नहीं है। निजी स्कूलों की स्थिति इससे भी ज्यादा खराब है। वरिष्ठ नेत्र परीक्षण अधिकारी डॉ. दिनेश सक्सेना ने बताया कि वह कांन्वेंट स्कूलों के अनुरोध पर बच्चों की आंख जांचने गए तो वहां 100 में 20 बच्चों की दूर की नजर कमजोर मिली है।
सुरमा और काजल से करें परहेज
आमतौर पर सुरमा और काजल को आंखों के लिए बेहतर माना जाता है, लेकिन डॉक्टर इसे लगाने से मना करते हैं। कॉस्मेटिक में घातक केमिकल होने के चलते इससे आंखों में नासूर होने की आशंका रहती है।
गलत खान-पान करें बेहतर
-हरी सब्जी, गाजर और दूध आंखों के लिए लाभकारी है।
-आंवला का सेवन आंखों के लिए काफी बेहतर बताया गया है।
- जंक फूड, स्ट्रीट फूड आदि की वजह से बच्चों को पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता।
- आंखें कमजोर लगने पर चेकअप कराएं, चश्मे का प्रयोग करें।
ये बरतें सावधानी
-रोशनी कम होने पर पढ़ाई न करें।
-कम रोशनी में मोबाइल न चलाएं।
-आंख से एक से डेढ़ फुट दूर मोबाइल रखकर देखें।
-दूर की चीजें स्पष्ट न होने पर डॉक्टर को दिखाएं।
-आंखें लाल होने, थोड़ा काम करने पर थकान होने को हल्के में न लें।
एक अप्रैल 2022 से मार्च 2023 तक 712 स्कूलों में आरबीएसके की 12 टीमों ने जांच की है। इसमें 3008 बच्चों की नजर कम मिलने पर उन्हें चश्मा उपलब्ध कराया जाएगा। अधिकतर जगह पर बच्चों की दूर की नजर कमजोर निकल रही है।
- डॉ.आरके गौतम, सीएमओ
विज्ञापन
- कक्षा तीन से इंटरमीडियट तक 3008 बच्चों की नजर कमजोर मिलने पर चश्मे दिए गए
संवाद न्यूज एजेंसी
शाहजहांपुर। ऑनलाइन पढ़ाई और मोबाइल की जिद ने बच्चों की नजर कमजोर कर दी है। वर्ष 2022-23 में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की टीमों द्वारा किए सर्वे से पता चला है कि कोरोना के बाद से यह आंकड़ा दस फीसदी तक पहुंच गया है, जो कि कोरोना से पहले 5-6 फीसदी ही था।
कोरोना महामारी के चलते ऑनलाइन कक्षाओं ने स्कूली बच्चों की मोबाइल और कंप्यूटर पर निर्भरता बढ़ा दी। घंटों चलने वाली क्लास के दौरान स्क्रीन पर नजर टिकाए रखने से आंखों पर काफी दुष्प्रभाव पड़ा। कोरोना का प्रकोप खत्म होने के बाद बच्चे मोबाइल के लती हो गए। अब अगर उन्हें अभिभावक रोकते हैं तो बच्चे रोने लगते हैं। ऐसे में अभिभावकों को न चाहते हुए भी उन्हें मोबाइल से खेलने की छूट देनी पड़ जाती है।
विज्ञापन
स्वास्थ्य विभाग ने आरबीएसके के तहत बच्चों की आंखों की जांच शुरू की। इसके लिए जिले की 12 टीमों ने 712 स्कूलों में भ्रमण करने के बाद 68,867 बच्चों की जांच की। लगभग 30 हजार बच्चों की आंखों की जांच भी हुई। इनमें कक्षा तीन से इंटरमीडियट तक के 3008 छात्र-छात्राओं की आंखें कमजोर निकली हैं। अंधता निवारण योजना के तहत उन्हें नि:शुल्क चश्मे उपलब्ध कराए गए हैं।
विज्ञापन
वरिष्ठ नेत्र परीक्षण अधिकारी डॉ. दिनेश सक्सेना ने बताया कि सरकारी विद्यालयों में कोरोना से पूर्व 100 में पांच-छह बच्चों की नजर कमजोर निकलती थी। वर्ष 2022-23 में यह प्रतिशत बढ़कर 10 हो गया है। छात्र-छात्राओं के कमजोर खान-पान और कंप्यूटर व मोबाइल पर काम करने के कारण बच्चों के सामने यह दिक्कत आ रही है।
कान्वेंट स्कूलों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत सरकारी विद्यालयों व आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों की जांच की गई, जबकि कांवेंट स्कूलों के लिए सुविधा नहीं है। निजी स्कूलों की स्थिति इससे भी ज्यादा खराब है। वरिष्ठ नेत्र परीक्षण अधिकारी डॉ. दिनेश सक्सेना ने बताया कि वह कांन्वेंट स्कूलों के अनुरोध पर बच्चों की आंख जांचने गए तो वहां 100 में 20 बच्चों की दूर की नजर कमजोर मिली है।
सुरमा और काजल से करें परहेज
आमतौर पर सुरमा और काजल को आंखों के लिए बेहतर माना जाता है, लेकिन डॉक्टर इसे लगाने से मना करते हैं। कॉस्मेटिक में घातक केमिकल होने के चलते इससे आंखों में नासूर होने की आशंका रहती है।
गलत खान-पान करें बेहतर
-हरी सब्जी, गाजर और दूध आंखों के लिए लाभकारी है।
-आंवला का सेवन आंखों के लिए काफी बेहतर बताया गया है।
- जंक फूड, स्ट्रीट फूड आदि की वजह से बच्चों को पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता।
- आंखें कमजोर लगने पर चेकअप कराएं, चश्मे का प्रयोग करें।
ये बरतें सावधानी
-रोशनी कम होने पर पढ़ाई न करें।
-कम रोशनी में मोबाइल न चलाएं।
-आंख से एक से डेढ़ फुट दूर मोबाइल रखकर देखें।
-दूर की चीजें स्पष्ट न होने पर डॉक्टर को दिखाएं।
-आंखें लाल होने, थोड़ा काम करने पर थकान होने को हल्के में न लें।
एक अप्रैल 2022 से मार्च 2023 तक 712 स्कूलों में आरबीएसके की 12 टीमों ने जांच की है। इसमें 3008 बच्चों की नजर कम मिलने पर उन्हें चश्मा उपलब्ध कराया जाएगा। अधिकतर जगह पर बच्चों की दूर की नजर कमजोर निकल रही है।
- डॉ.आरके गौतम, सीएमओ