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रबी फसलों के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी महज छलावा
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शाहजहांपुर। कृषि बिलों पर खींचतान के बीच केंद्र सरकार ने रबी की फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर किसानों के प्रति हमदर्दी दिखाने की कोशिश की है, लेकिन किसान इससे अपने को छला हुआ महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि डीजल, खाद, दवा और बीज के दाम लगातार बढ़ने से इसका असर फसलों की लागत पर पड़ रहा है। मगर सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी ) मामूली रूप से बढ़ाकर किसानों को फिर छलने की कोशिश की है। अधिकतर किसानों का कहना है कि एमएसपी ऊंट के मुंह में जीरा है। फसल लागत को ध्यान में रखकर मूल्य तय किया जाए, तभी किसान खुशहाल हो पाएगा।
किसानों का कहना है कि एमएसपी और फसल का मूल्य तय करने वाले वे मंत्री व नेता हैं, जिनको खेती किसानी से कोई मतलब नहीं है और न ही खेती करने का तकनीकी ज्ञान है। खेत की जुताई से लेकर बुआई, निराई, सिंचाई और खाद में किसान खून पसीना बहाता है साथ ही अपनी फसल का उचित मूल्य मिलने की भी अभिलाषा रखता है। सरकार को इस ओर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।
सरकार मनमाने ढंग से खाद, बीज, कीटनाशकों के रेट बढ़ा देती हैं, लेकिन लागत के अनुरूप फसलों का उचित मूल्य दिलाने की ठोस व्यवस्था हो, तभी किसानों की आर्थिक समृद्धि हो सकेगी। समर्थन मूल्य में मामूली वृद्धि और कृषि विधेयक से छोटे किसानों को कोई विशेष लाभ नहीं होने वाला। किराया देकर किसान धान हरियाणा ले गए और वहां के व्यापारियों ने कोई कमी बताकर दाम कम लगाए तो उसी रेट पर फसल बेचनी पड़ेगी क्योंकि फसल को वापस लाना समझदारी नहीं होगी।
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- आजाद अली, ऊनकलां (निगोही)
अभी तक फसल की बिक्री के लिए किसान मंडी समिति के व्यापारियों पर निर्भर थे, जो कि मनमाने रेट पर उपज खरीदते हैं। इस वजह से किसानों को वाजिब रेट नहीं मिलता था। अब समर्थन मूल्य बढ़ने और संसद में पारित विधेयक के अनुसार किसान देश के किसी भी कोने में अपनी फसल को बेच सकेेंगे। विधेयक में फसलों की बिक्री के लिए समर्थन मूल्य को अनिवार्य किए जाने का प्रावधान हो तो किसान निश्चिंत होकर अपनी उपज बाहर ले जा सकेंगे।
-ब्रजेंद्र कुमार वर्मा, कबीरपुर झोतूपुर (निगोही)
समर्थन मूल्य में मामूूली वृद्धि और कृषि विधेयक से छोटे किसानों को कोई लाभ मिलने के आसार नहीं हैं। असली फायदा बड़े किसानों को बिचौलियों को मिलेगा। कम मात्रा में फसल बाहर ले जाने पर भी किराया पूरा देना होगा और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि वहां सरकार से निर्धारित रेट मिल जाएगा। छोटे किसानों को अगली फसल के लिए तत्काल रकम की जरूरत होती है। यदि समर्थन मूल्य मिलने लगे तो किसान मालामाल हो जाएंगे, लेकिन क्षेत्र के अधिकांश क्रय केंद्रों पर आढ़तियों का कब्जा रहता है।
- रोहित कुमार, गुरगवां (निगोही)
कम पढ़े-लिखे छोटे किसानों को इस बात से कोई सरोकार नहीं कि सरकार उनके लिए कौन सा विधेयक लाई है। उन्हें केवल समर्थन मूल्य पाने की चाह होती है। इसमें बढ़ोतरी तभी सार्थक होगी, जब किसानों को फसल पर लगाई गई लागत के अनुसार समर्थन मूल्य मिलेगा। हर साल फसल कटने के बाद उपज लेकर सरकारी क्रय केेंद्र जाने पर तमाम किसान खुद को ठगा महसूस करते हैं तो सिर्फ इसलिए कि सरकार गेहूं और धान खरीद के सीजन में बिचौलियों की भूमिका खत्म नहीं कर सकी।
- आशीष कुमार, अजीजपुर (निगोही)
अध्यादेश लागू कर सरकार ने कृषि क्षेत्र में कंपनी राज के दरवाजे खोल दिए और इसका विरोध शुरू हुआ तो समर्थन मूल्य में दिखावे की वृद्धि कर किसानों के साथ झूठी हमदर्दी दिखा रही है। किसान फसलों का ठेका लेने वाली कंपनियों के बंधुआ मजदूर बनकर रह जाएंगे। कृषि क्षेत्र मेें मुक्त विपणन, अनाज भंडारण और उसके आयात-निर्यात की एग्रो कंपनियों को खुली छूट भी किसानों के हित में नहीं है। लागत के अनुसार समर्थन मूल्य बढ़ा गया है तो सरकार इस मुद्दे पर संसद में बहस कराए।
- मनजीत सिंह धालीवाल, कढ़ेर चौरा (बंडा)
सरकार के कृषि विधेयक की तरह समर्थन मूल्य में वृद्धि ऊपरी तौर पर जितनी लुभावनी दिख रही, उतनी है नहीं। विधेयक के कई प्रावधान अच्छे हैं, बशर्ते उन्हें यथार्थ के धरातल पर लाया जाए और किसानों को खेती पर बढ़े खर्च के अनुसार फसलों का रेट मिले। कांट्रेक्ट खेती में किसानों को फसल बुआई के समय रेट तय करना होगा, लेकिन बाद में उसी उपज के दाम चढने पर मुनाफा ठेकेदार की जेब में जाएगा। बिचौलियों का वर्चस्व टूटे तभी किसानों को समर्थन मूल्य मिलेगा। सरकार किसान आयोग का गठन कर उसे समर्थन मूल्य करने का अधिकार दे तो किसानों की तमाम समस्याएं समाप्त हो जाएंगी।
-श्याम किशोर अग्निहोत्री, कोना याकूबपुर (जलालाबाद)
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किसानों का कहना है कि एमएसपी और फसल का मूल्य तय करने वाले वे मंत्री व नेता हैं, जिनको खेती किसानी से कोई मतलब नहीं है और न ही खेती करने का तकनीकी ज्ञान है। खेत की जुताई से लेकर बुआई, निराई, सिंचाई और खाद में किसान खून पसीना बहाता है साथ ही अपनी फसल का उचित मूल्य मिलने की भी अभिलाषा रखता है। सरकार को इस ओर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।
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सरकार मनमाने ढंग से खाद, बीज, कीटनाशकों के रेट बढ़ा देती हैं, लेकिन लागत के अनुरूप फसलों का उचित मूल्य दिलाने की ठोस व्यवस्था हो, तभी किसानों की आर्थिक समृद्धि हो सकेगी। समर्थन मूल्य में मामूली वृद्धि और कृषि विधेयक से छोटे किसानों को कोई विशेष लाभ नहीं होने वाला। किराया देकर किसान धान हरियाणा ले गए और वहां के व्यापारियों ने कोई कमी बताकर दाम कम लगाए तो उसी रेट पर फसल बेचनी पड़ेगी क्योंकि फसल को वापस लाना समझदारी नहीं होगी।
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- आजाद अली, ऊनकलां (निगोही)
अभी तक फसल की बिक्री के लिए किसान मंडी समिति के व्यापारियों पर निर्भर थे, जो कि मनमाने रेट पर उपज खरीदते हैं। इस वजह से किसानों को वाजिब रेट नहीं मिलता था। अब समर्थन मूल्य बढ़ने और संसद में पारित विधेयक के अनुसार किसान देश के किसी भी कोने में अपनी फसल को बेच सकेेंगे। विधेयक में फसलों की बिक्री के लिए समर्थन मूल्य को अनिवार्य किए जाने का प्रावधान हो तो किसान निश्चिंत होकर अपनी उपज बाहर ले जा सकेंगे।
-ब्रजेंद्र कुमार वर्मा, कबीरपुर झोतूपुर (निगोही)
समर्थन मूल्य में मामूूली वृद्धि और कृषि विधेयक से छोटे किसानों को कोई लाभ मिलने के आसार नहीं हैं। असली फायदा बड़े किसानों को बिचौलियों को मिलेगा। कम मात्रा में फसल बाहर ले जाने पर भी किराया पूरा देना होगा और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि वहां सरकार से निर्धारित रेट मिल जाएगा। छोटे किसानों को अगली फसल के लिए तत्काल रकम की जरूरत होती है। यदि समर्थन मूल्य मिलने लगे तो किसान मालामाल हो जाएंगे, लेकिन क्षेत्र के अधिकांश क्रय केंद्रों पर आढ़तियों का कब्जा रहता है।
- रोहित कुमार, गुरगवां (निगोही)
कम पढ़े-लिखे छोटे किसानों को इस बात से कोई सरोकार नहीं कि सरकार उनके लिए कौन सा विधेयक लाई है। उन्हें केवल समर्थन मूल्य पाने की चाह होती है। इसमें बढ़ोतरी तभी सार्थक होगी, जब किसानों को फसल पर लगाई गई लागत के अनुसार समर्थन मूल्य मिलेगा। हर साल फसल कटने के बाद उपज लेकर सरकारी क्रय केेंद्र जाने पर तमाम किसान खुद को ठगा महसूस करते हैं तो सिर्फ इसलिए कि सरकार गेहूं और धान खरीद के सीजन में बिचौलियों की भूमिका खत्म नहीं कर सकी।
- आशीष कुमार, अजीजपुर (निगोही)
अध्यादेश लागू कर सरकार ने कृषि क्षेत्र में कंपनी राज के दरवाजे खोल दिए और इसका विरोध शुरू हुआ तो समर्थन मूल्य में दिखावे की वृद्धि कर किसानों के साथ झूठी हमदर्दी दिखा रही है। किसान फसलों का ठेका लेने वाली कंपनियों के बंधुआ मजदूर बनकर रह जाएंगे। कृषि क्षेत्र मेें मुक्त विपणन, अनाज भंडारण और उसके आयात-निर्यात की एग्रो कंपनियों को खुली छूट भी किसानों के हित में नहीं है। लागत के अनुसार समर्थन मूल्य बढ़ा गया है तो सरकार इस मुद्दे पर संसद में बहस कराए।
- मनजीत सिंह धालीवाल, कढ़ेर चौरा (बंडा)
सरकार के कृषि विधेयक की तरह समर्थन मूल्य में वृद्धि ऊपरी तौर पर जितनी लुभावनी दिख रही, उतनी है नहीं। विधेयक के कई प्रावधान अच्छे हैं, बशर्ते उन्हें यथार्थ के धरातल पर लाया जाए और किसानों को खेती पर बढ़े खर्च के अनुसार फसलों का रेट मिले। कांट्रेक्ट खेती में किसानों को फसल बुआई के समय रेट तय करना होगा, लेकिन बाद में उसी उपज के दाम चढने पर मुनाफा ठेकेदार की जेब में जाएगा। बिचौलियों का वर्चस्व टूटे तभी किसानों को समर्थन मूल्य मिलेगा। सरकार किसान आयोग का गठन कर उसे समर्थन मूल्य करने का अधिकार दे तो किसानों की तमाम समस्याएं समाप्त हो जाएंगी।
-श्याम किशोर अग्निहोत्री, कोना याकूबपुर (जलालाबाद)