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UP: शाहजहांपुर में मिले हड़प्पा काल के हथियार, 200 से अधिक है संख्या; पहले भी मिल चुकी है पुरातात्विक सामग्री

Sat, 10 Feb 2024 03:18 PM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ/शाहजहांपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ/शाहजहांपुर Published by: मुकेश कुमार Updated Sat, 10 Feb 2024 03:18 PM IST
सार

निगोही में मिले हड़प्पा काल के हथियारों की संख्या 200 से अधिक है। इनमें तलवारें, के अलावा भाले, कुल्हाड़ियां, छेनी,  हस्तरक्षा कवच, चापर, चाकू, आरी आदि शामिल हैं। 

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Harappan period weapons found in Shahjahanpur
निगोही में मिले प्राचीन हथियार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

शाहजहांपुर जिले के निगोही में पांच हजार साल पुराने हथियार मिले हैं। ये हथियार 1600-2400 ईसा पूर्व (हड़प्पा काल) के बताए जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में ऐसा पहली बार हुआ है, जब ताम्रयुगीन सभ्यता के हथियारों की रेडियोकार्बन तिथियां प्राप्त हुई हैं।  

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निगोही में मिले हथियारों की संख्या 200 से अधिक है। इनमें तलवारें, के अलावा भाले, कुल्हाड़ियां, छेनी,  हस्तरक्षा कवच, चापर, चाकू, आरी आदि शामिल हैं। पूर्व में इस प्रकार के हथियार पूरे उत्तर भारत में पाए गए थे लेकिन इनकी सही तिथियां अभी तक प्राप्त नहीं की जा सकी थीं। 
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लखनऊ के इंडियन जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजी, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज और शहजाद राय रिसर्च इंस्टीट्यूट-बागपत की ओर से किए गए शोध में बताया गया कि अध्ययन में इन अवशेषों की कार्बन तिथियां 3610 (कैलिब्रेटेड बीपी) से लेकर 4328 (कैलिब्रेटेड बीपी) तक पाई गईं। बता दें कि इन हथियार तिथियों का अध्ययन भारत में नहीं होता है इसलिए इनका अध्ययन हंगरी में करवाया गया है।  
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शहजाद इंस्टीट्यूट के निदेशक अमित राय जैन ने बताया कि निगोही क्षेत्र में जमीन में दबे तांबे के प्राचीन हथियार कुछ साल पहले मिले थे। उन्हें एकत्र किया गया। इंडियन जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजी के पूर्व डीजीपी विजय कुमार ने मिट्टी के टुकड़ों व कुछ हथियारों का अध्ययन किया। 

पहले भी मिली पुरातात्विक सामग्री, कार्बन डेटिंग पहली बार
शाहजहांपुर जिले में पुरातात्विक महत्व के साक्ष्य पूर्व में भी कई बार मिल चुके हैं। हड़प्पा सभ्यता से लेकर गुप्तकाल तक के देवी-देवताओं की मूर्तियां, मृदभांड, हथियार आदि मिलते रहे हैं। पहली बार ऐसा हुआ है कि रेडियोकार्बन डेटिंग के माध्यम से तलवार, बर्छी आदि हथियारों के समय का अनुमान लगाया गया हो। 

एसएस कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. विकास खुराना ने बताया कि निगोही क्षेत्र से प्राप्त ताम्र अस्त्रों की रेडियोकार्बन डेटिंग से इनका समय 24 सौ से 16 सौ ईसा पूर्व का निकला है। इन अस्त्रों की कार्बन डेटिंग से इतिहासकारों के इस दावे पर मुहर लग गई है कि जिले में मानव सभ्यता का अस्तित्व महाभारतकाल से भी प्राचीन है। भारत में 90 पुरातात्विक स्थलों पर बड़े पैमाने पर ताम्र अस्त्र और बर्तन मिलते रहे हैं। 

इतिहासकारों द्वारा इन्हें ताम्र संचय निधि संस्कृति का नाम दिया गया है।  बहरिया तथा सरथौली इस संस्कृति से जुड़े महत्वपूर्ण स्थल हैं। ऑर्कियोलाॅजिस्ट तथा एएसआई के सर्वेयर एए फ्यूहरर ने अपनी पुस्तक लिस्ट ऑफ क्रिश्चियन मॉन्यूमेंट्स ऑफ द आर्कियोलोजिकल ऑर हिस्टोरिकल इंट्रेस्ट एंड देअर आई इंस्क्रिप्शन इन द नार्थ वेस्टर्न प्रोविंस एंड अवध में जिले के पुरातात्विक खेड़ों की सूची दी है।

Harappan period weapons found in Shahjahanpur
शाहजहांपुर में मिले प्राचीन हथियार - फोटो : अमर उजाला
इनमें गोरा रायपुर, निगोही, धनेका, सरथौली, खेड़ा, तिलहर के खेड़े शामिल हैं। इन स्थानों पर समय-समय पर गुप्त, मौर्य, शुंग कालीन सिक्के-मूर्तियां निकलती रही हैं। इनमें निगोही के ग्राम चैना रुरिया से प्राप्त देवी मूर्ति, सिंधौली से प्राप्त आठवीं सदी की भगवान विष्णु की मूर्ति, खुटार के पिपरिया विरसिंद से प्राप्त देवी मूर्ति, लखनऊ म्यूजियम से प्राप्त स्वर्ण फलक वाली गुप्तयुगीन मूर्तियां प्रमुख हैं।

निगोही के अंडखेड़ा में मिले थे हथियार 
निगोही के गांव अंडखेड़ा में 21 मार्च 2012 को अजीत सिंह यादव अपना मकान बनवा रहे थे। मजदूर ने खेत पर खुदाई की तो कई हथियारनुमा संरचनाएं मिलीं थीं। सूचना पर पहुंची पुलिस ने उन हथियारों को अपने कब्जे में ले लिया था। दस किलो तीन सौ ग्राम की दस वस्तुएं थीं। इनमें सात मूर्तियां और दो बर्छियां थीं।

सिंधौली में मिली थीं आठ बर्छियां
सिंधौली के बाजपुर गांव में अक्तूबर 2013 में नीरज मिश्रा के खेत से आठ बर्छियां मिलीं थीं। एसएस कॉलेज के इतिहास विभाग के सहायक आचार्य ऑर्कियोलोजिस्ट डॉ. दीपक सिंह के मुताबिक, ये हथियार तकरीबन 45 सौ ईसापूर्व के होंगे। इनका इस्तेमाल जानवरों के शिकार के लिए किया जाता था।  

संग्रहीत किया जाए
ईसा पूर्व छठी सदी में शाहजहांपुर पांचाल महा जनपद का भाग था। हालांकि जनपद का इतिहास इससे भी प्राचीन समय तक जाता है। जिले में मिलीं बहुत-सी पुरातात्विक महत्व की सामग्री को बाहर भेज दिया जाता है। हम लोग इस दृष्टि से प्रयासरत हैं कि जिले से निकल रही पुरातात्विक महत्व की सामग्री को यहीं के संग्रहालयों में रखा जाए।  - डॉ. दीपक सिंह, ऑर्कियोलोजिस्ट एवं सहायक आचार्य, इतिहास विभाग एसएस काॅलेज। 

कई क्षेत्रों में उत्खनन जरूरी 
 गोरा रायपुर के टीले की चर्चा अत्यंत ऐतिहासिक पुस्तकों में है। इसके नीचे सात स्तर की संस्कृतियों के छिपे होने की संभावना जताई गई है। यहां तक कि प्रसिद्ध यात्री फाहियान तथा ह्ववेनसांग ने इस स्थान का जिक्र अपनी किताबों में किया है। राईखेड़ा, बुधवाना, शाहजंग, सरथौली, निगोही, तिलहर पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। - डॉ. विकास खुराना, इतिहास विभागाध्यक्ष, एसएस कॉलेज

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