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बाल मन के कुशल चितेरे हैं डॉ. नागेश
अजय अवस्थी/शाहजहांपुर।
Updated Thu, 12 Nov 2015 11:23 PM IST
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वैसे तो किसी भी प्रकार का साहित्य लिखना मुुश्किल भरा होता है, लेकिन बाल साहित्य को गढ़ना टेढ़ी खीर से कम नहीं। इस हुनर में जो महारत हासिल कर लेता है उसे डॉ. नागेश पांडेय ÒसंजयÓ नाम से पहचान मिलनेेेेेेे लगती है।
डॉ. पांडेय बाल साहित्य के ऐसे चितेरे हैं, जिनकी रचना धर्मिता नित नए आयाम की ओर अग्रसर है। खुटार जैसे छोटे कसबा में जन्में डॉ. पांडेय बाल साहित्य में पीएचडी कर चुके हैं। वह बताते हैं कि उनकी बाल कहानी, कविता, पहेलियां, एकांकी, यात्रावृत्त, समीक्षा, शोध निबंध जैसी करीब एक हजार रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। बकौल संजय, उनकी कई रचनाओं का अंग्रेजी, पंजाबी, सिंधी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, उर्दू, ओड़िया, नेेेेपाली आदि भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। बाल साहित्य लेखन यात्रा में उन्हें राजीव गांधी युवा कवि सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से उमाकांत मालवीय बाल साहित्य सम्मान और सर्जना पुरस्कार, मानवाधिकार रत्न उपाधि, जनपद रत्न समेत दर्जनों बाल साहित्य सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। ये पुरस्कार उनकी निष्ठा, लगन औन बाल साहित्य के प्रति समर्पण की गवाही के रूप में पर्याप्त माने जाने चाहिए।
डॉ. संजय का मानना है कि बाल साहित्य लिखने वालों की कमी नहीं है, लेकिन उसका प्रचार-प्रसार कम है। जो लिखा जा रहा है वह पुस्तकालयों में कैद हो रहा है। बच्चों में रुचि जागृत करने को स्कूलों में बाल गोष्ठियां हों और उनमें चर्चा हो, जिससे नए लोग जुड़ें। बाल कवि सम्मेलन अच्छी भूमिका निभा सकते हैं। डॉ. पांडेय को इस बात का मलाल है कि पाठ्यक्रमों से सरस और रुचिकर कविताएं विलुप्त हो रही हैं। यदि यही स्थिति रही तो संकट बड़ों के साहित्य पर भी आ सकता है। उनकी कई कृतियां पुरस्कृत भी हो चुकी हैं।
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वह बताते हैं कि उनकी तमाम रचनाएं दूरदर्शन और आकाशवाणी लखनऊ, रामपुर, दिल्ली आदि से प्रसारित भी हुई हैं। नेपाल बाल साहित्य समाज काठमांडू में भारत के बाल साहित्य प्रतिनिधि के रूप में दो बार नेपाल की यात्रा कर चुके हैं। इसके अलावा बाल साहित्यकारों के शिष्टमंडल के साथ वह राष्ट्रपति प्रतिभा रानी पाटील और डॉ. प्रणव मुखर्जी से भी मिलने का गौरव हासिल कर चुके हैं। डॉ. पांडेय की जय जय सुभाष, आओ पेड़ लगाएं, परीक्षा, धीरे धीरे बोलो, दादा-दादी, नया टेलीफोन आदि कविताएं विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रमों का हिस्सा बन चुकी हैं। सुभाषनगर निवासी डॉ. नागेश पांडेय राजेंद्र प्रसाद स्नातकोत्तर महाविद्यालय मीरगंज, बरेली में शिक्षा विभागाध्यक्ष हैं।
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डॉ. पांडेय बाल साहित्य के ऐसे चितेरे हैं, जिनकी रचना धर्मिता नित नए आयाम की ओर अग्रसर है। खुटार जैसे छोटे कसबा में जन्में डॉ. पांडेय बाल साहित्य में पीएचडी कर चुके हैं। वह बताते हैं कि उनकी बाल कहानी, कविता, पहेलियां, एकांकी, यात्रावृत्त, समीक्षा, शोध निबंध जैसी करीब एक हजार रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। बकौल संजय, उनकी कई रचनाओं का अंग्रेजी, पंजाबी, सिंधी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, उर्दू, ओड़िया, नेेेेपाली आदि भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। बाल साहित्य लेखन यात्रा में उन्हें राजीव गांधी युवा कवि सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से उमाकांत मालवीय बाल साहित्य सम्मान और सर्जना पुरस्कार, मानवाधिकार रत्न उपाधि, जनपद रत्न समेत दर्जनों बाल साहित्य सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। ये पुरस्कार उनकी निष्ठा, लगन औन बाल साहित्य के प्रति समर्पण की गवाही के रूप में पर्याप्त माने जाने चाहिए।
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डॉ. संजय का मानना है कि बाल साहित्य लिखने वालों की कमी नहीं है, लेकिन उसका प्रचार-प्रसार कम है। जो लिखा जा रहा है वह पुस्तकालयों में कैद हो रहा है। बच्चों में रुचि जागृत करने को स्कूलों में बाल गोष्ठियां हों और उनमें चर्चा हो, जिससे नए लोग जुड़ें। बाल कवि सम्मेलन अच्छी भूमिका निभा सकते हैं। डॉ. पांडेय को इस बात का मलाल है कि पाठ्यक्रमों से सरस और रुचिकर कविताएं विलुप्त हो रही हैं। यदि यही स्थिति रही तो संकट बड़ों के साहित्य पर भी आ सकता है। उनकी कई कृतियां पुरस्कृत भी हो चुकी हैं।
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वह बताते हैं कि उनकी तमाम रचनाएं दूरदर्शन और आकाशवाणी लखनऊ, रामपुर, दिल्ली आदि से प्रसारित भी हुई हैं। नेपाल बाल साहित्य समाज काठमांडू में भारत के बाल साहित्य प्रतिनिधि के रूप में दो बार नेपाल की यात्रा कर चुके हैं। इसके अलावा बाल साहित्यकारों के शिष्टमंडल के साथ वह राष्ट्रपति प्रतिभा रानी पाटील और डॉ. प्रणव मुखर्जी से भी मिलने का गौरव हासिल कर चुके हैं। डॉ. पांडेय की जय जय सुभाष, आओ पेड़ लगाएं, परीक्षा, धीरे धीरे बोलो, दादा-दादी, नया टेलीफोन आदि कविताएं विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रमों का हिस्सा बन चुकी हैं। सुभाषनगर निवासी डॉ. नागेश पांडेय राजेंद्र प्रसाद स्नातकोत्तर महाविद्यालय मीरगंज, बरेली में शिक्षा विभागाध्यक्ष हैं।