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तहसील का हाल : पहले डुबोते हैं फिर उबारने के लिए लेते हैं चढ़ावा
Sun, 30 Apr 2023 12:00 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
Updated Sun, 30 Apr 2023 12:00 AM IST
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संतकबीरनगर। जमीनों के बैनामे के बाद खारिज-दाखिल में भी बड़े सलीके से खेल किया जाता है। ज्यादातर लोगों के दस्तावेजों में गलत नाम और पता दर्ज कर दिया जाता है। लोग जब खतौनी लेते हैं, तब इसकी जानकारी होती है। इसके बाद नाम और पता को ठीक कराने में इतनी ज्यादा भागदौड़ करनी पड़ती है कि लोग परेशान हो जाते हैं। फिर जब तक वे चढ़ावा नहीं देते, तब तक खामियां ठीक नहीं होतीं।
नियम इतने जटिल हैं कि लोग इनमें ही उलझ कर रह जाते हैं। इस प्रक्रिया में भी लोगों के ढाई से तीन हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। जिले में 100 से अधिक मामले लंबित हैं। इसमें सिर्फ खलीलाबाद तहसील में ही 30 से अधिक मामले लंबित हैं। एक से लेकर छह महीने बीतने के बाद भी इनकी खामियां ठीक नहीं हो पा रही हैं। भूमि की रजिस्ट्री कराने के दौरान पक्ष क्रेता और विक्रेता अपने सभी दस्तावेज जमा कराते हैं। इन दस्तावेजों के आधार पर 45 दिन में विक्रेता की जगह क्रेता का नाम दस्तावेज पर चढ़ाकर भूमि की खतौनी जारी करनी होती है।
यह खतौनी बनाने के दौरान भी कई बार खेल होता है। कंप्यूटर से डाटा फीड करने के दौरान लिपिकीय त्रुटि लोगों के लिए मुसीबत बन जाती है। इसके निपटारे में भी लोगों की जेब से ढाई से तीन हजार खर्च हो जाते हैं। भागदौड़ करते हुए महीनों गुजर जाते हैं।
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यह होती है प्रक्रिया
किसी बैनामे के खारिज-दाखिल के बाद में होने वाली लिपिकीय त्रुटि सहित अन्य गड़बड़ी को दूर करने की कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इसके लिए त्रुटि संशोधन के लिए आवेदन करना पड़ता है। इसे तहसीलदार के दफ्तर में जमा कराया जाता है। फिर इस पर रिपोर्ट लगाकर यह कानूनगो और लेखपाल के पास जाती है। लेखपाल की रिपोर्ट लगाकर प्रक्रिया के तहत दोबारा जब फाइल लौटती है, तब इस पर तहसीलदार आदेश करते हैं। तहसील से जुडे़ लोगों का कहना है कि कई बार लेखपाल के स्तर से रिपोर्ट नहीं लगाई है। संशोधन के लिए 45 दिन की समय सीमा तय है। इसके बावजूद महीनों गुजर जाता है। अनुचित लाभ के चक्कर में ऐसी फाइलों को रोका जाता है। खतौनी से नाम हटाने अथवा संशोधन का वाद जिसे 32/38 कहते हैं, यह एसडीएम कोर्ट में दायर होता है।
इन सवालों के घेरे में लिपिकीय त्रुटि
किसी की भूमि की रजिस्ट्री के दौरान कई प्रक्रिया अपनाई जाती है। क्रय और विक्रय करने वाले दोनों पक्ष अपने मूल दस्तावेजों के साथ निबंधक से संपर्क करते हैं। किसी अधिकृत अधिवक्ता से भूमि से संंबंधित कागजात बनवाते हैं। दस्तावजों के रूप में दोनों पक्षों के पहचान पत्र, फोटो पहचान पत्र, निवास प्रमाण पत्र, पासपोर्ट साइज फोटो इत्यादि देते हैं। बैनामे के बाद दाखिल खारिज का आदेश डेढ़ माह होता है। इस आदेश के बाद खतौनी के लिए कंप्यूटर में डाटा फीड किया जाता है। सभी आवश्यक प्रमाणपत्र और सही आदेश के बावजूद नाम गलत होने पर बार-बार होने वाली लिपिकीय त्रुटि पर सवाल उठते हैं। एक बार गड़बड़ी होने पर आवेदक को बार-बार चक्कर लगाना पड़ता है। इसमें समय के साथ-साथ लोगों के रुपये भी खर्च होते हैं।
इस तरह सामने आती हैं गड़बडियां नाम का डाटा फीड करते समय कंप्यूटर पर अक्षरों में गलती की जाती है। जैसे किसी का नाम कमल है तो उसकी जगह कमला लिख दिया जाएगा। इसकी खतौनी निकालने पर नाम के गलत या सही होने की जानकारी होती है।
ये भी त्रुटि की जाती है
- पति के नाम की जगह पिता का नाम दर्ज करते हैं।
- क्रेता की जगह विक्रेता और विक्रेता की जगह क्रेता का नाम चढ़ा देते हैं।
- भूमि की गाटा संख्या चौहद्दी सहित अन्य चीजों में गड़बड़ी होती है।
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केस एक
चंगेरा-मंगेरा गांव के रहने वाले नरेंद्र कुमार बताते हैं कि उनकी खतौनी में तीन बाहरी लोगों के नाम गलत तरीके से चढ़ गए हैं। लेखपाल ने उन बाहरी तीनों लोगों के नाम खतौनी में बरकरार रखे। तहसील से जुड़े एक कर्मी ने सुधार कराने के नाम पर 3,000 रुपये भी ले लिए थे, लेकिन सात साल बाद भी गड़बड़ी दूर नहीं हो पाई। एसडीएम कोर्ट में संशोधन के लिए वाद दायर किए हैं।
केस दो
जोगीडीहा के राजकुमार की जगह खतौनी में राणा कुमार कर दिया गया। खतौनी में नाम का सुधार कराने के लिए भटक रहे हैं। बिचौलियों ने उसने रकम भी ली, लेकिन संशोधन नहीं हो पाया है। इनके अधिवक्ता प्रमोद नायक ने बताया कि खतौनी में हुई त्रुटि को लिपकीय त्रुटि बताते हैं। गड़बड़ी ठीक कराने की प्रक्रिया शुरु करा दिए हैं।
केस तीन
छपिया- छपिया निवासी अनवार आमल ने बताया कि खतौनी में उनके नाम में गड़बड़ी करके मोहम्मद अनवर कर दिया गया। दस साल से अधिक समय गुजर गया, लेकिन अब तक गड़बड़ी सुधर नहीं पाई है।
केस चार
धनघटा तहसील के बंतवार गांव के रहने वाले मूलचंद्र के पिता विजयी की मौत हुए 15 साल गुजर गए। वरासत के दौरान खतौनी में मूलचंद्र पुत्र विजयी की जगह मूलचंद पुत्र विजय दर्ज हो गया। आरोप है कि पिता का नाम सही कराने के लिए लेखपाल ने 700 रुपये भी लिए, लेकिन अब तक सही नहीं हो पाया।
केस पांच
धनघटा क्षेत्र के बंतवार गांव निवासी राम सिंह के पिता यमुना की मौत को आठ साल बीत गए। वरासत के दौरान खतौनी में नाम राम सिंह के स्थान राम अशीष दर्ज कर दिया गया। राम सिंह बताते हैं कि उसे ठीक कराने के लिए लेखपाल ने 3,000 रुपये भी लिए, लेकिन गड़बड़ी ठीक नहीं हो पाई। समस्या समाधान के लिए संपूर्ण समाधान दिवस में भी प्रार्थना दे चुके हैं।
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नियम इतने जटिल हैं कि लोग इनमें ही उलझ कर रह जाते हैं। इस प्रक्रिया में भी लोगों के ढाई से तीन हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। जिले में 100 से अधिक मामले लंबित हैं। इसमें सिर्फ खलीलाबाद तहसील में ही 30 से अधिक मामले लंबित हैं। एक से लेकर छह महीने बीतने के बाद भी इनकी खामियां ठीक नहीं हो पा रही हैं। भूमि की रजिस्ट्री कराने के दौरान पक्ष क्रेता और विक्रेता अपने सभी दस्तावेज जमा कराते हैं। इन दस्तावेजों के आधार पर 45 दिन में विक्रेता की जगह क्रेता का नाम दस्तावेज पर चढ़ाकर भूमि की खतौनी जारी करनी होती है।
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यह खतौनी बनाने के दौरान भी कई बार खेल होता है। कंप्यूटर से डाटा फीड करने के दौरान लिपिकीय त्रुटि लोगों के लिए मुसीबत बन जाती है। इसके निपटारे में भी लोगों की जेब से ढाई से तीन हजार खर्च हो जाते हैं। भागदौड़ करते हुए महीनों गुजर जाते हैं।
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यह होती है प्रक्रिया
किसी बैनामे के खारिज-दाखिल के बाद में होने वाली लिपिकीय त्रुटि सहित अन्य गड़बड़ी को दूर करने की कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इसके लिए त्रुटि संशोधन के लिए आवेदन करना पड़ता है। इसे तहसीलदार के दफ्तर में जमा कराया जाता है। फिर इस पर रिपोर्ट लगाकर यह कानूनगो और लेखपाल के पास जाती है। लेखपाल की रिपोर्ट लगाकर प्रक्रिया के तहत दोबारा जब फाइल लौटती है, तब इस पर तहसीलदार आदेश करते हैं। तहसील से जुडे़ लोगों का कहना है कि कई बार लेखपाल के स्तर से रिपोर्ट नहीं लगाई है। संशोधन के लिए 45 दिन की समय सीमा तय है। इसके बावजूद महीनों गुजर जाता है। अनुचित लाभ के चक्कर में ऐसी फाइलों को रोका जाता है। खतौनी से नाम हटाने अथवा संशोधन का वाद जिसे 32/38 कहते हैं, यह एसडीएम कोर्ट में दायर होता है।
इन सवालों के घेरे में लिपिकीय त्रुटि
किसी की भूमि की रजिस्ट्री के दौरान कई प्रक्रिया अपनाई जाती है। क्रय और विक्रय करने वाले दोनों पक्ष अपने मूल दस्तावेजों के साथ निबंधक से संपर्क करते हैं। किसी अधिकृत अधिवक्ता से भूमि से संंबंधित कागजात बनवाते हैं। दस्तावजों के रूप में दोनों पक्षों के पहचान पत्र, फोटो पहचान पत्र, निवास प्रमाण पत्र, पासपोर्ट साइज फोटो इत्यादि देते हैं। बैनामे के बाद दाखिल खारिज का आदेश डेढ़ माह होता है। इस आदेश के बाद खतौनी के लिए कंप्यूटर में डाटा फीड किया जाता है। सभी आवश्यक प्रमाणपत्र और सही आदेश के बावजूद नाम गलत होने पर बार-बार होने वाली लिपिकीय त्रुटि पर सवाल उठते हैं। एक बार गड़बड़ी होने पर आवेदक को बार-बार चक्कर लगाना पड़ता है। इसमें समय के साथ-साथ लोगों के रुपये भी खर्च होते हैं।
इस तरह सामने आती हैं गड़बडियां नाम का डाटा फीड करते समय कंप्यूटर पर अक्षरों में गलती की जाती है। जैसे किसी का नाम कमल है तो उसकी जगह कमला लिख दिया जाएगा। इसकी खतौनी निकालने पर नाम के गलत या सही होने की जानकारी होती है।
ये भी त्रुटि की जाती है
- पति के नाम की जगह पिता का नाम दर्ज करते हैं।
- क्रेता की जगह विक्रेता और विक्रेता की जगह क्रेता का नाम चढ़ा देते हैं।
- भूमि की गाटा संख्या चौहद्दी सहित अन्य चीजों में गड़बड़ी होती है।
केस एक
चंगेरा-मंगेरा गांव के रहने वाले नरेंद्र कुमार बताते हैं कि उनकी खतौनी में तीन बाहरी लोगों के नाम गलत तरीके से चढ़ गए हैं। लेखपाल ने उन बाहरी तीनों लोगों के नाम खतौनी में बरकरार रखे। तहसील से जुड़े एक कर्मी ने सुधार कराने के नाम पर 3,000 रुपये भी ले लिए थे, लेकिन सात साल बाद भी गड़बड़ी दूर नहीं हो पाई। एसडीएम कोर्ट में संशोधन के लिए वाद दायर किए हैं।
केस दो
जोगीडीहा के राजकुमार की जगह खतौनी में राणा कुमार कर दिया गया। खतौनी में नाम का सुधार कराने के लिए भटक रहे हैं। बिचौलियों ने उसने रकम भी ली, लेकिन संशोधन नहीं हो पाया है। इनके अधिवक्ता प्रमोद नायक ने बताया कि खतौनी में हुई त्रुटि को लिपकीय त्रुटि बताते हैं। गड़बड़ी ठीक कराने की प्रक्रिया शुरु करा दिए हैं।
केस तीन
छपिया- छपिया निवासी अनवार आमल ने बताया कि खतौनी में उनके नाम में गड़बड़ी करके मोहम्मद अनवर कर दिया गया। दस साल से अधिक समय गुजर गया, लेकिन अब तक गड़बड़ी सुधर नहीं पाई है।
केस चार
धनघटा तहसील के बंतवार गांव के रहने वाले मूलचंद्र के पिता विजयी की मौत हुए 15 साल गुजर गए। वरासत के दौरान खतौनी में मूलचंद्र पुत्र विजयी की जगह मूलचंद पुत्र विजय दर्ज हो गया। आरोप है कि पिता का नाम सही कराने के लिए लेखपाल ने 700 रुपये भी लिए, लेकिन अब तक सही नहीं हो पाया।
केस पांच
धनघटा क्षेत्र के बंतवार गांव निवासी राम सिंह के पिता यमुना की मौत को आठ साल बीत गए। वरासत के दौरान खतौनी में नाम राम सिंह के स्थान राम अशीष दर्ज कर दिया गया। राम सिंह बताते हैं कि उसे ठीक कराने के लिए लेखपाल ने 3,000 रुपये भी लिए, लेकिन गड़बड़ी ठीक नहीं हो पाई। समस्या समाधान के लिए संपूर्ण समाधान दिवस में भी प्रार्थना दे चुके हैं।