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मजदूरी कर रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के बेटे
ब्यूरो/अमर उजाला संभल
Updated Mon, 15 Aug 2016 01:23 AM IST
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जंग-ए-आजादी के लिए खून-पसीना बहाने वाले एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिवार का कोई पुरसाहाल नहीं है। कोई सरकारी इमदाद नहीं मिलने के कारण उनके दो बेटे मजदूरी कर परिवार चलाने को विवश हैं। इनके पास महज पांच बीघा ही जमीन है।
संभल जिले के गुन्नौर तहसील के गांव नगला अजमेरी निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ठाकुरी पुत्र कल्लू कुशवाहा के बेटे भूप सिंह और अमर सिंह मजदूरी करके परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। दोनों बेटों के पास महज पांच बीघा जमीन है। सरकार की ओर से न तो इन्हें बीपीएल कार्ड ही जारी किया गया और न ही अन्य सुविधाएं ही मिली हैं।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भले ही ठाकुरी को ताम्रपत्र भेंट हो, लेकिन सरकारों का ध्यान उनकी मालीहालत की ओर नहीं है। उनके परिजनों के मुताबिक ठाकुरी नले 29 साल की आयु में ब्रिटिश शासनकाल में बदायूं के क्रांतिकारी चौधरी बदन सिंह के संपर्क में रहकर अपने गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबूराम गिरि और गंगासहाय के साथ जंग-ए-आजादी की लड़ाई लड़ी थी।
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सन् 1942 में चौधरी बदन सिंह के निर्देश पर ठाकुरी अपने साथी बाबूराम एवं गंगासहाय और पांच अन्य लोगों के साथ बदायूं पहुंचे। यहां गोपनीय योजना तैयार कर रेलवे स्टेशनों से सरकारी खजाना लूटा था। इस जांबाज टोली ने चंदौसी के पास मछरिया एवं कछला के पास वितरोई रेलवे स्टेशन को आग के हवाले कर कर गोरों की सरकार का धन लूटने का भी काम किया था। इसके बाद वह गांव लौट आए।
उनके गांव में मौजूद होने की जानकारी होने पर अंग्रेजी सरकार का गुन्नौर थाने का इंचार्ज करीब तीन सौ पुलिसकर्मियों के साथ गांव पहुंच गया। इस पर वे साथियों के साथ ईख में छिप गए। इस पर ईख को भी घेर लिया गया। कुछ ही देर बाद उन्हें और उनके एक साथी को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया।
इस जुर्म में एक वर्ष की सजा हुई। उनके स्वतंत्रता संग्राम में किए गए योगदान को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताग्रपत्र देकर सम्मानित किया था। लेकिन, सरकार जंगे आजादी के इस दीवाने के परिवार को लेकर कोई फिक्रमंदी नहीं दिखाई। बेटे को नौकरी दिलाने के प्रयासों के बीच वे 28 जुलाई-2007 को दुनिया को अलविदा कह गए। लेकिन, सरकार की ओर से परिवार को इमदाद दिया जाना तो दूर तो सुध लेना तक मुनासिब नहीं समझा गया।
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संभल जिले के गुन्नौर तहसील के गांव नगला अजमेरी निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ठाकुरी पुत्र कल्लू कुशवाहा के बेटे भूप सिंह और अमर सिंह मजदूरी करके परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। दोनों बेटों के पास महज पांच बीघा जमीन है। सरकार की ओर से न तो इन्हें बीपीएल कार्ड ही जारी किया गया और न ही अन्य सुविधाएं ही मिली हैं।
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स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भले ही ठाकुरी को ताम्रपत्र भेंट हो, लेकिन सरकारों का ध्यान उनकी मालीहालत की ओर नहीं है। उनके परिजनों के मुताबिक ठाकुरी नले 29 साल की आयु में ब्रिटिश शासनकाल में बदायूं के क्रांतिकारी चौधरी बदन सिंह के संपर्क में रहकर अपने गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबूराम गिरि और गंगासहाय के साथ जंग-ए-आजादी की लड़ाई लड़ी थी।
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सन् 1942 में चौधरी बदन सिंह के निर्देश पर ठाकुरी अपने साथी बाबूराम एवं गंगासहाय और पांच अन्य लोगों के साथ बदायूं पहुंचे। यहां गोपनीय योजना तैयार कर रेलवे स्टेशनों से सरकारी खजाना लूटा था। इस जांबाज टोली ने चंदौसी के पास मछरिया एवं कछला के पास वितरोई रेलवे स्टेशन को आग के हवाले कर कर गोरों की सरकार का धन लूटने का भी काम किया था। इसके बाद वह गांव लौट आए।
उनके गांव में मौजूद होने की जानकारी होने पर अंग्रेजी सरकार का गुन्नौर थाने का इंचार्ज करीब तीन सौ पुलिसकर्मियों के साथ गांव पहुंच गया। इस पर वे साथियों के साथ ईख में छिप गए। इस पर ईख को भी घेर लिया गया। कुछ ही देर बाद उन्हें और उनके एक साथी को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया।
इस जुर्म में एक वर्ष की सजा हुई। उनके स्वतंत्रता संग्राम में किए गए योगदान को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताग्रपत्र देकर सम्मानित किया था। लेकिन, सरकार जंगे आजादी के इस दीवाने के परिवार को लेकर कोई फिक्रमंदी नहीं दिखाई। बेटे को नौकरी दिलाने के प्रयासों के बीच वे 28 जुलाई-2007 को दुनिया को अलविदा कह गए। लेकिन, सरकार की ओर से परिवार को इमदाद दिया जाना तो दूर तो सुध लेना तक मुनासिब नहीं समझा गया।