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भरोसा खोया तो खत्म होने लगा देशी घी मंडी का वजूद

Fri, 24 Jun 2016 01:12 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला संभल
ब्यूरो/अमर उजाला संभल Updated Fri, 24 Jun 2016 01:12 AM IST
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मिलावटी घी - फोटो : demo pics
एक दौर था जब चंदौसी की मशहूर देशी घी की मंडी में टन के हिसाब से घी की आपूर्ति होती थी। स्थानीय बिक्री के साथ साथ देशी घी के कारोबारी दिल्ली समेत बड़े शहरों में देशी घी की आपूर्ति करते थे। 
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मल्टीनेशनल कंपनियों ने देशी घी के कारोबार को अपने हाथों में ले लिया। किसान और पशुपालकों से सीधे दूध की खरीदारी शुरू कर दी। पशुओं की संख्या लगातार घटती गई। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र में लगभग दूध से दही और उसके बाद विलाया वाला देशी घी (दही से घरों में मक्खन निकाल कर बनने वाला घी) का उत्पादन समाप्त होता चला गया।
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 इसी बीच चंद लोगों ने मिलावटी घी का कारोबार शुरू कर दिया, जिससे दूर देश तक चंदौसी घी की मंडी के प्रति जमा भरोसा भी खोने लगा और इस तरह धीरे-धीरे चंदौसी की मशहूर देशी घी की मंडी का अस्तित्व समाप्त होने के कगार पर पहुंच गया। देशी घी के कारोबारियों ने व्यापार जिंदा रखने के लिए नामचीन कंपनियों के पैक्ड उत्पाद बेचने शुरू कर दिए। फिलहाल हांडी, मटके का घी तो सपना बनकर रह गया है। 
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देशी घी की मंडी आज भी है। लेकिन पुरानी बात नहीं है। न तो वैसा करोबार रहा और न ही कारोबार का आनंद। अब तो नामचीन कंपनियों के पैक्ड प्राडक्ट थोक और रिटेल में बेच रहे हैं। -श्याम चौधरी, देशी घी कारोबारी ।

ग्रामीण बड़ी तादात में मंडी में देशी घी बिक्री के लिए लाते थे। अब आवक ही नहीं है। करोबार का स्वरूप बदल चुका है। देशी का उत्पादन ग्रामीण क्षेत्र में घटकर बहुत कम हो गया है। नरेश अग्रवाल, देशी घी के कारोबारी।


चंदौसी की देशी घी की मंडी राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर थी। लगभग सभी बड़े शहरों में देशी घी की आपूर्ति की जाती थी। -विजय सेठ, कारोबारी।
देशी घी के कारोबार पर मल्टीनेशनल कंपनियों ने कब्जा जमा लिया है। पशुपालकों से सीधे डेयरी को माध्यम बनाकर दूध खरीदा जा रहा है। पहले पशुपालक अपने घर पर ही विलोया हुआ देशी घी बनाते थे। मंडी का तो अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है। -गिरीश रतन
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