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मंसूरपुरमाफी में टूटी परंपरा, नौ महिलाओं ने डाले मत
ब्यूरो/अमर उजाला संभल
Updated Thu, 10 Dec 2015 12:57 AM IST
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असमोली ब्लॉक के मंसूूरपुरमाफी गांव में बुधवार को वर्षों पुरानी परंपरा टूट गई और नई परंपरा पड़ी जब महिलाओं ने मताधिकार का प्रयोग किया। ग्राम प्रधान पद के लिए बुधवार को मतदान हुआ लेकिन पुरुषों की रूढ़िवादी परंपरा के चलते महिलाओं ने मतदान में भाग नहीं लिया था। जबकि प्रधान का पद महिला उम्मीदवार के लिए आरक्षित है।
कुल 12 महिलाएं चुनाव मैदान में थीं। जब जिला प्रशासन को यह जानकारी मिली कि महिलाएं मत नहीं डालेंगी तो शाम चार बजे के करीब जिलाधिकारी गांव पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों से सीधा संवाद किया। प्रत्याशियों के एजेंटों से बातचीत की। एक एजेंट जो प्रत्याशी का पति भी था। वह जिला निर्वाचन अधिकारी के आग्रह पर मतदान के लिए राजी हो गया।
उसने अपनी पत्नी को बुलाकर मतदान कराया इसके बाद एक-एक करके नौ महिलाओं के मत पड़े। जिला निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि इस तरह से स्त्री सशक्तीकरण के लिए प्रयास किया गया है जो सफल रहा। गांव पुरुषों ने बताया कि बुजुर्गों की परंपरा रही है कि महिलाएं वोट न डाले। इसी परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा था।
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गांव के पुरुषों ने दावा किया है कि उन्होंने किसी भी महिला पर दबाव नहीं बनाया था लेकिन महिलाएं स्वेच्छा से वोट न डालने के फैसले को मान रही थीं। पुरुषों ने जब पूछा गया कि यह परंपरा कब से चली आ रही है तो 65 वर्षीय मकसूद अली ने बताया कि विधानसभा, लोकसभा, जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत के चुनाव में महिलाएं वोट डालती रही हैं।
लेकिन प्रधान पद के चुनाव में महिलाओं ने कभी वोट नहीं डाले। वहीं, 50 वर्षीय शाजिद अली ने बताया कि जब से उन्होंने होश संभाला है महिलाओं ने कभी वोट नहीं डाले हैं। जो भी प्रत्याशी चुनाव में खड़े होते थे उनके बीच सहमति बन जाती थी कि हार जीत का फैसला सिर्फ पुरुष ही करेंगे। इस तरह से परंपरा आगे बढ़ती रही है।
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कुल 12 महिलाएं चुनाव मैदान में थीं। जब जिला प्रशासन को यह जानकारी मिली कि महिलाएं मत नहीं डालेंगी तो शाम चार बजे के करीब जिलाधिकारी गांव पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों से सीधा संवाद किया। प्रत्याशियों के एजेंटों से बातचीत की। एक एजेंट जो प्रत्याशी का पति भी था। वह जिला निर्वाचन अधिकारी के आग्रह पर मतदान के लिए राजी हो गया।
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उसने अपनी पत्नी को बुलाकर मतदान कराया इसके बाद एक-एक करके नौ महिलाओं के मत पड़े। जिला निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि इस तरह से स्त्री सशक्तीकरण के लिए प्रयास किया गया है जो सफल रहा। गांव पुरुषों ने बताया कि बुजुर्गों की परंपरा रही है कि महिलाएं वोट न डाले। इसी परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा था।
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गांव के पुरुषों ने दावा किया है कि उन्होंने किसी भी महिला पर दबाव नहीं बनाया था लेकिन महिलाएं स्वेच्छा से वोट न डालने के फैसले को मान रही थीं। पुरुषों ने जब पूछा गया कि यह परंपरा कब से चली आ रही है तो 65 वर्षीय मकसूद अली ने बताया कि विधानसभा, लोकसभा, जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत के चुनाव में महिलाएं वोट डालती रही हैं।
लेकिन प्रधान पद के चुनाव में महिलाओं ने कभी वोट नहीं डाले। वहीं, 50 वर्षीय शाजिद अली ने बताया कि जब से उन्होंने होश संभाला है महिलाओं ने कभी वोट नहीं डाले हैं। जो भी प्रत्याशी चुनाव में खड़े होते थे उनके बीच सहमति बन जाती थी कि हार जीत का फैसला सिर्फ पुरुष ही करेंगे। इस तरह से परंपरा आगे बढ़ती रही है।