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Saharanpur News: मिट्टी की सोंधी महक के साथ कुम्हार चाक से गढ़ रहे रोशनी की उम्मीद

Fri, 17 Oct 2025 12:43 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Fri, 17 Oct 2025 12:43 AM IST
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With the sweet smell of clay, the potter's wheel is creating hope for light.
बड़गांव। बाजार में मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ने लगी है। मिट्टी के दीयों का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। कुछ साल पहले तक जहां प्लास्टिक और बिजली से चलने वाले दीयों ने बाजार पर कब्जा जमा लिया था। वहीं अब लोग फिर से मिट्टी के पारंपरिक दीयों की ओर लौट रहे हैं। पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरुकता और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने की भावना को लेकर कुम्हारों के चाक अब दिन रात रोशनी की उम्मीद गढ़ रहे हैं।
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जड़ौदा पांडा रोड स्थित कुम्हारों की बस्ती में इन दिनों खूब रौनक देखने को मिल रही है। कुम्हार परिवार सुबह से रात तक सोंधी मिट्टी की महक के साथ दीयों को आकार देने में जुटे हैं। कुम्हार नाथीराम और काला प्रजापत ने बताया कि वह तीस साल से इस पुश्तैनी धंधे से जुड़े हैं। पहले बिजली के चाक नहीं होते थे। सारी मेहनत हाथ से ही होती थी। कोरोना काल के बाद लोगों में मिट्टी से बने सामानों के प्रति लगाव तेजी से बढ़ा है। पहले लोग चाइनीज या प्लास्टिक के सामान की ओर ज्यादा आकर्षित थे, लेकिन अब बीमारियों और पर्यावरण प्रदूषण के कारण लोगों की सोच बदली है।
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सुरेन्द्र प्रजापत ने बताया कि इस बार दीपावली के लिए उन्होंने करीब पचास हजार मिट्टी के दीये तैयार किए हैं। ग्राहकों की मांग के अनुसार फूलनुमा, चौमुखी, रंगीन और विशेष सजावटी दीये तैयार किए जा रहे हैं। मिट्टी के दीये तैयार करने की प्रक्रिया आसान नहीं होती। सबसे पहले मिट्टी की गुणवत्ता की जांच की जाती है। सही मिट्टी मिलने के बाद उसे पानी में गूंथकर तैयार किया जाता है। फिर चाक पर उसे आकार देकर सुखाने के बाद भट्ठी में पकाया जाता है। एक दीया तैयार करने में जितनी मेहनत लगती है, उतना ही धैर्य और हुनर भी चाहिए।
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दल्हेड़ी ग्राम प्रधान सुरेन्द्र प्रजापत ने बताया कि मिट्टी के बर्तन बनाना सिर्फ एक काम नहीं, यह एक कला है, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी सीखा जाता है। घर के सभी सदस्य इसमें हाथ बंटा रहे हैं। कोई रंग भर रहा है, तो कोई पैकिंग और बिक्री में मदद कर रहा है। जब लोग उनके बनाए दीयों को खरीदते हैं तो दिल से खुशी होती है। ऐसा लगता है कि हमारी पुरानी परंपरा फिर से जीवित हो रही है। सच कहा जाए तो इस बार दीपावली पर मिट्टी के दीयों का उजाला केवल घरों को नहीं, बल्कि देश की परंपरा और पर्यावरण के भविष्य को भी रोशन करेगा।
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