{"_id":"7d85bb6cec3c7e0732c4641a74ec284b","slug":"no-facilities-in-district-hospital-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"सुविधाओं का दावा हवा हवाई ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सुविधाओं का दावा हवा हवाई
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Wed, 09 Sep 2015 12:28 AM IST
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छत से गिर कर घायल हुए बच्चे को परिजन जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। वहां प्राथमिक उपचार के बाद भी जब बच्चे के मुंह और नाक से खून आना बंद नहीं हुआ तो परिजनों ने फिर से डॉक्टर से बात की।
डॉक्टर ने सीटी स्कैन कराने को कहा, लेकिन जिला अस्पताल में यह सुविधा ही नहीं है। मजबूरन परिजनों को प्राइवेट में सीटी स्कैन कराना पड़ा, जिसमें उन्हें अच्छी खासी रकम खर्च करनी पड़ी। यह तो बानगी मात्र है, जिला अस्पताल में कमोवेश ऐसे मामले रोज ही होते हैं। यहां कहने को तो ट्रामा सेंटर भी है, लेकिन वहां कोई भी सुविधा नहीं है।
सरकार कितने भी दावे कर ले, लेकिन हकीकत यही है कि समय पर जांच और इलाज की सुविधाएं नहीं मिल पाने के कारण लोग दम तोड़ रहे हैं।
खेल खेल में छत से गिरा था अमीन
- शहर के खान आलमपुरा निवासी नौशाद के छह वर्षीय पुत्र अमीन मंगलवार को खेल खेल में ही घर की छत से गिर गया था। इससे उसके सिर, कान और नाक में गंभीर चोटें आने के बाद जिला चिकित्सालय की इमरजेंसी में लाया गया था। लेकिन परिजनों को यहां जांच से लेकर इलाज तक में ना उम्मीद होकर जाना पड़ा।
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किस काम की इमरजेंसी, किस काम का ट्रामा सेंटर?
- सड़क हादसों से लेकर अन्य घटनाओं में सिर से दिमाग में गहरी चोट वाले मरीजों के साथ इमरजेंसी में अक्सर ऐसा ही होता है। इमरजेंसी में रोजाना औसतन दस से पंद्रह मरीज गंभीर हादसे वाले आते हैं।
इनमें पांच से छह मरीज ऐसे होते हैं जिन्हें सीटी स्कैन करवाने की जरूरत पड़ती है। लेकिन जब यह जांच यहां नहीं होती है तो अधिकतर मजबूर बाहर से निजी लैब में दो से चार हजार रुपये तक खर्च कर यह जांच करवाकर आगे इलाज करवाते हैं।
इस तरह के गंभीर रोगियों के लिए यहां कई साल से ट्रामा सेंटर भी बना हुआ है, लेकिन न तो यहां विशेषज्ञ हैं और न ही सीटी स्कैन जैसी सुविधा। यदि यह ट्रामा सेंटर संचालित हो जाता तो भी मरीजों की जिंदगी खतरे में न पड़ती।
एक्सरे अल्ट्रासाउंड तक सीमित जांच
- जिला अस्पताल में अभी तक एक्सरे या अल्ट्रासाउंड तक की ही जांच सुविधा है। यहां भी एक ही विशेषज्ञ पर रोजाना 200 से 300 मरीजों का बोझ होता है। उसकी जांच रिपोर्ट में भी कई बार घंटो तो कई बार एक दिन का समय तक लग जाता है। हालांकि अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि जल्द ही डिजिटल एक्सरे के लिए एक अलग डिजिटल एक्सरे रूम का निर्माण कराया जा रहा है।
ट्रामा सेंटर चलने तक है मेडिकल कॉलेज का विकल्प : डा. आशा शर्मा
जिला चिकित्सालय की प्रमुख अधीक्षक डा. आशा शर्मा कहती हैं कि सीटी स्कैन की जांच वाले मामले में मरीजों के लिए अब जिले के ही राजकीय मेडिकल कॉलेज में जांच करवाने की सलाह दी जाती है, लेकिन वहां तक पहुंचने की बजाय अधिकतर मरीज अपने स्तर पर निजी लैब से जांच रिपोर्ट ले आते हैं।
उनका कहना है कि जिला अस्पताल में लंबे समय से स्थापित ट्रामा सेंटर को पूरी तरह संचालित करने के प्रयास जारी हैं। इसके बाद यहां सीटी स्कैन जैसी जांच के साथ ही हेड इंजरी और न्यूरो सर्जरी जैसे विशेषज्ञ उपलब्ध हो सकेंगे।
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डॉक्टर ने सीटी स्कैन कराने को कहा, लेकिन जिला अस्पताल में यह सुविधा ही नहीं है। मजबूरन परिजनों को प्राइवेट में सीटी स्कैन कराना पड़ा, जिसमें उन्हें अच्छी खासी रकम खर्च करनी पड़ी। यह तो बानगी मात्र है, जिला अस्पताल में कमोवेश ऐसे मामले रोज ही होते हैं। यहां कहने को तो ट्रामा सेंटर भी है, लेकिन वहां कोई भी सुविधा नहीं है।
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सरकार कितने भी दावे कर ले, लेकिन हकीकत यही है कि समय पर जांच और इलाज की सुविधाएं नहीं मिल पाने के कारण लोग दम तोड़ रहे हैं।
खेल खेल में छत से गिरा था अमीन
- शहर के खान आलमपुरा निवासी नौशाद के छह वर्षीय पुत्र अमीन मंगलवार को खेल खेल में ही घर की छत से गिर गया था। इससे उसके सिर, कान और नाक में गंभीर चोटें आने के बाद जिला चिकित्सालय की इमरजेंसी में लाया गया था। लेकिन परिजनों को यहां जांच से लेकर इलाज तक में ना उम्मीद होकर जाना पड़ा।
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किस काम की इमरजेंसी, किस काम का ट्रामा सेंटर?
- सड़क हादसों से लेकर अन्य घटनाओं में सिर से दिमाग में गहरी चोट वाले मरीजों के साथ इमरजेंसी में अक्सर ऐसा ही होता है। इमरजेंसी में रोजाना औसतन दस से पंद्रह मरीज गंभीर हादसे वाले आते हैं।
इनमें पांच से छह मरीज ऐसे होते हैं जिन्हें सीटी स्कैन करवाने की जरूरत पड़ती है। लेकिन जब यह जांच यहां नहीं होती है तो अधिकतर मजबूर बाहर से निजी लैब में दो से चार हजार रुपये तक खर्च कर यह जांच करवाकर आगे इलाज करवाते हैं।
इस तरह के गंभीर रोगियों के लिए यहां कई साल से ट्रामा सेंटर भी बना हुआ है, लेकिन न तो यहां विशेषज्ञ हैं और न ही सीटी स्कैन जैसी सुविधा। यदि यह ट्रामा सेंटर संचालित हो जाता तो भी मरीजों की जिंदगी खतरे में न पड़ती।
एक्सरे अल्ट्रासाउंड तक सीमित जांच
- जिला अस्पताल में अभी तक एक्सरे या अल्ट्रासाउंड तक की ही जांच सुविधा है। यहां भी एक ही विशेषज्ञ पर रोजाना 200 से 300 मरीजों का बोझ होता है। उसकी जांच रिपोर्ट में भी कई बार घंटो तो कई बार एक दिन का समय तक लग जाता है। हालांकि अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि जल्द ही डिजिटल एक्सरे के लिए एक अलग डिजिटल एक्सरे रूम का निर्माण कराया जा रहा है।
ट्रामा सेंटर चलने तक है मेडिकल कॉलेज का विकल्प : डा. आशा शर्मा
जिला चिकित्सालय की प्रमुख अधीक्षक डा. आशा शर्मा कहती हैं कि सीटी स्कैन की जांच वाले मामले में मरीजों के लिए अब जिले के ही राजकीय मेडिकल कॉलेज में जांच करवाने की सलाह दी जाती है, लेकिन वहां तक पहुंचने की बजाय अधिकतर मरीज अपने स्तर पर निजी लैब से जांच रिपोर्ट ले आते हैं।
उनका कहना है कि जिला अस्पताल में लंबे समय से स्थापित ट्रामा सेंटर को पूरी तरह संचालित करने के प्रयास जारी हैं। इसके बाद यहां सीटी स्कैन जैसी जांच के साथ ही हेड इंजरी और न्यूरो सर्जरी जैसे विशेषज्ञ उपलब्ध हो सकेंगे।