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मदद करे सरकार तो फिर चमके हथकरघा कारोबार

Fri, 07 Aug 2020 12:12 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Fri, 07 Aug 2020 12:12 AM IST
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If the government helps then the handloom business shines again
छुटमलपुर के नानका में खड्डी मशीन पर बुनाई करता कारीगर - फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। एक वक्त था जब जिले में हथकरघा उद्योग खूब ऊंचाई छू रहा था। बड़ी संख्या में हथकरघा इकाई थीं। हथकरघा इकाई संचालक के साथ ही काफी लोगों को इससे रोजगार भी मिलता था। कच्चे माल की उपलब्धता में कमी, संसाधनों का अभाव और तैयार माल की बाजार में खपत कम होने से यह कारोबार दम तोड़ता जा रहा है। हथकरघा उद्योग की कुछ ही इकाई जिले में बची हैं।
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1990 के दशक में देवबंद में थीं 10 से 15 यूनिट, अब एक भी नहीं
फोटो संख्या 2 की सीरीज
देवबंद। घरों की सुंदरता में चार चांद लगाने वाले कालीन (दरी), बैडशीट, दरवाजों के पर्दे और तौलिये आदि का कभी देवबंद में अच्छा खासा कारोबार था, क्योंकि यहां के औद्योगिक क्षेत्र में 10 से 15 यूनिट हैंडलूम की हुआ करती थी। हालात बदलते गए और हैंडलूम का कारोबार धीरे-धीरे दम तोड़ता चला गया। आज हैंडलूम कारोबार कोई नाम लेने वाला भी नहीं बचा है।
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आईआईए के पूर्व चैप्टर चेयरमैन नितिन गुप्ता बताते हैं कि 1980 से 1990 तक हैंडलूम का कारोबार देवबंद में खूब चला था। घर-घर में इसके कारीगर थे। समय बीतने के साथ-साथ कच्चा माल समय पर मिलना बंद हो गया। जिससे कपड़ा तैयार करने में कारीगरों के सामने समस्या पैदा होने लगी और धीरे-धीरे उद्योग बंद होने लगे।
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उद्यमी सुधीर गर्ग (बबली) बताते हैं कि कपड़ा बनाने के लिए धागा पानीपत या दिल्ली से लाना पड़ता था। हैंडलूम का कारोबार करते समय सरकार ने वादा किया था कि तैयार माल खरीदेंगे। कुछ दिन तक माल खरीदा, लेकिन बाद में तैयार माल में कमी बताते हुए उससे खरीदने से इंकार कर दिया। माल को बेचने में व्यापारियों के सामने दिक्कत आने लगी। हालात ऐसे बन गए कि कारीगरों को पैसा देने का संकट भी खड़ा हो गया, क्योंकि समय पर माल तैयार होकर नहीं बिक पाया। जिस कारण 8 से 10 वर्षों के भीतर ही हैंडलूम का कारोबार दम तोड़ गया।
उद्यमी विपिन भारतीय बताते हैं कि सरकार से सहयोग नहीं मिलने के कारण हैंडलूम कारोबार से जुड़े उद्यमियों ने इससे तौबा कर ली। जो उद्यमी इस कारोबार को करते थे, उनमें अधिकांश या तो शहर छोड़कर चले गए जबकि कुछ ने कारोबार बदल दिए। नई पीढ़ी भी उक्त कारोबार फिर से शुरू नहीं करना चाहती है। उद्यमियों का कहना है कि हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल में उद्यमियों को सरकार काफी सहूलियत दे रही है। जबकि उत्तर प्रदेश में टैक्स, बिजली बिल, बैंक ब्याज आदि में छूट नहीं दी गई।
नानका में बनते थे कालीन, तौलिये और दुतई
छुटमलपुर। क्षेत्र के गांव नानका में कभी हथकरघा उद्योग पूरे यौवन पर था। यहां अंसारी बिरादारी के करीब 400 घरों में से प्रत्येक में हथकरघा या खड्डी पर तौलिया, कालीन, स्टाल, पायदान, दुतई, खेस, दरी, लिहाफ के लिए जोड़ी के साथ ही नेताओं के पहनने के लिए खद्दर तक बनाई जाती थी। पावरलूम मशीन आने और हथकरघा उद्योग के प्रति सरकार की उदासीन नीतियों के चलते यह कारोबार दम तोड़ता चला गया। फिलहाल यहां करीब 20 घरों में खड्डी पर चटाई, दरी और खेस आदि बनाए जाते हैं। हालांकि लॉकडाउन के चलते इनमें से भी चटाई बनाने वालों का काम प्रभावित हुआ है, क्योंकि उसकी मांग स्कूल और मदरसों में ज्यादा है, जो फिलहाल बंद चल रहे हैं।
नानका गांव के पूर्व प्रधान हाजी शमीम अंसारी बताते हैं कि वे खुद भी बुनना जानते हैं। एक वक्त था कि गांव में महिलाएं भी हथकरघे पर रात दिन काम करती थीं, लेकिन सरकार की नीतियों के चलते यह कारोबार चौपट हो गया है। ना तो कच्चा माल मिल पाता है और ना ही तैयार माल का बाजार में आसानी से उठान है। यदि सरकार मदद करे तो आत्मनिर्भर भारत का सपना पूरा हो सकता है।
गांव के अब्दुल समद कहते हैं कि उन्होंने 35 साल तक हथकरघा पर काम किया है। नौ साल पूर्व लगातार हुए नुकसान के बाद उन्होंने काम बंद कर दिया था। क्षेत्र के गांवों में पहले सूत कताई होती थी तो कच्चा माल आसानी से मिल जाता था लेकिन अब वह नहीं मिलता है। उन्हें इस बात का अफसोस है कि युवा पीढ़ी भी बचत न होने से इस हुनर से दूर होती जा रही है।
कारोबार को जिंदा रख रहे यह लोग
नानका गांव में कारीगर 62 वर्षीय मुस्तकीम कहते हैं कि वे पांच दशक से इस काम को कर रहे हैं। सबसे पहले मेटिंग बनानी शुरु की थी। दो साल बाद पावरलूम आ गई तो धंधा मंदा पड़ता चला गया। हालांकि वे अब भी इस हुनर को जिंदा रखे हैं। लॉकडाउन में बनाया मेटिंग का माल दिखाते हुए कहते हैं कि स्कूल और मदरसे बंद होने के कारण माल का उठान नहीं हो सका है।

शहजाद अंसारी बताते हैं कि पांच साल पहले उन्होंने 15 खड्डी लगाई थीं। दरी और पायदान बनाने का काम किया लेकिन लगातार नुकसान के चलते काम बंद करना पड़ा। खड्डी तो अब भी है लेकिन कच्चा माल पानीपत से मिलता है और फिर तैयार माल बेचने के लिए मेरठ या खतौली आदि जगहों पर जाना पड़ता है। ऐसे में किराया भी नहीं निकल पाता है, बचत तो दूर की बात है।

मुस्तकीम

मुस्तकीम- फोटो : SAHARANPUR

अब्दुल समद

अब्दुल समद- फोटो : SAHARANPUR

शहजाद अंसारी

शहजाद अंसारी- फोटो : SAHARANPUR

पूर्व प्रधान शमीम अंसारी

पूर्व प्रधान शमीम अंसारी- फोटो : SAHARANPUR

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