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हीमोफीलिया के इलाज का सेंटर बना राजकीय मेडिकल कॉलेज
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सहारनपुर। विश्व हीमोफीलिया दिवस आज मनाया जा रहा है। हीमोफीलिया आनुवंशिक बीमारी है जो माता-पिता से बच्चे में आती है। यदि कोई बच्चा इस बीमारी से ग्रसित है तो उसमें पैदा होते ही या फिर पांच वर्ष की आयु तक लक्षण नजर आ सकते हैं। इसमें शरीर पर लाल और काले चकत्ते पड़ जाते हैं, साथ ही हल्की सी चोट या खरोंच लगने पर खून बहने लगता है जो रुकता नहीं है। यानी खून का थक्का नहीं जमता है। हीमोफीलिया के मरीजों को इलाज के लिए पहले दिल्ली, लखनऊ, चंडीगढ़ और ग्रेटर नोएडा भेजा जाता था, लेकिन अब शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन मेडिकल कॉलेज पिलखनी हीमोफीलिया बीमारी के इलाज का सेंटर बना हुआ है। जहां प्रदेश के साथ ही हिमाचल, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली तक के मरीज इलाज कराने पहुंच रहे हैं।
मेडिकल कॉलेज में हीमोफीलिया रोगियों का इलाज करीब ढाई वर्ष पहले शुरू हुआ था, जिसके बाद से यहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में करीब सौ मरीजों का इलाज चल रहा है, जिनमें ज्यादातर बच्चे और किशोर हैं। हीमोफीलिया के मरीजों के इलाज के लिए प्राचार्य डॉ. अरविंद कुमार त्रिवेदी के द्वारा समिति बनाई गई है, जिसमें डॉ. अभिलाषा को नोडल अधिकारी बनाया गया है। इसके अलावा समिति में मेडिसिन विभाग, हड्डी विभाग, बाल रोग विशेषज्ञ, ब्लड बैंक आदि के चिकित्सकों को शामिल किया गया है। ।
लखनऊ से आते हैं फैक्टर
हीमोफीलिया के मरीजों को लगने वाले फैक्टर संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज लखनऊ से आते हैं, जो सरकार के द्वारा भेजे जाते हैं। जांच के बाद सामने आने वाली मरीज की रिपोर्ट के आधार पर मरीज को फैक्टर दिया जाता है। फैक्टर अलग अलग तरह के होते हैं।
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दिल्ली, ग्रेटर नोएडा, चंडीगढ़, लखनऊ होती है जांच
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सुशील शर्मा ने बताया कि उनके पास मरीज खून बहते हुए आते हैं। डॉक्टरों का पैनल मरीज की काउंसिलिंग करते हैं। यदि मरीज में हीमोफीलिया के लक्षण नजर आते हैं तो मरीज को जांच के लिए दिल्ली, ग्रेटर नोएडा, पीजीआई चंडीगढ़ या एसजीपीजीआई लखनऊ भेजते हैं। वहां से जांच रिपोर्ट मिलने के बाद तय होता है कि मरीज को कौन सा फैक्टर दिया जाना है।
नियमित इलाज लेने से लंबा जी सकता है मरीज
डॉ. सुुशील शर्मा के अनुसार हीमोफीलिया बीमारी का नियमित इलाज जरूरी है। जो मरीज अपने चिकित्सक के संपर्क में नियमित रूप से बना रहता है और इलाज लेता रहता है वह लंबा जीवन जी सकता है। ऐसे में जरूरी है कि इलाज न छोड़ें।
यह है इलाज
खून में जिस क्लॉटिंग फैक्टर की कमी होती है उसे सुई के जरिए खून में पहुंचाया जाता है। चोट की जगह पर पर्याप्त क्लॉटिंग फैक्टर पहुंचते ही खून बहना बंद हो जाता है। जल्द से जल्द इलाज से दर्द कम करने और जोड़ों, मांसपेशियों और अंगों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
राजकीय मेडिकल कॉलेज में हीमोफीलिया के मरीजों को फैक्टर देने की सुविधा है। वर्तमान में करीब सौ मरीजों का इलाज नियमित रूप से चल रहा है। फैक्टर भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। इलाज के लिए चिकित्सकों की समिति बनाई गई है।
- डॉ. अरविंद त्रिवेदी, प्राचार्य, शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन मेडिकल कॉलेज
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मेडिकल कॉलेज में हीमोफीलिया रोगियों का इलाज करीब ढाई वर्ष पहले शुरू हुआ था, जिसके बाद से यहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में करीब सौ मरीजों का इलाज चल रहा है, जिनमें ज्यादातर बच्चे और किशोर हैं। हीमोफीलिया के मरीजों के इलाज के लिए प्राचार्य डॉ. अरविंद कुमार त्रिवेदी के द्वारा समिति बनाई गई है, जिसमें डॉ. अभिलाषा को नोडल अधिकारी बनाया गया है। इसके अलावा समिति में मेडिसिन विभाग, हड्डी विभाग, बाल रोग विशेषज्ञ, ब्लड बैंक आदि के चिकित्सकों को शामिल किया गया है। ।
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लखनऊ से आते हैं फैक्टर
हीमोफीलिया के मरीजों को लगने वाले फैक्टर संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज लखनऊ से आते हैं, जो सरकार के द्वारा भेजे जाते हैं। जांच के बाद सामने आने वाली मरीज की रिपोर्ट के आधार पर मरीज को फैक्टर दिया जाता है। फैक्टर अलग अलग तरह के होते हैं।
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दिल्ली, ग्रेटर नोएडा, चंडीगढ़, लखनऊ होती है जांच
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सुशील शर्मा ने बताया कि उनके पास मरीज खून बहते हुए आते हैं। डॉक्टरों का पैनल मरीज की काउंसिलिंग करते हैं। यदि मरीज में हीमोफीलिया के लक्षण नजर आते हैं तो मरीज को जांच के लिए दिल्ली, ग्रेटर नोएडा, पीजीआई चंडीगढ़ या एसजीपीजीआई लखनऊ भेजते हैं। वहां से जांच रिपोर्ट मिलने के बाद तय होता है कि मरीज को कौन सा फैक्टर दिया जाना है।
नियमित इलाज लेने से लंबा जी सकता है मरीज
डॉ. सुुशील शर्मा के अनुसार हीमोफीलिया बीमारी का नियमित इलाज जरूरी है। जो मरीज अपने चिकित्सक के संपर्क में नियमित रूप से बना रहता है और इलाज लेता रहता है वह लंबा जीवन जी सकता है। ऐसे में जरूरी है कि इलाज न छोड़ें।
यह है इलाज
खून में जिस क्लॉटिंग फैक्टर की कमी होती है उसे सुई के जरिए खून में पहुंचाया जाता है। चोट की जगह पर पर्याप्त क्लॉटिंग फैक्टर पहुंचते ही खून बहना बंद हो जाता है। जल्द से जल्द इलाज से दर्द कम करने और जोड़ों, मांसपेशियों और अंगों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
राजकीय मेडिकल कॉलेज में हीमोफीलिया के मरीजों को फैक्टर देने की सुविधा है। वर्तमान में करीब सौ मरीजों का इलाज नियमित रूप से चल रहा है। फैक्टर भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। इलाज के लिए चिकित्सकों की समिति बनाई गई है।
- डॉ. अरविंद त्रिवेदी, प्राचार्य, शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन मेडिकल कॉलेज