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उतराखंड हाईकोर्ट का फतवों पर बैन का आदेश बेमानी: उलमा
Updated Sat, 01 Sep 2018 12:22 AM IST
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उत्तराखंड हाईकोर्ट का फतवों पर बैन का आदेश बेमानी : उलमा
देवबंद (सहारनपुर)। शरीयत की रोशनी में मुस्लिम समाज का मार्गदर्शन करने वाले फतवों पर उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी करने को लेकर दारुल उलूम ने ऐतराज जताया है। दारुल उलूम ने अपना पक्ष रखते हुए दो टूक कहा कि जब उच्चतम न्यायालय इस मामले में पहले ही अपना आदेश दे चुका है तो उत्तराखंड हाईकोर्ट को इस संबंध में किसी प्रकार का आदेश जारी करने की जरूरत नहीं थी।
शरई फतवों पर रोक लगाने वाले उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश पर दारुल उलूम के प्रवक्ता अशरफ उस्मानी का कहना है कि वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने फतवों को लेकर फैसला सुनाते हुए आदेश जारी किया था। जिसमें कोर्ट ने उस समय फतवों को धार्मिक मशविरा माना और मशविरा पर किसी तरह की रोक नहीं लगाए जाने का आदेश जारी किया था। उस्मानी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी उनके पास मौजूद है।
प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन व जमीयत दावातुल मुसलीमीन के संरक्षक कारी इसहाक गोरा का कहना है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा फतवों पर प्रतिबंध लगाना संविधान के तहत मुसलमानों को मिले हकों पर सीधा हमला है। ऐसा लगता है कि कोर्ट ने जल्दबाजी में यह फैसला सुनाया है इसलिए अदालत को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। कारी इसहाक ने फतवे के मायने समझते हुए कहा कि फतवा एक सलाह होती है। जो किसी के द्वारा पूछे जाने पर उलमा को कुरआन और हदीस की रोशनी में देना होता है। उन्होंने कहा कि सन 2014 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चला था जिसमें दारुल उलूम देवबंद ने जीत हासिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह शरीयत का मामला है इसको शरीयत में ही रहने दिया जाए। इस पर बैन लगाना सही नहीं है। दारुल उलूम अशरफिया के मोहतमिम मौलाना सालिम अशरफ कासमी का कहना है कि फतवों पर रोक लगाने का आदेश देना मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप है। क्योंकि फतवा मजहबी राय है जो शरीयत की रोशनी में दिया जाता है। साथ ही कहा कि फतवा जारी करने वाले उसे मानने के लिए किसी को बाध्य नहीं कर सकते हैं और न ही किसी के साथ जबरदस्ती कर सकते हैं। मौलाना सालिम ने कहा कि जब इस मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत अपना फैसला सुना चुकी है तो उत्तराखंड हाईकोर्ट का फतवों पर रोक लगाने का आदेश समझ से परे है। उन्होंने यह भी कहा कि फतवों पर देश में हमेशा किसी न किसी रुप में बहस छिड़ी रहती है। जबकि अनगिनत बार उलमा देश को यह बता चुके हैं फतवा इस्लामिक मशविरा है जो केवल इच्छा से मानने वाले पर निर्भर है और इसका भारतीय न्याय व्यवस्था से कोई लेना देना नहीं है।
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देवबंद (सहारनपुर)। शरीयत की रोशनी में मुस्लिम समाज का मार्गदर्शन करने वाले फतवों पर उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी करने को लेकर दारुल उलूम ने ऐतराज जताया है। दारुल उलूम ने अपना पक्ष रखते हुए दो टूक कहा कि जब उच्चतम न्यायालय इस मामले में पहले ही अपना आदेश दे चुका है तो उत्तराखंड हाईकोर्ट को इस संबंध में किसी प्रकार का आदेश जारी करने की जरूरत नहीं थी।
शरई फतवों पर रोक लगाने वाले उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश पर दारुल उलूम के प्रवक्ता अशरफ उस्मानी का कहना है कि वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने फतवों को लेकर फैसला सुनाते हुए आदेश जारी किया था। जिसमें कोर्ट ने उस समय फतवों को धार्मिक मशविरा माना और मशविरा पर किसी तरह की रोक नहीं लगाए जाने का आदेश जारी किया था। उस्मानी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी उनके पास मौजूद है।
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प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन व जमीयत दावातुल मुसलीमीन के संरक्षक कारी इसहाक गोरा का कहना है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा फतवों पर प्रतिबंध लगाना संविधान के तहत मुसलमानों को मिले हकों पर सीधा हमला है। ऐसा लगता है कि कोर्ट ने जल्दबाजी में यह फैसला सुनाया है इसलिए अदालत को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। कारी इसहाक ने फतवे के मायने समझते हुए कहा कि फतवा एक सलाह होती है। जो किसी के द्वारा पूछे जाने पर उलमा को कुरआन और हदीस की रोशनी में देना होता है। उन्होंने कहा कि सन 2014 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चला था जिसमें दारुल उलूम देवबंद ने जीत हासिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह शरीयत का मामला है इसको शरीयत में ही रहने दिया जाए। इस पर बैन लगाना सही नहीं है। दारुल उलूम अशरफिया के मोहतमिम मौलाना सालिम अशरफ कासमी का कहना है कि फतवों पर रोक लगाने का आदेश देना मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप है। क्योंकि फतवा मजहबी राय है जो शरीयत की रोशनी में दिया जाता है। साथ ही कहा कि फतवा जारी करने वाले उसे मानने के लिए किसी को बाध्य नहीं कर सकते हैं और न ही किसी के साथ जबरदस्ती कर सकते हैं। मौलाना सालिम ने कहा कि जब इस मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत अपना फैसला सुना चुकी है तो उत्तराखंड हाईकोर्ट का फतवों पर रोक लगाने का आदेश समझ से परे है। उन्होंने यह भी कहा कि फतवों पर देश में हमेशा किसी न किसी रुप में बहस छिड़ी रहती है। जबकि अनगिनत बार उलमा देश को यह बता चुके हैं फतवा इस्लामिक मशविरा है जो केवल इच्छा से मानने वाले पर निर्भर है और इसका भारतीय न्याय व्यवस्था से कोई लेना देना नहीं है।
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