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गेहूं की फसल में लगा येलो रस्ट रोग
Updated Mon, 19 Feb 2018 12:29 AM IST
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सहारनपुर। गेहूं की फसल पर जिले में कहीं कहीं येलो रस्ट रोग का असर दिखाई देने लगा है। इसकी रोकथाम के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को उपाए बताए हैं। वैज्ञानिकों ने बताया कि इस रोग के विषाणु हवा के माध्यम से तेजी से फैलते हैं।
पेस्ट सर्विलांस टीम के सदस्यों ने रविवार को जनपद के करीब एक दर्जन गांवों में गेहूं की फसल का निरीक्षण किया। गांव अल्हेड़ी में गेहूं की फसल पर येलो रस्ट का असर दिखाई दिया। यह रोग जनवरी से फरवरी माह में आता है। इससे प्रभावित फसल में उत्पादन नहीं के बराबर होता है। गेहूं की पत्तियों पर पीले रंग के फफोले जैसा पाउडर बनता है। पहली अवस्था में यह रोग एक खेत में यह केवल 10-15 पौधों के एक दायरे में शुरू होता है, जो बाद में पूरे खेत में फैल जाता है। कृषि वैज्ञानिकों ने इस रोग की रोकथाम के उपाए बताए।
उन्होंने बताया कि पांच लीटर मट्ठे को मिट्टी के एक घड़े में भरकर एक सप्ताह तक रखे। जैसे ही इस रोग के प्राथमिक लक्षण दिखाई दे तो एक लीटर मट्ठे को 40 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव कर दें। इसके अलावा समान मात्रा में गो मूत्र एवं नीम का तेल को मिलाकर एक मिश्रण तैयार कर लें। इसमें से 500 मिलीलीटर मात्रा को 15-20 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करना फायदेमंद रहता है। इसके अलावा रोग का लक्षण दिखाई देने पर 200 एमएल प्रोपीकोनाजॉल 25ईसी या, पाइराक्लोस्ट्राविन 133 ग्राम एवं इपोक्सीकोनाजॉल 50 ग्राम के हिसाब से 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव कर सकते हैं। इस दौरान केवीके के प्रोफेसर डॉ. आईके कुशवाहा, डॉ. डीके सिंह, अरुण कुमार, डॉ. एम जयराम आदि रहे।
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पेस्ट सर्विलांस टीम के सदस्यों ने रविवार को जनपद के करीब एक दर्जन गांवों में गेहूं की फसल का निरीक्षण किया। गांव अल्हेड़ी में गेहूं की फसल पर येलो रस्ट का असर दिखाई दिया। यह रोग जनवरी से फरवरी माह में आता है। इससे प्रभावित फसल में उत्पादन नहीं के बराबर होता है। गेहूं की पत्तियों पर पीले रंग के फफोले जैसा पाउडर बनता है। पहली अवस्था में यह रोग एक खेत में यह केवल 10-15 पौधों के एक दायरे में शुरू होता है, जो बाद में पूरे खेत में फैल जाता है। कृषि वैज्ञानिकों ने इस रोग की रोकथाम के उपाए बताए।
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उन्होंने बताया कि पांच लीटर मट्ठे को मिट्टी के एक घड़े में भरकर एक सप्ताह तक रखे। जैसे ही इस रोग के प्राथमिक लक्षण दिखाई दे तो एक लीटर मट्ठे को 40 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव कर दें। इसके अलावा समान मात्रा में गो मूत्र एवं नीम का तेल को मिलाकर एक मिश्रण तैयार कर लें। इसमें से 500 मिलीलीटर मात्रा को 15-20 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करना फायदेमंद रहता है। इसके अलावा रोग का लक्षण दिखाई देने पर 200 एमएल प्रोपीकोनाजॉल 25ईसी या, पाइराक्लोस्ट्राविन 133 ग्राम एवं इपोक्सीकोनाजॉल 50 ग्राम के हिसाब से 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव कर सकते हैं। इस दौरान केवीके के प्रोफेसर डॉ. आईके कुशवाहा, डॉ. डीके सिंह, अरुण कुमार, डॉ. एम जयराम आदि रहे।
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