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सहारनपुर के 10 पेड़ विरासत वृक्ष घोषित
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सहारनपुर। विरासत वृक्ष योजना के तहत शासन ने सहारनपुर के 10 पेड़ों को विरासत वृक्ष घोषित किया है। ये सभी शहर के बीच स्थित कंपनी बाग (नेताजी सुभाष चंद्र बोस उद्यान) में मौजूद हैं। इनका अपना इतिहास है। अधिकतर पेड़ ब्रिटिश काल के हैं। इनमें 150 साल पुराना पिलखन और 135 साल पुराना महोगनी का विशाल वृक्ष शामिल है।
सरकार ने कुछ समय पूर्व ही विरासत वृक्ष योजना के तहत सभी जनपदों से ऐसे पेड़ों की सूची मांगी थी, जो 100 साल से ज्यादा उम्र के हैं। वन विभाग की तरफ से कंपनी बाग (नेताजी सुभाष चंद्र उद्यान) में खड़े 10 पेड़ों का प्रस्ताव शासन को भेजा था। इन सभी को विरासत वृक्ष घोषित कर दिया है।
जिले में ये हैं विरासत वृक्ष
पिलखन: यह पेड़ 150 वर्ष पुराना है। पिलखन का पेड़ चिड़ियों के लिए सबसे अच्छा आशियाना होता है। इसकी कलियां सब्जी के रूप में काम आती हैं।
बरगद: कंपनी बाग में इस पेड़ को 145 साल पूर्व ब्रिटिश काल में लगाया गया था। बरगद के पेड़ को अक्षय वट भी कहा जाता है।
महोगनी: महोगनी मूलरूप से अमेरिका के जंगल में पाया जाता है। इसकी लकड़ी अत्यधिक मजबूत और भूकंपरोधी होती है। करीब 135 साल पहले सहारनपुर में यह पेड़ लगाया था।
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इमली: करीब 115 वर्ष पूर्व इस पेड़ को लगाया गया था। इमली का इस्तेमाल मसाले के रूप में किया जाता है। साथ ही यह पेड़ शीतलता प्रदान करता है।
पीपल: करीब 110 वर्ष पूर्व इस पेड़ को कंपनी बाग में लगाया था। धार्मिक मान्यता के अतिरिक्त पर्यावरण की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है। यह 24 घंटे ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है।
शाल: यह पेड़ करीब 110 वर्ष पूर्व कंपनी बाग में लगाया गया था। पूर्व में शाल की लकड़ी का इस्तेमाल रेलवे लाइन के स्लीपर बनाने में किया जाता था। इसकी लकड़ी बहुत ही कठोर, भारी, मजबूत तथा भूरे रंग की होती है।
नीम: यह पेड़ करीब 100 वर्ष पूर्व कंपनी बाग में लगाया गया था। नीम के पेड़ को वैद्य के नाम से भी जाना जाता है। यह पेड़ रक्तशोधन व शीतलता प्रदान करता है।
अर्जुन: यह पेड़ भी लगभग 100 वर्ष पूर्व लगाया गया था। इसकी छाल को उबालकर पीने से हृदय रोग और मोटापे से राहत मिलती है। हाई ब्लडप्रेशर और कोलेस्ट्रोल को भी कम करती है।
जामुन: यह पेड़ भी करीब 100 वर्ष पूर्व कंपनी बाग में लगाया था। पूर्व में घरों के बाहरी दरवाजे जामुन की लकड़ी के बनाए जाते थे।
महुआ: यह पेड़ लगभग 100 वर्ष पूर्व लगाया था। महुआ भारतीय उष्णकटिबंधीय वृक्ष है जो उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में होता है।
कंपनी बाग का इतिहास
कंपनी बाग की स्थापना 17वीं शताब्दी में हुई। इसको नवाब नजीबुद्दौला के जागीरदार इंतिजामुद्दौला ने 1750 ईसवीं में नया रूप दिया और इसका नाम फरहत बख्श रखा। इसका मतलब है आनंद देने वाला। फिर 1789 से 1803 तक मराठों ने सहारनपुर पर शासन किया। उन्होंने यहां बागेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की। यहां पूजा के लिए बेल पत्थर के पौधे लगाए। फिर ब्रिटिश काल में इसका नाम कंपनी बाग हुआ। 1806 में हार्टलैस तथा 1819 में स्कॉटिस सर्जन गोवर कंपनी बाग के निदेशक बने। जोहर फोर्ब्स रॉयली 1823 से 1837 तक निदेशक रहे। उनकी देखरेख में उद्यान के विषय पर आधारित चार पुस्तकें भी लिखी गईं।
वर्जन
कंपनी बाग के 10 वृक्षों को शासन ने विरासत वृक्ष घोषित किया है। इनको संरक्षित करने के साथ लोगों को इनके प्रति जागरूक किया जाएगा। ये सहारनपुर की विरासत हैं।-रणविजय सिंह, डीएफओ
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सरकार ने कुछ समय पूर्व ही विरासत वृक्ष योजना के तहत सभी जनपदों से ऐसे पेड़ों की सूची मांगी थी, जो 100 साल से ज्यादा उम्र के हैं। वन विभाग की तरफ से कंपनी बाग (नेताजी सुभाष चंद्र उद्यान) में खड़े 10 पेड़ों का प्रस्ताव शासन को भेजा था। इन सभी को विरासत वृक्ष घोषित कर दिया है।
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जिले में ये हैं विरासत वृक्ष
पिलखन: यह पेड़ 150 वर्ष पुराना है। पिलखन का पेड़ चिड़ियों के लिए सबसे अच्छा आशियाना होता है। इसकी कलियां सब्जी के रूप में काम आती हैं।
बरगद: कंपनी बाग में इस पेड़ को 145 साल पूर्व ब्रिटिश काल में लगाया गया था। बरगद के पेड़ को अक्षय वट भी कहा जाता है।
महोगनी: महोगनी मूलरूप से अमेरिका के जंगल में पाया जाता है। इसकी लकड़ी अत्यधिक मजबूत और भूकंपरोधी होती है। करीब 135 साल पहले सहारनपुर में यह पेड़ लगाया था।
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इमली: करीब 115 वर्ष पूर्व इस पेड़ को लगाया गया था। इमली का इस्तेमाल मसाले के रूप में किया जाता है। साथ ही यह पेड़ शीतलता प्रदान करता है।
पीपल: करीब 110 वर्ष पूर्व इस पेड़ को कंपनी बाग में लगाया था। धार्मिक मान्यता के अतिरिक्त पर्यावरण की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है। यह 24 घंटे ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है।
शाल: यह पेड़ करीब 110 वर्ष पूर्व कंपनी बाग में लगाया गया था। पूर्व में शाल की लकड़ी का इस्तेमाल रेलवे लाइन के स्लीपर बनाने में किया जाता था। इसकी लकड़ी बहुत ही कठोर, भारी, मजबूत तथा भूरे रंग की होती है।
नीम: यह पेड़ करीब 100 वर्ष पूर्व कंपनी बाग में लगाया गया था। नीम के पेड़ को वैद्य के नाम से भी जाना जाता है। यह पेड़ रक्तशोधन व शीतलता प्रदान करता है।
अर्जुन: यह पेड़ भी लगभग 100 वर्ष पूर्व लगाया गया था। इसकी छाल को उबालकर पीने से हृदय रोग और मोटापे से राहत मिलती है। हाई ब्लडप्रेशर और कोलेस्ट्रोल को भी कम करती है।
जामुन: यह पेड़ भी करीब 100 वर्ष पूर्व कंपनी बाग में लगाया था। पूर्व में घरों के बाहरी दरवाजे जामुन की लकड़ी के बनाए जाते थे।
महुआ: यह पेड़ लगभग 100 वर्ष पूर्व लगाया था। महुआ भारतीय उष्णकटिबंधीय वृक्ष है जो उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में होता है।
कंपनी बाग का इतिहास
कंपनी बाग की स्थापना 17वीं शताब्दी में हुई। इसको नवाब नजीबुद्दौला के जागीरदार इंतिजामुद्दौला ने 1750 ईसवीं में नया रूप दिया और इसका नाम फरहत बख्श रखा। इसका मतलब है आनंद देने वाला। फिर 1789 से 1803 तक मराठों ने सहारनपुर पर शासन किया। उन्होंने यहां बागेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की। यहां पूजा के लिए बेल पत्थर के पौधे लगाए। फिर ब्रिटिश काल में इसका नाम कंपनी बाग हुआ। 1806 में हार्टलैस तथा 1819 में स्कॉटिस सर्जन गोवर कंपनी बाग के निदेशक बने। जोहर फोर्ब्स रॉयली 1823 से 1837 तक निदेशक रहे। उनकी देखरेख में उद्यान के विषय पर आधारित चार पुस्तकें भी लिखी गईं।
वर्जन
कंपनी बाग के 10 वृक्षों को शासन ने विरासत वृक्ष घोषित किया है। इनको संरक्षित करने के साथ लोगों को इनके प्रति जागरूक किया जाएगा। ये सहारनपुर की विरासत हैं।-रणविजय सिंह, डीएफओ