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पेयजल संकट से जूझ रही ढाई लाख आबादी
अमर उजाला ब्यूरो/ रायबरेली
Updated Sat, 23 Apr 2016 11:45 PM IST
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जल संकट
- फोटो : अमर उजाला
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गर्मी की बढ़ती तपिश में अब लोगों का गला सूखने लगा है। ग्रामीण अंचल तक पानी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। हालत यह है कि पेयजल आपूर्ति के लिए जिले में जल निगम की ओर से लगाई गई 80 पेयजल परियोजनाएं में 57 परियोजनाएं अपनी आयु पूरी कर चुकी है।
इस साल महज पांच टंकियों का पुनर्गठन किया गया है। जबकि 52 अभी ठोक पीटकर चलाई जा रही हैं। गांवों में बिछाई गई पाइप लाइनें जर्जर होने के कारण घरों तक भरपूर पानी नहीं पहुंच पा रहा है। इसके चलते ढाई लाख आबादी को पानी के लिए भटकना पड़ रहा है।
जिले में 82 पानी की टंकियां लगी हैं। इनमें कहीं बोर खराब है तो कहीं पर पाइप लाइनें ध्वस्त हैं। शासन से हर साल करोड़ों रुपया मेंटीनेंस के लिए भेजा जाता हैं, लेकिन विभागीय अधिकारियों की खाऊ-कमाऊ नीति के चलते इनकी मरम्मत नहीं कराई जाती है।
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इसका खामियाजा ग्रामीणों को भुगतना पड़ता है। सबसे खराब हालत जिले के कटरी क्षेत्रों की है। एक टंकी से पांच हजार से ज्यादा लोगों को पानी की आपूर्ति होती है। लगातार जलस्तर के नीचे जाने से पानी की किल्लत बढ़ती जा रही है। डलमऊ, लालगंज, खीरों, सतांव, सरेनी में पानी का स्तर काफी नीचे चला गया है।
इसके चलते ग्रामीणों के घरों में लगे साधारण नल काफी पहले ही खराब हो गए हैं। डलमऊ के समरजीत का कहना है कि पेयजल की समस्या गर्मी में बढ़ जाती है। कई बार पाइप लाइन में लीकेज हो जाता हैं। शिकायत के बाद भी बनने में कई दिन लग जाते है।
राही की कृष्णा देवी, सतांव की गिरिजा देवी का कहना है कि कनेक्शन तो है, लेकिन पानी आने की गारंटी नहीं होती है। परशदेपुर के उमेश कुमार, उदित नारायण ने बताया कि पानी की समस्या से सबसे ज्यादा मवेशियों को जूझना पड़ रहा है।
जलनिगम के एक्सईएन जर्नादन सिंह का कहना है कि जिले में पेयजल की समस्या दूर करने के लिए हरसंभव प्रयास किया जा रहा है। 57 टंकियां अपनी आयु पूरी कर चुकी है। 26 टंकियों का पुनर्गठन होना है। पांच टंकियों के पुनर्गठन के लिए बजट मिला है। जिन्हें पूरा करा दिया गया है।
अभी भी 52 टंकियां पूरी क्षमता से नहीं चल पा रही है। आंशिक रूप से जलापूर्ति हो रही है। इन्हें पूरी क्षमता से चलाने के लिए एक अरब रुपये की जरूरत है। बजट मिलने पर टंकियों का पुनर्गठन किया जाएगा।
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इस साल महज पांच टंकियों का पुनर्गठन किया गया है। जबकि 52 अभी ठोक पीटकर चलाई जा रही हैं। गांवों में बिछाई गई पाइप लाइनें जर्जर होने के कारण घरों तक भरपूर पानी नहीं पहुंच पा रहा है। इसके चलते ढाई लाख आबादी को पानी के लिए भटकना पड़ रहा है।
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जिले में 82 पानी की टंकियां लगी हैं। इनमें कहीं बोर खराब है तो कहीं पर पाइप लाइनें ध्वस्त हैं। शासन से हर साल करोड़ों रुपया मेंटीनेंस के लिए भेजा जाता हैं, लेकिन विभागीय अधिकारियों की खाऊ-कमाऊ नीति के चलते इनकी मरम्मत नहीं कराई जाती है।
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इसका खामियाजा ग्रामीणों को भुगतना पड़ता है। सबसे खराब हालत जिले के कटरी क्षेत्रों की है। एक टंकी से पांच हजार से ज्यादा लोगों को पानी की आपूर्ति होती है। लगातार जलस्तर के नीचे जाने से पानी की किल्लत बढ़ती जा रही है। डलमऊ, लालगंज, खीरों, सतांव, सरेनी में पानी का स्तर काफी नीचे चला गया है।
इसके चलते ग्रामीणों के घरों में लगे साधारण नल काफी पहले ही खराब हो गए हैं। डलमऊ के समरजीत का कहना है कि पेयजल की समस्या गर्मी में बढ़ जाती है। कई बार पाइप लाइन में लीकेज हो जाता हैं। शिकायत के बाद भी बनने में कई दिन लग जाते है।
राही की कृष्णा देवी, सतांव की गिरिजा देवी का कहना है कि कनेक्शन तो है, लेकिन पानी आने की गारंटी नहीं होती है। परशदेपुर के उमेश कुमार, उदित नारायण ने बताया कि पानी की समस्या से सबसे ज्यादा मवेशियों को जूझना पड़ रहा है।
जलनिगम के एक्सईएन जर्नादन सिंह का कहना है कि जिले में पेयजल की समस्या दूर करने के लिए हरसंभव प्रयास किया जा रहा है। 57 टंकियां अपनी आयु पूरी कर चुकी है। 26 टंकियों का पुनर्गठन होना है। पांच टंकियों के पुनर्गठन के लिए बजट मिला है। जिन्हें पूरा करा दिया गया है।
अभी भी 52 टंकियां पूरी क्षमता से नहीं चल पा रही है। आंशिक रूप से जलापूर्ति हो रही है। इन्हें पूरी क्षमता से चलाने के लिए एक अरब रुपये की जरूरत है। बजट मिलने पर टंकियों का पुनर्गठन किया जाएगा।