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समाज के लिए मिसाल बनीं ‘बहनजी’

Sat, 24 Jan 2015 01:12 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला प्रतापगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला प्रतापगढ़ Updated Sat, 24 Jan 2015 01:12 AM IST
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Precedent for society became ' sister '
प्रतापगढ़। पति का साथ छूटने के बाद भी अमृतबाला मौर्या आज समाज के लिए मिसाल बन गई हैं। दिक्कतों के दौर से गुजरने के बाद भी तीन मासूम बच्चों का भविष्य संवारने के लिए उन्होंने पहले स्वयं पढ़ाई की। फिर प्राइवेट स्कूल में नौकरी की। खर्च चलाने के लिए सिलाई कढ़ाई का काम किया। मुश्किलों के तमाम दौर देखने वाली अमृतबाला आज अपने बच्चों को बेहतर परवरिश दे रही हैं। अब अमृतबाला की एक ही तमन्ना है कि बच्चे पढ़ाई कर नौकरी करने लगें।
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शहर के अजीतनगर मौर्या टोला निवासी अमृतबाला मौर्या का जीवन दु:खों से भरा है। मूलत: पट्टी इलाके के कोपा गांव निवासी अमृतबाला की शादी 1992 में अजीतनगर निवासी बंशीलाल के साथ हुई थी। मगर शादी के कुछ साल बाद ही बंशीलाल का निधन हो गया। पति के निधन से अमृतबाला टूट गईं। सारे सपने बिखर गए। उनके सामने एक तरफ पहाड़ सी जिंदगी थी तो दूसरी तरफ तीन नन्हें बच्चों का भविष्य। मायका पक्ष मजबूत न होने के कारण परिवार के सदस्य दूसरी शादी का दबाव बनाने लगे। अचानक अमृतबाला को लगा कि यह तो तीनों बच्चों के साथ अन्याय होगा।
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परिजनों से दो टूक कहा कि वह आधी रोटी खाकर गुजर कर लेंगी लेकिन दूसरी शादी कर अपने तीन मासूम बच्चों का जीवन बर्बाद नहीं होने देंगी। साथ ही यह भी कहा कि किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है। उनके बच्चे किसी पर बोझ नहीं बनेंगे,  वह खुद उनका भविष्य संवारेंगी। इस दृढ़ संकल्प के साथ इंटरमीडिएट पास अमृतबाला ने आगे की पढ़ाई कर स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने अजीतनगर स्थित अमर पब्लिक स्कूल में शिक्षिका की नौकरी शुरू की। जाहिर है निजी स्कूल से मिलने वाले वेतन से घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई पूरी होनी मुश्किल थी। फिर भी अमृतबाला संकल्प से डिगी नहीं।
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उन्होंने खाली समय में सिलाई-कढ़ाई का काम शुरू कर दिया। उनके संघर्षों का ही परिणाम है कि वर्तमान में उनकी बड़ी बेटी कृति बीएससी, बेटा सुधांशु कक्षा ग्यारह और छोटी बेटी प्रतिभा कक्षा दस की छात्रा है। महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनीं अमृतबाला ने अपने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे। मगर वह कभी संकल्प से विचलित नहीं हुईं। एक समय था जब घर की चौखट से बाहर कदम रखने पर लोग तरह-तरह की बातें करते थे।


मगर लोगों की परवाह किए बगैर अमृतबाला ने आज वह मंजिल हासिल कर ली, जिससे समाज के लोग आदर से उनका नाम लेते हैं। मोहल्ले में ‘बहनजी’ के नाम से प्रसिद्ध अमृतबाला की ख्याति समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों के बीच सबला नारी के रूप में बनी है। अपने संघर्ष से उन्होंने साबित कर दिया कि ‘बेटी ही बचाएगी और बेटी ही पढ़ाएगी।’
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