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बिना लैब हो रही भूगोल की पढ़ाई
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
Updated Thu, 11 Feb 2016 11:09 PM IST
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जिले के अधिकांश महाविद्यालयों में भूगोल की कक्षाएं चल रही हैं, लेकिन वहां लैब की व्यवस्था नहीं है। जबकि इस विषय से स्नातक व परास्नातक करने वाले छात्र-छात्राओं को प्रेक्टिकल परीक्षाएं देनी होती हैं। लेकिन लैब ही नहीं होने के कारण कॉजल छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है।
शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक चलने वाले दर्जन भर से ज्यादा कॉलेजाें में भूगोल विषय पढ़ाया जाता है। लेकिन कुछ ही कॉलेजों में लैब की व्यवस्था है। जबकि अन्य कॉलेजों में पढ़ाई तो हो रही लेकिन लैब है ही नहीं। ऐसे में शिक्षक केवल छात्र-छात्राओं को सैद्धांतिक पाठ ही पढ़ा रहे हैं। जबकि उन्हें व्यवाहारिक ज्ञान की जानकारी नहीं मिल पा रही है। स्नातक व परास्नातक कक्षाओं में भूगोल विषय से अध्ययन करने वाले छात्र-छात्राओं को प्रयोगात्मक परीक्षाएं देनी होती हैं।
प्रयोगशाला न होने की वजह से उनकी प्रयोगात्मक विषयों की पढ़ाई नहीं हो पा रही है। ऐसे में हर वर्ष होने वाली प्रयोगात्मक परीक्षा का सिर्फ कोरम पूरा कर दिया जाता है। वहीं प्रयोगात्मक परीक्षा लेने के लिए दूसरे महाविद्यालयों से आने वाले शिक्षक भी इसे नजरअंदाज कर देते हैं। वह मौखिक तौर पर ही प्रश्न पूछ कर प्रयोगात्मक परीक्षा संपन्न करा देते हैं। ऐसे में पास होने वाले छात्र-छात्राओं को भौगोलिक उपकरण का नाम तक नहीं मालूम होता है। व्यावहारिक ज्ञान न होने के कारण छात्र-छात्राएं इस विषय से अपना कैरियर नहीं बना पा रहे हैं। एमडीपीजी कॉलेज के भूगोल विभाग के अध्यक्ष डॉ. विनोद शुक्ल ने बताया कि जिन महाविद्यालयों में भूगोल विषय की पढ़ाई होती है वहां प्रयोगशाला होना अनिवार्य होता है।
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जिसमें ट्रेसिंग टेबल, फोटो स्टेट मशीन, मौसम संबंधी उपकरण व सर्वेक्षण के उपकरण होने चाहिए। साथ ही लैब में मैप, ग्लोब भी होना चाहिए। प्रयोगशाला न होने से छात्र-छात्राओं को विषय से संबंधित प्रयोगात्मक ज्ञान की जानकारी नहीं हो पाती। जिससे विषय से संबंधित उनका ज्ञान अधूरा रहता है। उन्होंने कहा कि बीए प्रथम व दूसरे वर्ष में 50 अंकों की प्रयोगात्मक परीक्षा होती है। जबकि स्नातक के तीसरे वर्ष 75 अंक की प्रयोगात्मक परीक्षा होती है, जो कि पूरी तरह से सर्वेक्षण पर आधारित होती है। प्रयोगशाला न होने से छात्र-छात्राओं द्वारा सर्वेक्षण कार्य असंभव है। छात्र-छात्राओं का आरोप है कि महाविद्यालय प्रशासन हर वर्ष प्रयोगात्मक शुल्क वसूल करता है, लेकिन प्रयोगशाला की व्यवस्था नहीं की जाती है।
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शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक चलने वाले दर्जन भर से ज्यादा कॉलेजाें में भूगोल विषय पढ़ाया जाता है। लेकिन कुछ ही कॉलेजों में लैब की व्यवस्था है। जबकि अन्य कॉलेजों में पढ़ाई तो हो रही लेकिन लैब है ही नहीं। ऐसे में शिक्षक केवल छात्र-छात्राओं को सैद्धांतिक पाठ ही पढ़ा रहे हैं। जबकि उन्हें व्यवाहारिक ज्ञान की जानकारी नहीं मिल पा रही है। स्नातक व परास्नातक कक्षाओं में भूगोल विषय से अध्ययन करने वाले छात्र-छात्राओं को प्रयोगात्मक परीक्षाएं देनी होती हैं।
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प्रयोगशाला न होने की वजह से उनकी प्रयोगात्मक विषयों की पढ़ाई नहीं हो पा रही है। ऐसे में हर वर्ष होने वाली प्रयोगात्मक परीक्षा का सिर्फ कोरम पूरा कर दिया जाता है। वहीं प्रयोगात्मक परीक्षा लेने के लिए दूसरे महाविद्यालयों से आने वाले शिक्षक भी इसे नजरअंदाज कर देते हैं। वह मौखिक तौर पर ही प्रश्न पूछ कर प्रयोगात्मक परीक्षा संपन्न करा देते हैं। ऐसे में पास होने वाले छात्र-छात्राओं को भौगोलिक उपकरण का नाम तक नहीं मालूम होता है। व्यावहारिक ज्ञान न होने के कारण छात्र-छात्राएं इस विषय से अपना कैरियर नहीं बना पा रहे हैं। एमडीपीजी कॉलेज के भूगोल विभाग के अध्यक्ष डॉ. विनोद शुक्ल ने बताया कि जिन महाविद्यालयों में भूगोल विषय की पढ़ाई होती है वहां प्रयोगशाला होना अनिवार्य होता है।
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जिसमें ट्रेसिंग टेबल, फोटो स्टेट मशीन, मौसम संबंधी उपकरण व सर्वेक्षण के उपकरण होने चाहिए। साथ ही लैब में मैप, ग्लोब भी होना चाहिए। प्रयोगशाला न होने से छात्र-छात्राओं को विषय से संबंधित प्रयोगात्मक ज्ञान की जानकारी नहीं हो पाती। जिससे विषय से संबंधित उनका ज्ञान अधूरा रहता है। उन्होंने कहा कि बीए प्रथम व दूसरे वर्ष में 50 अंकों की प्रयोगात्मक परीक्षा होती है। जबकि स्नातक के तीसरे वर्ष 75 अंक की प्रयोगात्मक परीक्षा होती है, जो कि पूरी तरह से सर्वेक्षण पर आधारित होती है। प्रयोगशाला न होने से छात्र-छात्राओं द्वारा सर्वेक्षण कार्य असंभव है। छात्र-छात्राओं का आरोप है कि महाविद्यालय प्रशासन हर वर्ष प्रयोगात्मक शुल्क वसूल करता है, लेकिन प्रयोगशाला की व्यवस्था नहीं की जाती है।