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प्रतापगढ़: ढह गया बौद्ध स्तूप, मिट गई बौद्ध मठ की संरचना 

Sat, 18 May 2019 12:33 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़ Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 18 May 2019 12:33 AM IST
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Pratapgarh: Collapsed Buddhist stupa, structure of Buddhist monastery destroyed
बिहार ब्लाक के रामदास पट्टी गांव स्थित बौद्ध स्थली से खन्न माफियाओं द्वारा खोदी गई मिट्टी - फोटो : pratapgarh
 कुंडा इलाके के बिहार ब्लाक के रामदास पट्टी गांव में स्थित बौद्ध काल से जुड़ी ऐतिहासिक विरासत मिटने के कगार पर है। यहां अब एक वर्षावास के दौरान भगवान गौतम बुद्ध द्वारा बनाए गए न तो बौद्ध काल के मठ रह गए हैं और न ही विहार। यहां तक की धर्मावलंबी सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए स्तूप व टीले का भी अस्तित्व मिट चुका है।
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मोटी कमाई के चक्कर में खनन माफियाओं ने जेसीबी चलाकर ऐतिहासिक स्थल की मिट्टी से जमकर कमाई की। लोगों ने इसे लेकर कई बार प्रशासन व जनप्रतिनिधियों से शिकायत की, मगर इसके अस्तित्व को लेकर कोई भी संजीदा नहीं दिखा। ऐसे मेें रामदास पट्टी गांव में बौद्धकाल की विरासत के नाम पर कुछ भी शेष नहीं रह गया है। इसकी पहचान महज इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह गई है। 
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दया, करुणा व परोपकार के प्रतीक भगवान गौतम बुद्ध करीब 2600 वर्ष पहले बेल्हा आए थे। जिले के बिहार ब्लाक के रामदास पट्टी गांव में मठ और बिहार बनाकर भगवान गौतम बुद्ध ने एक वर्षावास व्यतीत कर धर्मोपदेश दिया था। बौद्ध धर्मावलंबी सम्राट अशोक ने यहां आकर भगवान बुद्ध की पूर्ण स्मृति में विशाल स्तूप बनवाया था। इसका जिक्र इतिहास के पन्नों में भी मिलता है।
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सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री व्हेनसांग भ्रमण करते हुए यहां आया था। सन 1857 में उसी के रूट को फालो करते हुए भारत का पहला सर्वेयर जनरल एलेक्जेंडर कनिंघम भी रामदास पट्टी गांव आया था। पूर्व क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी एवं एमडीपीजी कालेज के प्राचीन इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष डा. पीयूषकांत शर्मा बताते हैं कि एलेक्जेंडर कनिंघम ने इन सभी ऐतिहासिक तत्थों का जिक्र अपनी पुस्तक एनुअल रिपोर्ट ऑफ आर्केलाजिकल में किया है।

विडंबना यह है कि रामदास पट्टी गांव में स्थित बौद्ध काल की विरासत का अस्तित्व प्रशासन की अनदेखी के चलते मिटने के कगार पर है। कभी गांव में ऊंचे दिखने वाले टीले, स्तूप व मठ सहित बौद्धकाल की पहचान को खनन माफियाओं ने मिट्टी की कालाबाजारी कर मोटी कमाई के चक्कर में जेसीबी से ढहा दिया। बौद्ध विरासत पर दिन रात जेसीबी गजरती रही। 10-15 फिट मिट्टी का खनन कर टीले को समतल कर दिया गया। मठ की संरचना व विशालकाय स्तूप ढहकर नष्ट हो गए। 

कुषाणकाल मेें भी बनवाए गए विहार
पूर्व क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी एवं विभागाध्यक्ष एमडीपीजी डा. पीयूषकांत शर्मा बताते हैं कि यहां कुषाणकाल में भी शासकों का आना हुआ। उनके द्वारा भी यहां विहार बनवाए गए है। उन्होंने बताया कि खुदाई के दौरान जो भी मृदभांड व सिक्के मिले थे, वह इसकी पुष्टि करते हैं। 

8 साल से विरासत संरक्षित करने का प्रयास, नहीं मिली सफलता 
करीब आठ साल पहले पूर्व क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी एवं एमडीपीजी के इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष डा. पीयूषकांत शर्मा ने अपनी टीम के साथ रामदास पट्टी गांव का सर्वे किया था। यहां बड़ी मात्रा पुरातात्विक अवशेष मिले थे। इसका पुर्नअन्वेषण भी किया गया। इसके बाद इसे संजोने के लिए जिला प्रशासन व जनप्रतिनिधियों को ध्यान आकृष्ट कराया जाता रहा, मगर नतीजा सिफर रहा। 


पर्यटन के रूप में किया जा सकता था विकसित 
बिहार, चीन व जपान से भारी संख्या में धर्मावलंबियों का कौशांबी आना होता है। यदि रामदास पट्टी की बौद्ध विरासत को संजोया व संरक्षित किया जाता तो इसे भी पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जा सकता था।
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