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अब ‘मनई’ को नहीं रास आती सनई
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
Updated Sun, 03 Jul 2016 12:11 AM IST
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mudda belha ki virasat ka
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एक समय था जब गांव के मनई (लोग) को दो वक्त की रोटी का मुख्य आधार सनई हुआ करती थी। कम लोग ही जानते होंगे इस जिले में सबसे ज्यादा सनई का उत्पादन होता था। न सिर्फ जिले के लोगों के लिए बल्कि बाहर के लोगों के लिए भी यह जीविका का प्रमुख आधार थी। कभी विदेशी राजघराने के शाही शूट भी सनई के रेशे से ही तैयार किए जाते थे। कोलकाता बंदरगाह से पानी के जहाज से अमेरिका और इंग्लैण्ड पहुंचने वाली सनई के रेशे को टेक्सटाइल्स मिलों में फिल्टर कर चमकीला सूती कपड़ा, रस्सा, बांध, सुतली, चटाई आदि बनाई जाती थी। सरकारी उदासीनता और किसानों को प्रोत्साहन न मिलने का नतीजा यह हुआ कि अब इसका अस्तित्व खत्म हो गया है। चिलबिला की महुली मंडी में सनई के रेशे का गट्ठर तैयार करने वाली मार्केट अब बेजान और वीरान पड़ी है।
जिले के अंतू, जगेशरगंज, कोहंडौर, रखहा, पट्टी, लालगंज, रानीगंज इलाकों में बहुतायत मात्रा में उगाई जाती थी। बरसात के दिनों में उगाई जाने वाले नकदी फसल को आम किसान जहां हरी खाद के रूप में प्रयोग करते थे, वहीं मध्यम और निम्न वर्गीय परिवार की जीविका का यह प्रमुख आधार होती थी। चिलबिला की पुरानी मंडी में पंजाब से आकर बसने वाले ओमप्रकाश आनन्द और विश्वामित्र आनन्द जिले के मुख्य आढ़ातियों में से एक थे। सनई के रेशे से सुतली और टाटपट्टी भी बनती थी।
जानकार बताते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध में सनई के रेशे की डिमांड अधिक होने पर चिलबिला से एक स्पेशल ट्रेन चलाई गई थी। जिससे रेशे के गट्ठर कोलकाता बंदरगाह पहुंचाए जाते थे। इससे पानी के जहाज को नियंत्रित करने के लिए रस्सा बनाया जाता था और जहाज के अंदर छिद्र (छेद) होने पर रेशे को लगाया जाता था। पानी में रहने वाले जहाज में यह रेशे लंबे समय तक पानी को रोकने में मददगार साबित होते थे। विदेशों में सनई के रेशे से चमकीले सूती कपड़े तैयार किए जाते थे। यह कपड़ा काफी महंगा होने के कारण साधारण व्यक्तियों के लिए संभव नहीं होता था। शहर के चिलबिला बाजार में रेशे की पैकिंग होती थी। रेशे के आकार को छोटा करने के लिए बाजार में एक मशीन लगी हुई थी। जिसमें पेराई करके विशालकाय गट्ठर तैयार किया जाता था। वर्ष 1962 के बाद जिले में इसका उत्पादन धीरे-धीरे कम होता चला गया। प्लास्टिक का प्रचार-प्रसार अधिक होने के कारण मांग कम हो गई। इससे धीरे-धीरे सनई के उत्पादन पर ग्रहण लग गया।
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अधिक उत्पादन होेने के कारण स्थापित हुआ सनई अनुसंधान केंद्र
जिले में उत्पादन अधिक होेने के कारण यहां सनई अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई। दरअसल विदेशों में सनई के रेशे कोलकाता स्थित बंदरगाह से भेजे जाते थे। सनई अनुसंधान केंद्र भी कोलकाता में था। जिले में अधिक उत्पादन को देखते हुए भारत सरकार ने सनई अनुसंधान केंद्र की स्थापना की। सनई अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डा. मनोज त्रिपाठी ने बताया कि सनई के रेशे का प्रयोग ग्रामीण इलाकों में रस्सी बनाने, सुतली से चारपाई बिनने, जानवरों के लिए बगहा (जिसमें जानवर बांधे जाते हैं), खोंच बनाने में किया जाता है। जबकि देश में टेक्सटाइल मिलों, करेंसी, हैंडबैग, रस्सा, सूती कपडे़ बनाने के प्रयोग में लाया जाता था।
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जिले के अंतू, जगेशरगंज, कोहंडौर, रखहा, पट्टी, लालगंज, रानीगंज इलाकों में बहुतायत मात्रा में उगाई जाती थी। बरसात के दिनों में उगाई जाने वाले नकदी फसल को आम किसान जहां हरी खाद के रूप में प्रयोग करते थे, वहीं मध्यम और निम्न वर्गीय परिवार की जीविका का यह प्रमुख आधार होती थी। चिलबिला की पुरानी मंडी में पंजाब से आकर बसने वाले ओमप्रकाश आनन्द और विश्वामित्र आनन्द जिले के मुख्य आढ़ातियों में से एक थे। सनई के रेशे से सुतली और टाटपट्टी भी बनती थी।
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जानकार बताते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध में सनई के रेशे की डिमांड अधिक होने पर चिलबिला से एक स्पेशल ट्रेन चलाई गई थी। जिससे रेशे के गट्ठर कोलकाता बंदरगाह पहुंचाए जाते थे। इससे पानी के जहाज को नियंत्रित करने के लिए रस्सा बनाया जाता था और जहाज के अंदर छिद्र (छेद) होने पर रेशे को लगाया जाता था। पानी में रहने वाले जहाज में यह रेशे लंबे समय तक पानी को रोकने में मददगार साबित होते थे। विदेशों में सनई के रेशे से चमकीले सूती कपड़े तैयार किए जाते थे। यह कपड़ा काफी महंगा होने के कारण साधारण व्यक्तियों के लिए संभव नहीं होता था। शहर के चिलबिला बाजार में रेशे की पैकिंग होती थी। रेशे के आकार को छोटा करने के लिए बाजार में एक मशीन लगी हुई थी। जिसमें पेराई करके विशालकाय गट्ठर तैयार किया जाता था। वर्ष 1962 के बाद जिले में इसका उत्पादन धीरे-धीरे कम होता चला गया। प्लास्टिक का प्रचार-प्रसार अधिक होने के कारण मांग कम हो गई। इससे धीरे-धीरे सनई के उत्पादन पर ग्रहण लग गया।
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अधिक उत्पादन होेने के कारण स्थापित हुआ सनई अनुसंधान केंद्र
जिले में उत्पादन अधिक होेने के कारण यहां सनई अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई। दरअसल विदेशों में सनई के रेशे कोलकाता स्थित बंदरगाह से भेजे जाते थे। सनई अनुसंधान केंद्र भी कोलकाता में था। जिले में अधिक उत्पादन को देखते हुए भारत सरकार ने सनई अनुसंधान केंद्र की स्थापना की। सनई अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डा. मनोज त्रिपाठी ने बताया कि सनई के रेशे का प्रयोग ग्रामीण इलाकों में रस्सी बनाने, सुतली से चारपाई बिनने, जानवरों के लिए बगहा (जिसमें जानवर बांधे जाते हैं), खोंच बनाने में किया जाता है। जबकि देश में टेक्सटाइल मिलों, करेंसी, हैंडबैग, रस्सा, सूती कपडे़ बनाने के प्रयोग में लाया जाता था।