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किस्मत क्या रूठी, सबने फेर लिया मुंह
ब्यूरो/अमर उजाला प्रतापगढ़
Updated Sat, 18 Apr 2015 12:34 AM IST
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किस्मत ने दगा दी तो अन्नदाताओं से सबने मुंह फेर लिया। बारिश से तबाह हुए
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तमाम किसान ऐसे हैं, जिनके गांव में उनकी व्यथा पूछने अभी तक न अफसर पहुंचे
हैं और न ही जनप्रतिनिधि। ऐसे किसान सरकारी सर्वे को भी सिर्फ खानापूर्ति
मानते हैं। उनका कहना है कि जब कोई आया ही नहीं, कोई जानकारी ही नहीं ली
तो फिर किस बात का सर्वे और कैसा सर्वे। यह पीड़ा जिले की सभी पांचों
तहसीलों के ज्यादातर किसानों की है।
‘केसे बताई कि अबकी बार बाली मा गेहूं नहीं बा.., केहु पूछय तो आए नहीं, पिछली बार तो ओला से नाश भा रहा अबकी बरसात लै डूबी।’ यह दर्द है कुंडा क्षेत्र के किसानों का। किलहनापुर गांव निवासी सुमेरे सरोज के पास छह विस्वा ही खेत है। उसने चार बीघा खेत अधिया लेकर फसल बो रखी थी। हालत यह है कि उसके खेत में कुछ है ही नहीं। जो निकला वह मड़ाई देने के बराबर भी नहीं है। व्यापारी भी इस गेहूं को लेने को तैयार नहीं है। गड़रियाना निवासी ननके पाल के पास डेढ़ बीघा खेत है।
कुछ फसल मार्च में हुई बारिश से नष्ट हुई तो बाकी कटने के बाद अप्रैल में हुई बारिश ने खराब कर दी। गेहूं के दाने काले हैं। गुड्डू पांडेय ने दो बीघे खेत में गेहूं और सरसों की खेती की थी। बारिश ने सब नष्ट कर दिया। न तो कोई अधिकारी गांव पहुंचा और न ही अन्य किसी ने संपर्क किया। समसपुर गांव के पप्पू सिंह बड़े काश्तकार हैं। उनके पास आठ बीघा खेत है लेकिन लेखपाल उनसे यह भी नहीं पूछने आया कि उनकी फसल बची या खराब हो गई। बाबागंज के जगापुर गांव निवासी अरुण कुमार ने दो बीघे में गेहूं और सरसों बोई थी।
दो बार की बारिश ने सारा गेहूं नष्ट कर दिया। बैरागीपुर ऐंधा गांव निवासी संतोष कुमार ने अपने एक बीघे और पांच बीघे अधिया लेकर फसल बोई थी। सारी फसल नष्ट हो गई। इन सब का दर्द है कि इनके यहां कोई जांच करने नहीं गया। ऐंधा में जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी एक किसान की मौत के बाद पहुंचे थे लेकिन सिर्फ उसकी ही फसल की जांच हुई। हाल ये ही कि इलाके के समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों ने भी चुप्पी साध रखी है।
बेमौसम बारिश से तबाह हुई फसलाें का जायजा लेने गंाव में राजस्व कर्मचारी नहीं पहुंच रहे हैं। सरकार ने किसानों को सहायता के आश्वासन का ढिढोरा पीट रखा है लेकिन गांवों में कोई कार्रवाई नहीं है।
पूूरे शिवावैश्य के राजकुमार सिंह का कहना है कि अभी तक गांव में लेखपाल नुकसान की जांच करने नहीं आया। पूरेनरायन दास केे दिनेश मौर्य का कहना है कि उनका गांव चकबंदी में है। कौन जांच करने आया उन्हें नहीं मालूम। सिलौधी के कृपाशंकर का कहना है कि लागत का आधा भी इस बार फसल से मिलना मुश्किल है। भुड़हा के रामलखन का कहना है कि तबाही किससे बताई जाए कोई सुनने वाला नहीं है।
राजस्व कर्मचारी कहते हैं कि हम रिपोर्ट बना कर दे रहे हैं। तारापुर के पूर्व प्रधान विमलेश सिंह का कहना है कि जब जनप्रतिनिधि नहीं सोच रहा तो प्रशासन को क्या कहें। अठेहा के डॉ. काशीधर द्विवेदी का कहना है कि यह नुकसान पूरे साल तक किसानों को सताएगा। थरिया के रामकृपाल का कहना है कि उनकी सारी फसल बारिश की भेंट चढ़ गई। किससे कहें। कोई सुनने वाला नहीं है। रामनगरकोल के संगमलाल पांडे का कहना है कि अभी तक नुकसान की कोई
बारिश से कितना नुकसान हुआ जब कोई पूछे तब तो बताएं। न अधिकारी पूछने आ रहे हैं और न ही जनप्रतिनिधि। आखिर अपना दर्द किसे बताएं। सुनाई पड़ता है कि लिखा-पढ़ी हो रही है। मगर कहां हो रही है, कौन कर रहा है, कुछ नहीं पता। जब कोई गांव ही नहीं आया तो क्या जानूं। यह है पट्टी क्षेत्र के किसानों का दर्द। तहसील क्षेत्र के तमाम गांव ऐसे हैं जहां न तो लेखपाल पहुंचा और न ही कोई अन्य अधिकारी। वे अगर अपनी व्यथा लेकर खुद भी जाते हैं तो कोई सुनने वाला नहीं होता। जनप्रतिनिधि भी नहीं पहुंच रहे हैं। अखबारों से पता चलता है कि अधिकारी और नेता सब लगे हैं। सर्वे हो रहा है। मगर कहां हो रहा है कुछ पता नहीं है। पता नहीं मुआवजा मिलेगा भी या नहीं।
गौरा विकास क्षेत्र के कौलापुर गांव के किसान द्वारिका प्रसाद यादव की जुबान पर जैसे ही दर्द भरी दास्तां आई आंखें डबडबा गईं। वह कहते हैं कि प्रकृति ने तो किसानों पर कहर ढाया ही अब अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी वही कर रहे हैं। कोई दर्द पूछने नहीं पहुंच रहा है। लेखपाल घर में बैठकर रिपोर्ट लगा रहा है। सही मुआवजा मिलना मुश्किल दिख रहा है। वह खुद तहसील के चक्कर लका रहे हैं।
मगर कोई सुनने वाला नहीं है। भटपुरवा के रामभुवन मिश्र, सहजिवार के जगमोहन पांडेय का कहना है कि इस आपदा की घड़ी में कागज पर काम चल रहा है। पता नहीं राहत मिलेगी भी या नहीं। रूपीपुर के लालबिहारी उपाध्याय, पूरेबसहू के मम्मन तिवारी भी अधिकारियों के न पहुंचने से दुखी हैं। यह लोग कहते हैं अफसर तो कुछ गांवों में पहुंचे भी लेकिन जनप्रतिनिधि तो कहीं नहीं पहुंचे। फिर कहते हैं कि जब ईश्वर ही रूठ गए तो इन सब का क्या दोष है।
‘केसे बताई कि अबकी बार बाली मा गेहूं नहीं बा.., केहु पूछय तो आए नहीं, पिछली बार तो ओला से नाश भा रहा अबकी बरसात लै डूबी।’ यह दर्द है कुंडा क्षेत्र के किसानों का। किलहनापुर गांव निवासी सुमेरे सरोज के पास छह विस्वा ही खेत है। उसने चार बीघा खेत अधिया लेकर फसल बो रखी थी। हालत यह है कि उसके खेत में कुछ है ही नहीं। जो निकला वह मड़ाई देने के बराबर भी नहीं है। व्यापारी भी इस गेहूं को लेने को तैयार नहीं है। गड़रियाना निवासी ननके पाल के पास डेढ़ बीघा खेत है।
कुछ फसल मार्च में हुई बारिश से नष्ट हुई तो बाकी कटने के बाद अप्रैल में हुई बारिश ने खराब कर दी। गेहूं के दाने काले हैं। गुड्डू पांडेय ने दो बीघे खेत में गेहूं और सरसों की खेती की थी। बारिश ने सब नष्ट कर दिया। न तो कोई अधिकारी गांव पहुंचा और न ही अन्य किसी ने संपर्क किया। समसपुर गांव के पप्पू सिंह बड़े काश्तकार हैं। उनके पास आठ बीघा खेत है लेकिन लेखपाल उनसे यह भी नहीं पूछने आया कि उनकी फसल बची या खराब हो गई। बाबागंज के जगापुर गांव निवासी अरुण कुमार ने दो बीघे में गेहूं और सरसों बोई थी।
दो बार की बारिश ने सारा गेहूं नष्ट कर दिया। बैरागीपुर ऐंधा गांव निवासी संतोष कुमार ने अपने एक बीघे और पांच बीघे अधिया लेकर फसल बोई थी। सारी फसल नष्ट हो गई। इन सब का दर्द है कि इनके यहां कोई जांच करने नहीं गया। ऐंधा में जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी एक किसान की मौत के बाद पहुंचे थे लेकिन सिर्फ उसकी ही फसल की जांच हुई। हाल ये ही कि इलाके के समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों ने भी चुप्पी साध रखी है।
बेमौसम बारिश से तबाह हुई फसलाें का जायजा लेने गंाव में राजस्व कर्मचारी नहीं पहुंच रहे हैं। सरकार ने किसानों को सहायता के आश्वासन का ढिढोरा पीट रखा है लेकिन गांवों में कोई कार्रवाई नहीं है।
पूूरे शिवावैश्य के राजकुमार सिंह का कहना है कि अभी तक गांव में लेखपाल नुकसान की जांच करने नहीं आया। पूरेनरायन दास केे दिनेश मौर्य का कहना है कि उनका गांव चकबंदी में है। कौन जांच करने आया उन्हें नहीं मालूम। सिलौधी के कृपाशंकर का कहना है कि लागत का आधा भी इस बार फसल से मिलना मुश्किल है। भुड़हा के रामलखन का कहना है कि तबाही किससे बताई जाए कोई सुनने वाला नहीं है।
राजस्व कर्मचारी कहते हैं कि हम रिपोर्ट बना कर दे रहे हैं। तारापुर के पूर्व प्रधान विमलेश सिंह का कहना है कि जब जनप्रतिनिधि नहीं सोच रहा तो प्रशासन को क्या कहें। अठेहा के डॉ. काशीधर द्विवेदी का कहना है कि यह नुकसान पूरे साल तक किसानों को सताएगा। थरिया के रामकृपाल का कहना है कि उनकी सारी फसल बारिश की भेंट चढ़ गई। किससे कहें। कोई सुनने वाला नहीं है। रामनगरकोल के संगमलाल पांडे का कहना है कि अभी तक नुकसान की कोई
बारिश से कितना नुकसान हुआ जब कोई पूछे तब तो बताएं। न अधिकारी पूछने आ रहे हैं और न ही जनप्रतिनिधि। आखिर अपना दर्द किसे बताएं। सुनाई पड़ता है कि लिखा-पढ़ी हो रही है। मगर कहां हो रही है, कौन कर रहा है, कुछ नहीं पता। जब कोई गांव ही नहीं आया तो क्या जानूं। यह है पट्टी क्षेत्र के किसानों का दर्द। तहसील क्षेत्र के तमाम गांव ऐसे हैं जहां न तो लेखपाल पहुंचा और न ही कोई अन्य अधिकारी। वे अगर अपनी व्यथा लेकर खुद भी जाते हैं तो कोई सुनने वाला नहीं होता। जनप्रतिनिधि भी नहीं पहुंच रहे हैं। अखबारों से पता चलता है कि अधिकारी और नेता सब लगे हैं। सर्वे हो रहा है। मगर कहां हो रहा है कुछ पता नहीं है। पता नहीं मुआवजा मिलेगा भी या नहीं।
गौरा विकास क्षेत्र के कौलापुर गांव के किसान द्वारिका प्रसाद यादव की जुबान पर जैसे ही दर्द भरी दास्तां आई आंखें डबडबा गईं। वह कहते हैं कि प्रकृति ने तो किसानों पर कहर ढाया ही अब अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी वही कर रहे हैं। कोई दर्द पूछने नहीं पहुंच रहा है। लेखपाल घर में बैठकर रिपोर्ट लगा रहा है। सही मुआवजा मिलना मुश्किल दिख रहा है। वह खुद तहसील के चक्कर लका रहे हैं।
मगर कोई सुनने वाला नहीं है। भटपुरवा के रामभुवन मिश्र, सहजिवार के जगमोहन पांडेय का कहना है कि इस आपदा की घड़ी में कागज पर काम चल रहा है। पता नहीं राहत मिलेगी भी या नहीं। रूपीपुर के लालबिहारी उपाध्याय, पूरेबसहू के मम्मन तिवारी भी अधिकारियों के न पहुंचने से दुखी हैं। यह लोग कहते हैं अफसर तो कुछ गांवों में पहुंचे भी लेकिन जनप्रतिनिधि तो कहीं नहीं पहुंचे। फिर कहते हैं कि जब ईश्वर ही रूठ गए तो इन सब का क्या दोष है।