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नोटबंदी के दो साल बाद भी बना है नगदी का संकट
pratapgarh
Updated Sat, 10 Nov 2018 12:19 AM IST
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प्रतापगढ़। नोटबंदी के दो साल बाद भी नगदी का संकट बरकरार है। बैंकों से गाढ़ी कमाई लेने के लिए आज भी लोगों को लाइन में खड़े होकर इंतजार करना पड़ता है। कभी-कभी ऐसी भी स्थितियां खड़ी हो जाती हैं, जब रुपये के लिए बैंक कर्मियों से गिड़गिड़ाना पड़ता है। फिलहाल आनलाइन भुगतान से होने वाली ठगी ने आम ग्राहकों को हलाकान कर रखा है। वहीं अक्सर सर्वर डाउन होने के कारण एटीएम भी खिलौना बने रहते हैं।
आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी लागू होने के बाद से जिले में नकदी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। दो साल बीत गए हैं, इसके बावजूद लोगों की परेशानी कम नहीं हुई है। शहर के साथ ही ग्रामीण इलाकों में नकदी नहीं होने पर आए दिन बैंकों में बवाल होता रहता है। छोटी धनराशि लेने वाले ग्राहकों के लेनदेन पर कोई असर नहीं पड़ता है, मगर लंबी धनराशि के लिए ग्राहकों को अफसरों की परिक्रमा करनी पड़ती है। आलम यह है कि अगर आप को एक लाख रुपये की जरुरत है, तो पहले बैंक कर्मियों से अनुनय, विनय करना पड़ता है। 24 घंटे रुपये उगलने वाले एटीएम के हालात यह है कि आए दिन शटर डाउन रहता है।
गांव के बैंकों का आलम यह है कि वह इंतजार करते रहते हैं, कि कोई रुपये जमा करें, तो निकालने वाले ग्राहक को दें। कभी-कभी जब रुपये जमा करने वाले ग्राहक नहीं आते हैं तो रुपये निकालने वाले ग्राहकों को वापस होना पड़ता है। गांव की बैंकों में दो दिन कैशवैन पहुंचती है, मगर वह भी मांग के अनुरूप नकदी देने में असमर्थ होते हैं।
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आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी लागू होने के बाद से जिले में नकदी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। दो साल बीत गए हैं, इसके बावजूद लोगों की परेशानी कम नहीं हुई है। शहर के साथ ही ग्रामीण इलाकों में नकदी नहीं होने पर आए दिन बैंकों में बवाल होता रहता है। छोटी धनराशि लेने वाले ग्राहकों के लेनदेन पर कोई असर नहीं पड़ता है, मगर लंबी धनराशि के लिए ग्राहकों को अफसरों की परिक्रमा करनी पड़ती है। आलम यह है कि अगर आप को एक लाख रुपये की जरुरत है, तो पहले बैंक कर्मियों से अनुनय, विनय करना पड़ता है। 24 घंटे रुपये उगलने वाले एटीएम के हालात यह है कि आए दिन शटर डाउन रहता है।
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गांव के बैंकों का आलम यह है कि वह इंतजार करते रहते हैं, कि कोई रुपये जमा करें, तो निकालने वाले ग्राहक को दें। कभी-कभी जब रुपये जमा करने वाले ग्राहक नहीं आते हैं तो रुपये निकालने वाले ग्राहकों को वापस होना पड़ता है। गांव की बैंकों में दो दिन कैशवैन पहुंचती है, मगर वह भी मांग के अनुरूप नकदी देने में असमर्थ होते हैं।
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