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पानी की कमी से नर्सरी नहीं डाल पा रहे किसान
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
Updated Sat, 04 Jun 2016 12:16 AM IST
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India’s ‘water doctor’, has turned 84 acres of barren land into a water bowl
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जनपद में अधिकांश सरकारी नलकूप खराब हैं। नहरों में पानी की जगह धूल उड़ रही है। पानी के अभाव में किसान नर्सरी नहीं डाल पा रहे हैं। इसे लेकर किसान चिंतित है। धान की नर्सरी डालने का समय बीतता जा रहा है। किसान तैयारी करने के बाद भी पानी के अभाव में अभी तक धान की नर्सरी नहीं डाल पा रहे हैं। कारण यह है कि अभी तक न तो पर्याप्त बरसात हुई है और न ही प्रशासन द्वारा नहरों में पानी छोड़वाया गया है।
इतना ही नहीं बंद सरकारी नलकूपों को भी चालू करवाने के लिए प्रशासन कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा है। किसी नलकूप का बोर भ्रष्ट हो गया है तो किसी में छोटी मोटी कमियों के चलते उसे नहीं चलाया जा रहा है। इसके किसारों में रोष है। कुछ किसान तो निजी नलकूप लगवाए हैं। मगर बिजली की समस्यां को देखते हुए धान की नर्सरी डालने के लिए उनकी भी हिम्मत नहीं पड़ रही है। किसानों की बातों पर गौर किया जाए तो धान की नर्सरी डालने वाली भूमि पर दो दिन पहले से पानी की भराई की जाती है। इसके बाद बीज को खेत में छींटा जाता है। दो दिनों बाद तक नर्सरी वाले भाग में पानी भरा होना अनिवार्य होता है। पानी न होने के कारण बेहन नहीं तैयार हो पाती। जितना खर्च करके नर्सरी किसान डालते हैं फायदे की जगह किसानों को घाटा उठाना पड़ता है। कृषि विभाग के अधिकारियों का ध्यान किसानों की समस्या की ओर नहीं पड़ रहा है।
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इतना ही नहीं बंद सरकारी नलकूपों को भी चालू करवाने के लिए प्रशासन कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा है। किसी नलकूप का बोर भ्रष्ट हो गया है तो किसी में छोटी मोटी कमियों के चलते उसे नहीं चलाया जा रहा है। इसके किसारों में रोष है। कुछ किसान तो निजी नलकूप लगवाए हैं। मगर बिजली की समस्यां को देखते हुए धान की नर्सरी डालने के लिए उनकी भी हिम्मत नहीं पड़ रही है। किसानों की बातों पर गौर किया जाए तो धान की नर्सरी डालने वाली भूमि पर दो दिन पहले से पानी की भराई की जाती है। इसके बाद बीज को खेत में छींटा जाता है। दो दिनों बाद तक नर्सरी वाले भाग में पानी भरा होना अनिवार्य होता है। पानी न होने के कारण बेहन नहीं तैयार हो पाती। जितना खर्च करके नर्सरी किसान डालते हैं फायदे की जगह किसानों को घाटा उठाना पड़ता है। कृषि विभाग के अधिकारियों का ध्यान किसानों की समस्या की ओर नहीं पड़ रहा है।
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