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मौसम की वजह से पटरी पर लौटी पढ़ाई
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Updated Thu, 14 Jan 2016 11:24 PM IST
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त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में प्रभावित हुई बच्चों की पढ़ाई की भरपाई करने में सूर्यदेव की कृपा बरस रही है। दिसंबर और जनवरी का माह ऐसा होता था, जब हाड़ कंपाने वाली ठंड के चलते स्कूलों को महीनों बंद करना पड़ता था। मगर इस वर्ष ऐसा नहीं हुआ। कड़ाके की ठंड नहीं पड़ने से स्कूलों में पठन-पाठन नियमित रूप से चल रहा है। इससे त्रिस्तरीय चुनाव के दौरान पिछड़ी पढ़ाई की भरपाई करने का मौका मिल रहा है।
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में लगभग तीन माह तक जिले के प्राइमरी, मिडिल और इंटर कॉलेजों में पठन-पाठन बाधित रहा। शिक्षकों का प्रशिक्षण, चुनाव ड्यूटी और चुनावी बयार में मस्त अध्यापकों ने बच्चों की पढ़ाई के प्रति जरा भी ध्यान नहीं दिया। इंटर कालेजों में तो पढ़ाई का माहौल ही नहीं बन पाया था। इस वर्ष शिक्षासत्र में परिवर्तन करने से अप्रैल माह से कक्षाएं प्रारंभ होनी थीं, मगर कॉलेजों में बच्चे ही नहीं आए। जुलाई में स्कूल खुला तो अगस्त के दूसरे पखवारे से चुनाव का शंखनाद हो गया। अधिकांश शिक्षक अपनी पत्नियों या अपने परिजनों को मैदान में उतारकर बच्चों की अनदेखी कर प्रचार-प्रसार में जुट गए। जो बचे वह कभी प्रशिक्षण और कभी चुनाव ड्यूटी के बहाने से स्कूल से गायब रहे। इससे इस वर्ष स्कूलों में सही ढंग से पढ़ाई ही नहीं हो पाई थी।
संडवा चंद्रिका इलाके के बझान गांव निवासी नब्बे वर्षीय रामशिरोमणि सिंह ने बताया कि 21 वर्ष पहले इस तरह के मौसम में बदलाव आया था। उस समय भी दिसंबर और जनवरी के महीने में ठंड नहीं पड़ी थी, मगर जनवरी के अंतिम सप्ताह में बरसात होने के बाद फरवरी में ठंड का रौद्र रूप देखने को मिला था।
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त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में लगभग तीन माह तक जिले के प्राइमरी, मिडिल और इंटर कॉलेजों में पठन-पाठन बाधित रहा। शिक्षकों का प्रशिक्षण, चुनाव ड्यूटी और चुनावी बयार में मस्त अध्यापकों ने बच्चों की पढ़ाई के प्रति जरा भी ध्यान नहीं दिया। इंटर कालेजों में तो पढ़ाई का माहौल ही नहीं बन पाया था। इस वर्ष शिक्षासत्र में परिवर्तन करने से अप्रैल माह से कक्षाएं प्रारंभ होनी थीं, मगर कॉलेजों में बच्चे ही नहीं आए। जुलाई में स्कूल खुला तो अगस्त के दूसरे पखवारे से चुनाव का शंखनाद हो गया। अधिकांश शिक्षक अपनी पत्नियों या अपने परिजनों को मैदान में उतारकर बच्चों की अनदेखी कर प्रचार-प्रसार में जुट गए। जो बचे वह कभी प्रशिक्षण और कभी चुनाव ड्यूटी के बहाने से स्कूल से गायब रहे। इससे इस वर्ष स्कूलों में सही ढंग से पढ़ाई ही नहीं हो पाई थी।
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संडवा चंद्रिका इलाके के बझान गांव निवासी नब्बे वर्षीय रामशिरोमणि सिंह ने बताया कि 21 वर्ष पहले इस तरह के मौसम में बदलाव आया था। उस समय भी दिसंबर और जनवरी के महीने में ठंड नहीं पड़ी थी, मगर जनवरी के अंतिम सप्ताह में बरसात होने के बाद फरवरी में ठंड का रौद्र रूप देखने को मिला था।
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