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बेल्हा के मतदाताओं का निर्दलियों पर नहीं है भरोसा
Sat, 30 Mar 2019 01:31 AM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रतापगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रतापगढ़
Published by: विनोद सिंह
Updated Sat, 30 Mar 2019 01:31 AM IST
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प्रतीकात्मक फोटो
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बेल्हा के मतदाताओं ने निर्दलियों पर कभी भी विश्वास नहीं किया। टिकट नहीं मिलने और जनता के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए कई बार निर्दलियों ने जोर आजमाइश की, मगर उन्हें इतने मत कभी नहीं मिले कि वह किसी राजनैतिक दल के प्रत्याशी का समीकरण बिगाड़ सकें। इससे जनता ने निर्दलियों की बात तो सुनी, मगर उन्हें ठुकराने के सिवा कभी भी मौका देना मुनासिब नहीं समझा। यही वजह रही कि आज तक किसी भी निर्दलीय प्रत्याशी को जीत नहीं मिली।
1951 के लोकसभा चुनाव में श्याम सुंदर ने निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में चुनाव लड़ा, उन्हें मात्र 9.95 प्रतिशत मत मिले। जबकि पं. मुनीश्वर दत्त उपाध्याय को 63.66 प्रतिशत हासिल कर विजय हासिल की थी। 1967 के चुनाव में तीन निर्दलीय प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमाने के लिए मैदान में उतरे थे। मगर तीनों प्रत्याशियों को करारी हार का सामना करना पड़ा। इसमें आरडी सिंह को 3.97 प्रतिशत, वीआर को 3.36 प्रतिशत और एनबी सिंह को 2.45 प्रतिशत मतों से संतोष करना पड़ा था।
1971 के लोकसभा चुनाव में तीन निर्दलीय प्रत्याशियों ने ताल ठोंकी थी। राजा दिनेश सिंह और मुनीश्वरदत्त उपाध्याय के बीच हुई जंग में तीनों निर्दलियों ने अपनी साख बनानी चाही, मगर मतदाताओं ने ठुकरा दिया। दिनेश सिंह को जीत मिली, मगर निर्दलियों को नीचे के तीनों स्थान मिले। तीसरे स्थान पर रहे शिव नारायण सिंह को 1.60 प्रतिशत, श्यामसुंदर उपाध्याय को 0.76 प्रतिशत और नरेश बहादुर को 0.73 प्रतिशत मतों से संतोष करना पड़ा।
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1980 के लोकसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ और यह संख्या बढ़कर छह हो गई। मगर इन प्रत्याशियों को इतने मत नहीं मिले कि यह राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों का समीकरण बिगाड़ सकें। इस चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी ओंकारनाथ को 3.81 प्रतिशत मत मिले, रामकुमार को 1.46 प्रतिशत, नरेशबहादुर सिंह 0.63 प्रतिशत, भवानीफेर 0.60 प्रतिशत, ज्ञान प्रकाश को 0.49 प्रतिशत मत मिले।
1996 के चुनाव में सबसे अधिक 34 निर्दलीय थे मैदान में
वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में 41 प्रत्याशी मैदान में कूदे थे। जिसमें 35 प्रत्याशी निर्दलीय और छह प्रत्याशी राजनैतिक दलों के थे। निर्दलीय प्रत्याशियों में सबसे अधिक मत पाने वाले श्रीराम वर्मा थे। उन्हें 6.08 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि सबसे कम मत पाने वाले निर्दलीय प्रत्याशियों में अब्बास अली का नाम शामिल है।
जिन्हें मात्र 0.02 प्रतिशत मतों से संतोष करना पड़ा था। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी रत्ना सिंह ने 29.84 प्रतिशत मत हासिल कर पहली बार जिले की सांसद बनी थीं। रत्ना सिंह को 1,39,326 मत मिले तो दूसरे स्थान पर रहे भाजपा प्रत्याशी उदयराज मिश्र को 1,17,689 मत मिले थे।
जीत की बात तो दूर, नजदीक भी नहीं पहुंचे निर्दलीय
लोकसभा चुनाव में निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी कभी भी जीत के नजदीक नहीं पहुंचे हैं। राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों की खिलाफत करके चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को मत इतने कम मिलते थे कि वह मतगणना प्रारंभ होते ही बाहर हो जाते थे। हालांकि अधिकांश प्रत्याशी ऐसे थे, जिनका चुनाव लड़ना शौक होता था। करारी हार मिलने के बाद भी वह चुनाव लड़ने से बाज नहीं आते थे।
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1951 के लोकसभा चुनाव में श्याम सुंदर ने निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में चुनाव लड़ा, उन्हें मात्र 9.95 प्रतिशत मत मिले। जबकि पं. मुनीश्वर दत्त उपाध्याय को 63.66 प्रतिशत हासिल कर विजय हासिल की थी। 1967 के चुनाव में तीन निर्दलीय प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमाने के लिए मैदान में उतरे थे। मगर तीनों प्रत्याशियों को करारी हार का सामना करना पड़ा। इसमें आरडी सिंह को 3.97 प्रतिशत, वीआर को 3.36 प्रतिशत और एनबी सिंह को 2.45 प्रतिशत मतों से संतोष करना पड़ा था।
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1971 के लोकसभा चुनाव में तीन निर्दलीय प्रत्याशियों ने ताल ठोंकी थी। राजा दिनेश सिंह और मुनीश्वरदत्त उपाध्याय के बीच हुई जंग में तीनों निर्दलियों ने अपनी साख बनानी चाही, मगर मतदाताओं ने ठुकरा दिया। दिनेश सिंह को जीत मिली, मगर निर्दलियों को नीचे के तीनों स्थान मिले। तीसरे स्थान पर रहे शिव नारायण सिंह को 1.60 प्रतिशत, श्यामसुंदर उपाध्याय को 0.76 प्रतिशत और नरेश बहादुर को 0.73 प्रतिशत मतों से संतोष करना पड़ा।
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1980 के लोकसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ और यह संख्या बढ़कर छह हो गई। मगर इन प्रत्याशियों को इतने मत नहीं मिले कि यह राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों का समीकरण बिगाड़ सकें। इस चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी ओंकारनाथ को 3.81 प्रतिशत मत मिले, रामकुमार को 1.46 प्रतिशत, नरेशबहादुर सिंह 0.63 प्रतिशत, भवानीफेर 0.60 प्रतिशत, ज्ञान प्रकाश को 0.49 प्रतिशत मत मिले।
1996 के चुनाव में सबसे अधिक 34 निर्दलीय थे मैदान में
वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में 41 प्रत्याशी मैदान में कूदे थे। जिसमें 35 प्रत्याशी निर्दलीय और छह प्रत्याशी राजनैतिक दलों के थे। निर्दलीय प्रत्याशियों में सबसे अधिक मत पाने वाले श्रीराम वर्मा थे। उन्हें 6.08 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि सबसे कम मत पाने वाले निर्दलीय प्रत्याशियों में अब्बास अली का नाम शामिल है।
जिन्हें मात्र 0.02 प्रतिशत मतों से संतोष करना पड़ा था। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी रत्ना सिंह ने 29.84 प्रतिशत मत हासिल कर पहली बार जिले की सांसद बनी थीं। रत्ना सिंह को 1,39,326 मत मिले तो दूसरे स्थान पर रहे भाजपा प्रत्याशी उदयराज मिश्र को 1,17,689 मत मिले थे।
जीत की बात तो दूर, नजदीक भी नहीं पहुंचे निर्दलीय
लोकसभा चुनाव में निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी कभी भी जीत के नजदीक नहीं पहुंचे हैं। राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों की खिलाफत करके चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को मत इतने कम मिलते थे कि वह मतगणना प्रारंभ होते ही बाहर हो जाते थे। हालांकि अधिकांश प्रत्याशी ऐसे थे, जिनका चुनाव लड़ना शौक होता था। करारी हार मिलने के बाद भी वह चुनाव लड़ने से बाज नहीं आते थे।