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आज जागेंगे देव, शुरू होंगे मांगलिक कार्य
Pratapgarh
Updated Sat, 24 Nov 2012 12:00 PM IST
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प्रतापगढ़। कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी भगवान विष्णु के शयन से जागने का दिन। इसलिए इसे देवोत्थान एकादशी या देवउठनी एकादशी के भी नाम से जाना जाता है। चार माह के बाद अब शनिवार से हिन्दू धर्म में मांगलिक कार्य शुरू होंगे। इस दिन लोग भगवान शालिग्राम और तुलसी का विवाह रचाते हैं। इसे दीप पर्व का आखिरी दिन भी माना जाता है।
पौराणिक मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन के लिए चले जाते हैं। चार माह के शयन के पश्चात कार्तिक शुक्ल एकादशी को वह निद्रा त्यागते हैं। इस चार माह की अवधि में हिंदू धर्म में मांगलिक कार्य नहीं संपन्न होते। शनिवार को कार्तिक शुक्ल एकादशी है। भगवान विष्णु के जागने के साथ ही मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाएगी। सबसे पहले भगवान शालिग्राम और तुलसी का विवाह होगा। यह उत्सव प्राय: सभी घरों में मनाया जात है। तुलसी और शालिग्राम विवाह की भी पौराणिक कथा है। कहा गया है कि जलंधर नामक दैत्य देवताओं से युद्ध कर रहा था। मगर उसका वध नहीं हो पा रहा था। पता चला कि उसकी पत्नी वृंदा के पतिव्रता होने के कारण जलंधर अजेय बना है। भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धारण कर वृंदा का सतीत्व और यज्ञ दोनों भंग कर दिया। इसके बाद जलंधर मार दिया गया। मगर विष्णु के छल की बात वृंदा को पता चल गई। उसने भगवान को पत्थर हो जाने का शाप दे दिया। भगवान उसका शाप स्वीकार कर लिया लेकिन शर्त रखी कि वह (वृंदा) तुलसी का पौधा बनकर उनको छाया प्रदान करती रहेगी। इस तरह भगवान विष्णु शालिग्राम और वृंदा तुलसी हो गई। भगवान ने तुलसी को पत्नी बना लिया। भगवान को प्रिय होने के कारण ही पूजन में तुलसी का प्रयोग होता है। इसलिए तुलसी-शालिग्राम का विवाह कराया जाता है।
इसके अलावा यह दीप पर्व आखिरी दिन भी है। लोग देवोत्थान एकादशी पर घरों में दीप जलाते हैं और मां लक्ष्मी का पूजन करते हैं। इसलिए इसे प्रबोधनी एकादशी भी कहा गया है। पुराणों के अनुसार प्रबोधनी एकादशी पर व्रत करने से सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
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पौराणिक मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन के लिए चले जाते हैं। चार माह के शयन के पश्चात कार्तिक शुक्ल एकादशी को वह निद्रा त्यागते हैं। इस चार माह की अवधि में हिंदू धर्म में मांगलिक कार्य नहीं संपन्न होते। शनिवार को कार्तिक शुक्ल एकादशी है। भगवान विष्णु के जागने के साथ ही मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाएगी। सबसे पहले भगवान शालिग्राम और तुलसी का विवाह होगा। यह उत्सव प्राय: सभी घरों में मनाया जात है। तुलसी और शालिग्राम विवाह की भी पौराणिक कथा है। कहा गया है कि जलंधर नामक दैत्य देवताओं से युद्ध कर रहा था। मगर उसका वध नहीं हो पा रहा था। पता चला कि उसकी पत्नी वृंदा के पतिव्रता होने के कारण जलंधर अजेय बना है। भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धारण कर वृंदा का सतीत्व और यज्ञ दोनों भंग कर दिया। इसके बाद जलंधर मार दिया गया। मगर विष्णु के छल की बात वृंदा को पता चल गई। उसने भगवान को पत्थर हो जाने का शाप दे दिया। भगवान उसका शाप स्वीकार कर लिया लेकिन शर्त रखी कि वह (वृंदा) तुलसी का पौधा बनकर उनको छाया प्रदान करती रहेगी। इस तरह भगवान विष्णु शालिग्राम और वृंदा तुलसी हो गई। भगवान ने तुलसी को पत्नी बना लिया। भगवान को प्रिय होने के कारण ही पूजन में तुलसी का प्रयोग होता है। इसलिए तुलसी-शालिग्राम का विवाह कराया जाता है।
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इसके अलावा यह दीप पर्व आखिरी दिन भी है। लोग देवोत्थान एकादशी पर घरों में दीप जलाते हैं और मां लक्ष्मी का पूजन करते हैं। इसलिए इसे प्रबोधनी एकादशी भी कहा गया है। पुराणों के अनुसार प्रबोधनी एकादशी पर व्रत करने से सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
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