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पैरा ओलंपिक के विजेताओं का सम्मान देखकर जोश से भर गए दिव्यांग खिलाड़ी
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मेरठ में पैरा ओलंपिक के खिलाड़ियों के सम्मान समारोह में पहुंचे जिले के दिव्यांग खिलाड़ी और क्री?
- फोटो : PILIBHIT
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पीलीभीत। मेरठ की धरती पर मुख्यमंत्री के हाथों पैरा ओलंपिक में भाग लेने वाले खिलाड़ियों का सम्मान देखकर जिले के दिव्यांग खिलाड़ियों में नया जोश जाग गया। अब वे भी ओलंपिक तक जाने के इरादे से तैयारी करेंगे और आगे बढ़ेंगे। खिलाड़ियों ने कहा कि जब जिलाधिकारी पद पर रहते हुए सुहास एलवाई खेल के लिए समय निकाल सकते हैं और ओलंपिक में जीत हासिल कर सकते हैं तो वे क्यों नहीं? जीत के जज्बे के साथ तैयारी कर सकते हैं।
टोक्यो पैरालंपिक में आईएएस सुहास एलवाई पुरुष सिंगल्स बैडमिंटन पदक जीत कर लाए हैं। प्रशासनिक सेवा में कार्यरत लोग अमूमन मात्र शौक के लिए खेलते हैं लेकिन गौतमबुद्ध नगर में डीएम रहते हुए सुहास एलवाई ने इस बात को खारिज किया और तमाम दिव्यांग खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। जिला क्रीड़ा अधिकारी राजकुमार ने बताया कि जिले के दिव्यांग खिलाड़ियों को मेरठ की धरती पर आयोजित दिव्यांग खिलाड़ियों के सम्मान समारोह में ले जाने का मकसद आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना ही था। मेरठ में जिले से तीन खिलाड़ी शामिल हुए और तीनों उत्साहित नजर आए।
जब ईश्वर कुछ लेता तो बहुत कुछ देता है। यही मुझे आज महसूस हुआ। मैंने देखा कि शारीरिक कमजोरियों को पीछे छोड़ते हुए किस तरह से 19 दिव्यांग खिलाड़ियों ने पैरा ओलंपिक में भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया है। उनका सम्मान सरकारी और समाज दोनों के स्तर से हो रहा है। यह अच्छी बात है। मैं भी अब पूरे जोश और जज्बे के साथ क्रिकेट खेलूंगा और प्रयास करूंगा कि मेरे खेल से देश को मेडल मिले।
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- शिवम गुप्ता, क्रिकेट
मैं 17 वर्ष का हूं और तीन वर्ष से हॉकी खेल रहा हूं। चंडीगढ़ तक खेला हूं। जब मैंने जिलाधिकारी को सम्मानित होते देखा तो मुझे लगा कि मैं भी आगे बढ़कर खेल सकता हूं। मुझे क्रीड़ा अधिकारी ने प्रोत्साहन दिया। मेरठ में उन खिलाड़ियों को करीब से देखने का मौका दिया जिन्होंने अपनी दिव्यांगता को मात दी और कामयाबी के शिखर को चूमा है। हम भी एक न एक दिन देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन करेंगे।
सनी कटियार, हॉकी खिलाड़ी
मैं 24 वर्ष की हूं और बीकॉम कर चुकी हूं। मुझे एक आंख में दिक्कत है। इसलिए दिव्यांग हूं लेकिन खेल में हमेशा सभी खिलाड़ियों के बराबर खेलती हूं। इसलिए प्रदेश स्तर तक खेलने का मौका मिला। अब गांव में ही रहती हूं और कभी कभी अभ्यास करती हूं। लेकिन पैरा ओलंपिक खिलाड़ियों का सम्मान देखकर मेरे अंदर भी नया जोश और जज्बा पैदा हुआ है। मैं भी पैरा ओलंपिक तक खेलना जाना चाहती हूं। मेरे गांव में ग्राउंड है। खेलती हूं तो 20-25 लड़कियां एकत्र हो जाती हैं।
- उषा देवी, हिम्मतनगर
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टोक्यो पैरालंपिक में आईएएस सुहास एलवाई पुरुष सिंगल्स बैडमिंटन पदक जीत कर लाए हैं। प्रशासनिक सेवा में कार्यरत लोग अमूमन मात्र शौक के लिए खेलते हैं लेकिन गौतमबुद्ध नगर में डीएम रहते हुए सुहास एलवाई ने इस बात को खारिज किया और तमाम दिव्यांग खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। जिला क्रीड़ा अधिकारी राजकुमार ने बताया कि जिले के दिव्यांग खिलाड़ियों को मेरठ की धरती पर आयोजित दिव्यांग खिलाड़ियों के सम्मान समारोह में ले जाने का मकसद आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना ही था। मेरठ में जिले से तीन खिलाड़ी शामिल हुए और तीनों उत्साहित नजर आए।
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जब ईश्वर कुछ लेता तो बहुत कुछ देता है। यही मुझे आज महसूस हुआ। मैंने देखा कि शारीरिक कमजोरियों को पीछे छोड़ते हुए किस तरह से 19 दिव्यांग खिलाड़ियों ने पैरा ओलंपिक में भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया है। उनका सम्मान सरकारी और समाज दोनों के स्तर से हो रहा है। यह अच्छी बात है। मैं भी अब पूरे जोश और जज्बे के साथ क्रिकेट खेलूंगा और प्रयास करूंगा कि मेरे खेल से देश को मेडल मिले।
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- शिवम गुप्ता, क्रिकेट
मैं 17 वर्ष का हूं और तीन वर्ष से हॉकी खेल रहा हूं। चंडीगढ़ तक खेला हूं। जब मैंने जिलाधिकारी को सम्मानित होते देखा तो मुझे लगा कि मैं भी आगे बढ़कर खेल सकता हूं। मुझे क्रीड़ा अधिकारी ने प्रोत्साहन दिया। मेरठ में उन खिलाड़ियों को करीब से देखने का मौका दिया जिन्होंने अपनी दिव्यांगता को मात दी और कामयाबी के शिखर को चूमा है। हम भी एक न एक दिन देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन करेंगे।
सनी कटियार, हॉकी खिलाड़ी
मैं 24 वर्ष की हूं और बीकॉम कर चुकी हूं। मुझे एक आंख में दिक्कत है। इसलिए दिव्यांग हूं लेकिन खेल में हमेशा सभी खिलाड़ियों के बराबर खेलती हूं। इसलिए प्रदेश स्तर तक खेलने का मौका मिला। अब गांव में ही रहती हूं और कभी कभी अभ्यास करती हूं। लेकिन पैरा ओलंपिक खिलाड़ियों का सम्मान देखकर मेरे अंदर भी नया जोश और जज्बा पैदा हुआ है। मैं भी पैरा ओलंपिक तक खेलना जाना चाहती हूं। मेरे गांव में ग्राउंड है। खेलती हूं तो 20-25 लड़कियां एकत्र हो जाती हैं।
- उषा देवी, हिम्मतनगर