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मुजफ्फरनगर: बच निकलेंगे दंगों के गुनहगार
कपिल कुमार/अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
Updated Tue, 12 Nov 2013 01:29 PM IST
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दंगे के आरोपियों के लिए फर्जी नामजदगी ‘बेगुनाही’ का हथियार बन गई है। उन्माद पर काबू पाने में विफल रहा पुलिस तंत्र मजबूत साक्ष्य जुटाने में भी नाकाम साबित हुआ है।
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हिंसा की एक घटना के चार-चार मुकदमे दर्ज हैं। वक्त भी अलग-अलग दर्शाया गया है। कई केस में तो सौ से अधिक लोगों की नामजदगी है।
फुगाना के एक मामले में आईजी आशुतोष पांडेय ने जब वादी को कागज थमाकर आरोपियों के नाम लिखने को कहा तो वह सिर्फ छह नाम ही लिख पाया।
दंगा रोकने में नाकाम
पहले पुलिस हिंसा रोकने में नाकाम साबित हुई, अब दंगे के दोषियों को कैसे सजा दिला पाएगा, यह भी बड़ा सवाल है। झूठी नामजदगी, कमजोर तफ्तीश और साक्ष्यों के अभाव में खड़े किए गए मुकदमे खुद पुलिस के लिए पहेली बन गए हैं।
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हिंसाग्रस्त शाहपुर, फुगाना और भौराकलां थाने समेत दंगे में छह हजार लोगों की नामजदगी पहले कभी नहीं हुईं। कुटबा, लांक, बहावड़ी, फुगाना, मुंडभर और मोहम्मदपुर राय सिंह ऐसे गांव हैं, जहां सर्वाधिक जान-माल की हानि हुई।
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पुलिस इतने दबाव में थी कि कुछ नहीं देखा गया। कैंपों में रहने वाले शरणार्थियों ने एक-एक घटना के चार-चार मुकदमे दर्ज करा दिए। सबसे बड़ा झोल यह है कि घटना का वक्त और नामजदगी भी मेल नहीं खा रही।
सबूत ही नहीं हैं
मुकदमों में साक्ष्यों का ऐसा अभाव है, जिससे गुनहगारों को कोर्ट से जमानत भी आसानी से मिल रही है। आईजी फुगाना थाने में उस वक्त हैरत में पड़ गए, जब उन्होंने एक वादी अहसान को कागज देकर आरोपियों के नाम लिखने को कहा, वादी सौ नामजदगी में से महज छह नाम ही लिख सका।
फुगाना का यह ऐसा अकेला केस नहीं है, लगभग हर थानों की नामजदगी का यही हाल है। शामली के लांक में घटना पश्चिम में हुई, जबकि नामजदगी पूरब बस्ती के 500 लोगों की कर दी गई।
प्राथ्ामिकी में दिक्कतें
इसी तरह कुटबा की हिंसा में आठ लोगों की जान गई, लेकिन नामजदगी 111 की है। यहां भी मुकदमों में समय और घटनास्थल विपरीत है। अहम पहलू ये भी है कि नामजदगी में ऐसे ग्रामीणों को भी फंसा दिया गया, जो सालों से बाहर रह रहे हैं।
इनमें कुछ ऐसे भी हैं, जिनकी कॉल डिटेल तफ्तीश में बाहर पाई गई है। छानबीन में यह भी सामने आया कि शिविरों में एक ही प्रारूप में तहरीर लिखी गई, नाम और पते अलग हैं बाकी सबकुछ एक जैसा है।
दंगे के मामलों की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल जिंदल कहते हैं कि लचर विवेचना का सीधा लाभ मुल्जिमों को मिलेगा। अधूरे साक्ष्य केस को कमजोर करते हैं।