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गंगा स्नान का पुण्य जगा गए कल्याणदेव
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Fri, 11 Nov 2016 12:59 AM IST
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गंगास्नान के लिए जाते श्रद्धालु।
- फोटो : अमर उजाला
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पौराणिक शुकतीर्थ की महिमा में कार्तिक गंगा स्नान का विशेष महत्व है। वीतराग स्वामी कल्याणदेव ने तीर्थ जीर्णोद्धार की कर्मयात्रा में यहां गंगा स्नान और मेलों की शुरुआत की। ऐतिहासिक भागवत भूमि में कार्तिक पूर्णिमा पर्व के अलावा प्रतिवर्ष चार मेले लगते हैं। मेले में भारत की लोक संस्कृति और परंपरा के दर्शन होते हैं।
महर्षि शुकदेव मुनि की तपोभूमि के जीर्णोद्धार की प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए कर्मयोगी संत कल्याणदेव वर्ष 1944 में पहली बार यहां आए थे। तब रेतीले टीले पर श्रीमद्भागवत कथा का साक्षी अक्षय वट वृक्ष जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था। यह वट वृक्ष शुक्रताल में शुकदेव मुनि का प्रतीक है। तीर्थ के नवनिर्माण के लिए शिक्षा ऋषि ने तप, त्याग और परिश्रम की अनूठी दास्ता लिखी। 18 नवंबर, 1945 को भागवत की जन्मभूमि पर स्वामी जी ने एक करोड़ गायत्री मंत्र का अनुष्ठान कराया।
अलवर नरेश सर तेज बहादुर से श्रीशुकदेव मंदिर का भूमि पूजन कराया। भक्तों की श्रद्धा-भक्ति से निष्काम संत के संकल्प की प्रतिबद्धता सशक्त होती गई। तीन अक्तूबर 1948 को शुकतीर्थ में काशी, प्रयाग और वृंदावन से आए पुरोहितों ने मंदिर का शिलान्यास कराया। स्वामी अखंडानंद सरस्वती के सानिध्य में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा कराई गई, जिसमें तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा यज्ञमान बने।
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वर्ष 1956 में स्वामी कल्याणदेव ने शुकतीर्थ में कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान और मेले का आयोजन प्रारंभ किया। श्रीशुकदेव सेवा समिति मेले का संचालन करती थी। बाद में इसकी जिम्मेदारी जिला पंचायत को दे दी गई। हर साल यहां कार्तिक पूर्णिमा के अलावा गंगा दशहरा, बैशाखी, शरद चतुर्दशी, पितृ विसर्जनी अमावस्या पर मेले लगते हैं। शुकतीर्थ धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र बन चुका है। देश भर के कथावाचक श्रीमद्भागवत के लिए धार्मिक नगरी पहुंचते हैं। लाखों श्रद्धालुओं को कथा श्रवण भक्ति और गंगा स्नान की आस्था तीर्थ में खींच लाती है।
गंगा तट पर लग गए तंबू
शुक्रताल। कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान मेले में गांव-गांव से पहुंचे श्रद्धालुओं का डेरा जमने लगा है। भैंसा-बुग्गियों और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से तीर्थ यात्री शुकतीर्थ में पहुंच रहे हैं। महिलाएं मंगल गीत गाते हुए गंगा तट की ओर बढ़ रही हैं। तंबुओं का नगर बसने लगा है। जिला पंचायत के निर्देशन में आयोजित पांच दिवसीय मेले के लिए प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं।
एसएसपी ने किया मेला स्थल का दौरा
शुक्रताल। तीर्थ यात्रियों को मेला ग्राउंड में ठहराया गया है। तीर्थ के मंदिरों श्रीशुकदेव आश्रम, हनुमतधाम, दंडी आश्रम, गणेशधाम, दुर्गाधाम, शिवधाम, लक्ष्मीनारायण मंदिर, महाशक्ति सिद्धपीठ योगाश्रम, गोड़िया मठ सहित धर्मशालाओं में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी है।
एसपी देहात विनीत भटनागर, सीओ अकील अहमद, भोपा एसओ योगेश शर्मा ने गंगा तट क्षेत्र का निरीक्षण किया। देर शाम एसएसपी बबलू कुमार ने मेला क्षेत्र का दौरा कर सुरक्षा व्यवस्थाओं का जायजा लिया। कप्तान ने गोताखोरों की टीम नियुक्त करने, असामाजिक तत्वों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने और अवैध शराब की बिक्री पर रोक लगाने के निर्देश दिए।
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महर्षि शुकदेव मुनि की तपोभूमि के जीर्णोद्धार की प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए कर्मयोगी संत कल्याणदेव वर्ष 1944 में पहली बार यहां आए थे। तब रेतीले टीले पर श्रीमद्भागवत कथा का साक्षी अक्षय वट वृक्ष जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था। यह वट वृक्ष शुक्रताल में शुकदेव मुनि का प्रतीक है। तीर्थ के नवनिर्माण के लिए शिक्षा ऋषि ने तप, त्याग और परिश्रम की अनूठी दास्ता लिखी। 18 नवंबर, 1945 को भागवत की जन्मभूमि पर स्वामी जी ने एक करोड़ गायत्री मंत्र का अनुष्ठान कराया।
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अलवर नरेश सर तेज बहादुर से श्रीशुकदेव मंदिर का भूमि पूजन कराया। भक्तों की श्रद्धा-भक्ति से निष्काम संत के संकल्प की प्रतिबद्धता सशक्त होती गई। तीन अक्तूबर 1948 को शुकतीर्थ में काशी, प्रयाग और वृंदावन से आए पुरोहितों ने मंदिर का शिलान्यास कराया। स्वामी अखंडानंद सरस्वती के सानिध्य में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा कराई गई, जिसमें तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा यज्ञमान बने।
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वर्ष 1956 में स्वामी कल्याणदेव ने शुकतीर्थ में कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान और मेले का आयोजन प्रारंभ किया। श्रीशुकदेव सेवा समिति मेले का संचालन करती थी। बाद में इसकी जिम्मेदारी जिला पंचायत को दे दी गई। हर साल यहां कार्तिक पूर्णिमा के अलावा गंगा दशहरा, बैशाखी, शरद चतुर्दशी, पितृ विसर्जनी अमावस्या पर मेले लगते हैं। शुकतीर्थ धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र बन चुका है। देश भर के कथावाचक श्रीमद्भागवत के लिए धार्मिक नगरी पहुंचते हैं। लाखों श्रद्धालुओं को कथा श्रवण भक्ति और गंगा स्नान की आस्था तीर्थ में खींच लाती है।
गंगा तट पर लग गए तंबू
शुक्रताल। कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान मेले में गांव-गांव से पहुंचे श्रद्धालुओं का डेरा जमने लगा है। भैंसा-बुग्गियों और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से तीर्थ यात्री शुकतीर्थ में पहुंच रहे हैं। महिलाएं मंगल गीत गाते हुए गंगा तट की ओर बढ़ रही हैं। तंबुओं का नगर बसने लगा है। जिला पंचायत के निर्देशन में आयोजित पांच दिवसीय मेले के लिए प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं।
एसएसपी ने किया मेला स्थल का दौरा
शुक्रताल। तीर्थ यात्रियों को मेला ग्राउंड में ठहराया गया है। तीर्थ के मंदिरों श्रीशुकदेव आश्रम, हनुमतधाम, दंडी आश्रम, गणेशधाम, दुर्गाधाम, शिवधाम, लक्ष्मीनारायण मंदिर, महाशक्ति सिद्धपीठ योगाश्रम, गोड़िया मठ सहित धर्मशालाओं में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी है।
एसपी देहात विनीत भटनागर, सीओ अकील अहमद, भोपा एसओ योगेश शर्मा ने गंगा तट क्षेत्र का निरीक्षण किया। देर शाम एसएसपी बबलू कुमार ने मेला क्षेत्र का दौरा कर सुरक्षा व्यवस्थाओं का जायजा लिया। कप्तान ने गोताखोरों की टीम नियुक्त करने, असामाजिक तत्वों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने और अवैध शराब की बिक्री पर रोक लगाने के निर्देश दिए।