{"_id":"58a9e5444f1c1b0d4cd84e8e","slug":"the-truth-of-the-tender-process","type":"story","status":"publish","title_hn":"सरकारी फाइलों में दफन है टेंडर प्रक्रिया का सच ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सरकारी फाइलों में दफन है टेंडर प्रक्रिया का सच
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Mon, 20 Feb 2017 12:04 AM IST
विज्ञापन
ललितपुर के माता टिल्ला डैम पर हथियारों का प्रदर्शन करते कर्मचारी, इसी डैम पर सुपरवाईजर है महिमा का पिता देव प्रकाश। (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मछली कारोबार की जड़ें काफी गहरी हैं। सरकारी टेंडर पर लिए गए डैमों से हर दिन करोड़ों का वारा न्यारा होता है। सियासी संरक्षण में मछली उत्पादन से लेकर देश की मंडियों तक पहुंचाने की पूरी बागडोर दबंगों के हाथों में होती है। जिले के बेरोजगारों को काफी तादात में डैमों पर काम के लिए रखा गया है।
ललितपुर जिले के माता टिल्ला डैम पर महिमा के पिता देव प्रकाश सुपरवाइजर हैं। बीते एक साल से उनकी ड्यूटी लखनऊ की दुबग्गा मंडी में लोगों से मछलियों का भुगतान लेने की थी। बिना किसी सुरक्षा के वह कई-कई दिनों तक रहते और लाखों की रकम लेकर ललितपुर पहुंचते। उत्तर भारत में फैले मछली पालन केंद्रों का जिन कंपनियों ने ठेका ले रखा है, वह राजनीतिक संरक्षण के दम पर ही हासिल किया गया है। पिछले दो साल में जिले से सैकड़ों युवाओं की भर्ती डैमों पर मछली पकड़ने और ट्रकों को देश की मंडिय़ों में पहुंचाने में लगाई गई है। हर दिन दो से तीन ट्रक मछलियां बिक्री के लिए निकलती हैं।
ललितपुर के अलावा कोटद्वार के डैम पर भी यहां के आरोपियों का कब्जा है। आठ से दस हजार की तनख्वाह पर गांव के बेरोजगार युवकों को धंधे से जुड़े लोगों ने डैमों पर नौकरी दे रखी हैं। ललितपुर के डैम का फोटो महिमा आत्महत्या प्रकरण के आरोपियों की फेसबुक पर तरीके से सजाया गया है।
विज्ञापन
हथियारों का प्रदर्शन करते कर्मचारियों के रुख को देखकर साफ जाहिर है कि सारा खेल वर्चस्व का है। मछली के धंधे में हर साल करोड़ों के वारे न्यारे करने के लिए एक पूरा नेटवर्क पश्चिम के जिलों में फैल चुका है। अलग-अलग नामों से छद्म कंपनियां गठित कर सरकारी कागजों की खानापूर्ति की गई है।
केंद्र सरकार के अधीन डैमों के टेंडर की सरकारी प्रक्रिया में क्या मानक है, कितने रुपये में यह टेंडर कितनी अवधि तक छोड़े गए हैं और इसे जारी करने का पात्रों का आधार क्या है। ऐसे अनगिनत सवालों को जवाब सरकारी फाइलों में ही दफन है। सुपरवाइजर देव प्रकाश से लखनऊ सात फरवरी को लूट न होती तो मछली के धंधे का सच भी सार्वजनिक नहीं होता।
आतंक का सच क्या है!
सुपरवाइजर देव प्रकाश से लखनऊ में साढे़ चार लाख की लूट हुई थी। केेंद्र सरकार के निर्देशों के बावजूद कैसे इतना बड़ा भुगतान नकद किया गया। मछली की बिक्री के लिए क्या प्रदेश के वाणिज्य कर विभाग में कंपनी का पंजीकरण है। आमदनी के लिहाज से क्या ठेका हासिल करने वाली कंपनियां कोई कर राजस्व में अदा करती है। ठेकेदारों का यह झूठ खुद जगजाहिर हो गया है, क्योंकि लखनऊ एसएसपी को दी गई तहरीर में लूटी गई रकम तीन लाख की दिखाई गई है। देव प्रकाश के परिवार से साढे़ चार लाख रुपये वसूलने का आतंक फैलाया गया।
विज्ञापन
ललितपुर जिले के माता टिल्ला डैम पर महिमा के पिता देव प्रकाश सुपरवाइजर हैं। बीते एक साल से उनकी ड्यूटी लखनऊ की दुबग्गा मंडी में लोगों से मछलियों का भुगतान लेने की थी। बिना किसी सुरक्षा के वह कई-कई दिनों तक रहते और लाखों की रकम लेकर ललितपुर पहुंचते। उत्तर भारत में फैले मछली पालन केंद्रों का जिन कंपनियों ने ठेका ले रखा है, वह राजनीतिक संरक्षण के दम पर ही हासिल किया गया है। पिछले दो साल में जिले से सैकड़ों युवाओं की भर्ती डैमों पर मछली पकड़ने और ट्रकों को देश की मंडिय़ों में पहुंचाने में लगाई गई है। हर दिन दो से तीन ट्रक मछलियां बिक्री के लिए निकलती हैं।
विज्ञापन
ललितपुर के अलावा कोटद्वार के डैम पर भी यहां के आरोपियों का कब्जा है। आठ से दस हजार की तनख्वाह पर गांव के बेरोजगार युवकों को धंधे से जुड़े लोगों ने डैमों पर नौकरी दे रखी हैं। ललितपुर के डैम का फोटो महिमा आत्महत्या प्रकरण के आरोपियों की फेसबुक पर तरीके से सजाया गया है।
विज्ञापन
हथियारों का प्रदर्शन करते कर्मचारियों के रुख को देखकर साफ जाहिर है कि सारा खेल वर्चस्व का है। मछली के धंधे में हर साल करोड़ों के वारे न्यारे करने के लिए एक पूरा नेटवर्क पश्चिम के जिलों में फैल चुका है। अलग-अलग नामों से छद्म कंपनियां गठित कर सरकारी कागजों की खानापूर्ति की गई है।
केंद्र सरकार के अधीन डैमों के टेंडर की सरकारी प्रक्रिया में क्या मानक है, कितने रुपये में यह टेंडर कितनी अवधि तक छोड़े गए हैं और इसे जारी करने का पात्रों का आधार क्या है। ऐसे अनगिनत सवालों को जवाब सरकारी फाइलों में ही दफन है। सुपरवाइजर देव प्रकाश से लखनऊ सात फरवरी को लूट न होती तो मछली के धंधे का सच भी सार्वजनिक नहीं होता।
आतंक का सच क्या है!
सुपरवाइजर देव प्रकाश से लखनऊ में साढे़ चार लाख की लूट हुई थी। केेंद्र सरकार के निर्देशों के बावजूद कैसे इतना बड़ा भुगतान नकद किया गया। मछली की बिक्री के लिए क्या प्रदेश के वाणिज्य कर विभाग में कंपनी का पंजीकरण है। आमदनी के लिहाज से क्या ठेका हासिल करने वाली कंपनियां कोई कर राजस्व में अदा करती है। ठेकेदारों का यह झूठ खुद जगजाहिर हो गया है, क्योंकि लखनऊ एसएसपी को दी गई तहरीर में लूटी गई रकम तीन लाख की दिखाई गई है। देव प्रकाश के परिवार से साढे़ चार लाख रुपये वसूलने का आतंक फैलाया गया।