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चाइनीज उत्पादों के विरोध में चमका ‘चाक’  

Tue, 25 Oct 2016 01:02 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर Updated Tue, 25 Oct 2016 01:02 AM IST
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Resist Chinese products
चाक पर दीये बनाते कुम्हार। - फोटो : अमर उजाला
चाइनीज उत्पादों पर मुखरता की वजह से कुम्हारों के चाक पर दीये की चमक बढ़ गई है। मिट्टी के दीये जगमग दीपावली पर्व में सुख-सृमद्धि के प्रतीक हैं, मगर बीते कई सालों में चीन निर्मित बिजली के दीये और झालरों की बढ़ती बिक्री ने चाक और मिट्टी से जुड़े परिवारों में निराशा भर रखी है। अबकी बार कुम्हारों को ज्यादा दीये बिकने की उम्मीदें जग गई है।
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सदियों से दीप पर्व पर मिट्टी के दिए पूजने और सजाने की संस्कृति है। हालांकि त्योहारों पर छाई आधुनिकता में मिट्टी के दीयों की बिक्री को कम कर दिया है। वर्ष 2011 के बाद भारतीय बाजारों में चाइनीज झालरों, रंगीन मोमबत्तियों और टिमटिमाते बिजली के दीयों की खपत बढ़ी, तो कुम्हारों के चाक पर मिट्टी से आकार लेते दीयों का निर्माण घटता गया।
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चाइनीज दिवाली सामग्री का प्रयोग नहीं करने की मुहिम ने एकाएक मिट्टी के दीपक की चमक बढ़ा दी है। पिछले एक माह से जिले भर में कुम्हार दीये, कुल्हों और बड़े दीपक बनाने में जुटे हैं। गली-मौहल्लों में फेरी लगा कर दीयों को बेचने के लिए आवाजे लगने लगी है। 
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कुंभकार सुमेरचंद का भगत सिंह रोड पर पुश्तैनी काम है। वह बताते हैं कि बीते पांच साल में लगातार मिट्टी के दीयों की मांग घटी है। रस्म अदायगी के लिए दीपावली पर्व पर दिये खरीदे जाते हैं, क्योंकि साज सज्जा में चाइनीज उत्पादों का वर्चस्व बढ़ गया है। दीयों के काम में अब मुनाफा भी कम पड़ता है। उम्मीद है कि अबकी बार दीपावली पर ज्यादा दीयों की बिक्री हो जाएगी। 

रामलीला टिल्ला के दलबीर कहते है कि मिट्टी की बुग्गी करीब 600 रुपये की मिलती है। काम घटने की वजह से बड़े चाक नहीं लगते। जितनी मेहनत है, कुम्हार को उतना लाभ नहीं मिलता। क्वालिटी के हिसाब से 50 से 70 रुपये प्रति सैकड़ा दीये बिक रहे हैं। दीये की मिट्टी तैयार करती रेखा बताती हैं कि इस बार ज्यादा दीये बिकने की उम्मीद में पूरा परिवार दीपक बनाने में जुटा है।      


इलेक्ट्रॉनिक चाक पर बनने लगे दीये
बिजली के चाक पर दीये बनाना आसान हो गया है। बाग जानकीदास के जितेंद्र और मोहित प्रजापति कहते हैं कि एक दिन में दो हजार तक दीपक तैयार हो जाते हैं, लेकिन बिजली बिल महंगा पड़ता है। त्योहारों पर दीये और अन्य मिट्टी के सामान की डिमांड घटने से नई पीढ़ी की इस पुश्तैनी कला में रुचि घट गई है। बरवाला के राजवीर प्रजापति का कहना है कि कुम्हार जाति के लाखों परिवार मिट्टी के काम से जुड़े हैं, यदि दीयों का प्रयोग बढ़ेगा तो गरीब के घर में खुशी के दीपक जलेेंगे।
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