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थानों से मांगा मुकदमों का रिकार्ड
ब्यूरो, अमर उजाला/मुजफ्फरनगर।
Updated Sat, 24 Mar 2018 12:23 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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मुजफ्फरनगर और शामली दंगे के दौरान दर्ज हुए 131 मुकदमों की वापसी प्रक्रिया के संबंध में शासन से रिपोर्ट मांगे जाने के बाद प्रशासन रिपोर्ट तैयार करने में जुटने गया है। ज्येष्ठ अभियोजन अधिकारी (एसपीओ) ने हिंसा ग्रस्त थाना क्षेत्रों को पत्रावली भेजनी प्रारंभ कर दी है।
थानों के पैरोकार भी अदालतों में दंगा मुकदमों की मौजूदा स्थिति की रिपोर्ट तैयार करने में जुट गए हैं। दंगे के अधिकांश मुकदमों में सेशन ट्रायल शुरू हो गया है। कुछ मुकदमे अभी निचली अदालत में विचाराधीन है। भाजपा सरकार के फैसले से राजनीति में हलचल मची हुई है।
शासन ने वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर और शामली दंगे से जुड़े सभी 131 मुकदमों की वर्तमान स्थिति पर प्रशासन से 13 बिंदुओं पर रिपोर्ट मांगी है। जिन मामलों में शासन ने रिपोर्ट तलब की है, उनमें मुजफ्फरनगर के 128 और शामली के तीन मुकदमे है। ये अधिकांश लूटपाट, आगजनी, तोड़फोड़, डकैती, बलवा आदि धाराओं में पंजीकृत है।
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सात सितंबर 2013 को हुए दंगे के बाद तत्कालीन सपा सरकार ने दंगे के मुकदमों की जांच का जिम्मा एसआईटी को सौंपा था। दंगा प्रभावित शाहपुर, फुगाना, भौराकलां, मंसूरपुर, मीरापुर, भोपा, शहर कोतवाली, तितावी थानों में ज्यादातर मुकदमे दर्ज किए गए थे।
पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री एवं सांसद डॉ संजीव बालियान, भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत के नेतृत्व में खाप चौधरियों एवं भाजपा विधायकों का प्रतिनिधिमंडल पांच फरवरी को लखनऊ में सीएम योगी आदित्यनाथ से मिला था। इसी के बाद विशेष सचिव राजेश सिंह ने 23 फरवरी को मुजफ्फरनगर और शामली के डीएम को यह पत्र भेजा था, जिसमें प्रशासन से 131 मुकदमों की वर्तमान स्थिति रिपोर्ट मांगी है। डीएम राजीव शर्मा के निर्देश पर एसपीओ ने शुक्रवार को मुजफ्फरनगर दंगे से जुड़े मुकदमों की मौजूदा रिपोर्ट संबंधित थानों से जुटाने के लिए एसएसपी अनंत देव को पत्रावली भेजनी शुरू कर दी है।
आसान नहीं है सभी मुकदमों की वापसी
मुजफ्फरनगर। शासन ने दंगे के 131 मुकदमों की वस्तुस्थिति की रिपोर्ट तैयार करने के लिए प्रशासन को पूरा वक्त दिया है। विशेष सचिव के पत्र में कही भी दंगा मुकदमों की अद्यतन स्थिति रिपोर्ट भेजने के लिए कोई समयावधि तय नहीं की गई है। ऐसे में पूरी प्रक्रिया में लंबा समय लगना तय माना जा रहा है।
मुकदमों की वापसी के लिए केस डायरी और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद एसएसपी का स्पष्ट मत और जिलाधिकारी को मुकदमे वापसी में जनहित के दृष्टिगत अपना मत देना होगा। सभी मुकदमों की वापसी के संबंध में आख्या देना भी आसान नहीं हैै।सभी बिंदुओं पर ब्योरा जुटाने के बाद एसएसपी को स्पष्ट रिपोर्ट लगानी है और उसके बाद डीएम को वाद वापसी के संबंध में जनहित दृष्टिगत अपना मत स्पष्ट करना है।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे पहले एसपीओ और एपीओ की टीम के लिए सभी थानों से मुकदमों का ब्योरा जुटाना होगा। सबसे बड़ी जिम्मेदारी अभियोजन अधिकारी द्वारा केस डायरी में उपलब्ध सामान का परीक्षण और साक्ष्य का विश्लेषण किया जाना है। एसपीओ के लिए मुकदमों में अपनी रिपोर्ट देना भी पेचिदगी भरा होगा। डीजीसी फौजदारी और सहायक जिला शासकीय अधिवक्ताओं के गहन मंथन के बाद ही मुकदमे वापसी की रिपोर्ट का आधार बनेगा। आखिरी दो बिंदु सबसे अहम है, जिसमें एसएसपी को अपना स्पष्टीकरण देना है। जनहित के दृष्टिगत डीएम का स्पष्ट मत मुकदमे वापसी की पत्रावली पर दर्ज होने के बाद ही रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी।
एसआईटी ने सुनी नहीं, मुकदमों में हो गई नामजदगी
बुढ़ाना। दंगे के मुकदमों की वापसी को लेकर शासन की कार्रवाई के बाद फर्जी तरीके से नामजद किए गए लोगों में आशा की उम्मीद जगी है। दंगा प्रभावित ग्रामों में बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को नामजद कर दिया गया था, जो हिंसा के दिन गांव में मौजूद नहीं थे। कहीं रंजिशन तो कहीं राजनीति के चलते मुकदमों में नामजदगी कराई गई। योगी सरकार के फैसले पर दंगे के आरोपियों ने अपना दर्द बयां किया।
फुगाना गांव के पूर्व प्रधान हरपाल सिंह की उम्र 65 साल हो चुकी है। दंगे के दौरान उनके गांव में हिंसा भड़की थी। उस दिन वह अपनी रिश्तेदारी में गया था। रंजिश की वजह से उसका नाम मुकदमे में लिखवा दिया गया। गलत नामजदगी के कारण उसे जेल जाना पड़ा। इसी गांव के सुनील पुत्र ब्रह्म सिंह का कहना है कि दंगे का दंश उन्हें झेलना पड़ा। उन्हें गलत तरीके से मुकदमे में फंसा दिया गया। प्रशासन ने भी उनकी नहीं सुनी। भौराकलां थाना क्षेत्र के गांव मौहम्मदपुर रायसिंह निवासी प्रवीण का कहना है कि गांव में जिस दिन हिंसा हुई वह मेरठ के प्राइवेट हॉस्पिटल में था। अस्पताल की सीसीटीवी फुटेज भी एसआईटी को प्रस्तुत की, लेकिन उसे भी आरोपी बना दिया गया।
मुजफ्फरनगर। दंगे के मुकदमे वापसी की पूरी प्रक्रिया पर कानूनविद की राय है कि सीआरपीसी की धारा 321 के तहत कोर्ट को ही अंतिम फैसला करना है। सरकार विचाराधीन मुकदमों में अदालतों में वापसी को लेकर अपना पक्ष रखेगी। मुकदमों के वर्तमान तथ्यों और गवाह पक्ष को जानने पर कोर्ट की निगाहें रहेगी।
कोर्ट का फैसला ही होगा अंतिम
पूर्व डीजीसी फौजदारी राजेंद्र सिंह पंवार ने बताया कि दंगे के मुकदमों की पूरी रिपोर्ट तैयार होने के बाद यह संज्ञान में आएगा कि कौन-कौन से मुकदमे वापस हो सकते है। शासन स्तर पर तय होने के बाद सूची डीएम को आएगी। फिर एसपीओ और डीजीसी को संबंधित वाद सौंपे जाएंगे। इसके बाद एपीओ, एडीजीसी संबंधित कोर्ट में वाद वापस के प्रार्थनापत्र देंगे।
इन प्रार्थना पत्रों में सीआरपीसी की धारा 321 की शर्तों को पूरा करना होगा। तब वाद वापस का अंतिम निर्णय अदालत ही करेगी। फौजदारी के पूर्व डीजीसी नरेश कुमार शर्मा ने कहा कि वापसी की प्रक्रिया जटिल है, क्योंकि 131 मुकदमे कोर्ट में विचाराधीन है। जिनके साक्ष्य सहित ज्यादातर गवाहों के बयान हो चुके है। राज्य सरकार के पास मुकदमे वापसी का अधिकार है, मगर अंतिम फैसला कोर्ट को ही लेना होगा है। पूर्व सांसद कादिर राना के खिलाफ दर्ज मुकदमे को तत्कालीन प्रदेश सरकार ने वापसी के लिए प्रक्रिया पूरी की थी, लेकिन कोर्ट ने इंकार कर दिया था।
भाजपा का राजनीतिक स्टंट मुकदमे वापस करने की बात
प्रदेश सरकार द्वारा दंगे के मुकदमे वापिस लिये जाने की प्रक्रिया को विपक्षी नेताओं ने स्टंट बताया है। बीजेपी वापसी की प्रक्रिया कम प्रचारित ज्यादा कर रही है। लोकसभा चुनाव से पहले अपने पक्ष में माहौल बनाना चाहती है। कांग्रेस नेता एवं पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक का कहना है कि भाजपा इस इश्यू को उलझा रही है। जानबूझकर प्रचारित कर रही है, जिससे कुछ लोग इसका विरोध करें। जिले की जनता भाईचारा चाहती है, इसके लिए प्रयास हुए हैं, भाजपा इस भाईचारे पर सवालिया निशान लगाना
चाहती है। बीजेपी के नेता दंगे को लेकर उत्तेजक ब्यान दे रहे हैं। हम लोग पहले से ही बहुत घायल हैं, लोगों को उकसा ओर घायल न करें। मुकदमे वापसी करना अभी तक तो केवल राजनीतिक स्टंट ही नजर आता है।
रालोद जिलाध्यक्ष अजीत राठी का कहना है कि बीजेपी ने कैराना लोकसभा चुनाव को देखते हुए यह शिगूफा छोड़ा है। जनता सब समझ चुकी है, इन्हें करना कुछ नहीं है, प्रचार अधिक करना है। मुकदमे वापस लेने की बात भाजपा की राजनीतिक चाल है। होने वाला कुछ नहीं है।
सपा के जिलाध्यक्ष गौरव स्वरुप का कहना है कि सरकार सबकी होती है। उसके लिए सभी जाति और धर्म के लोग बराबर होते हैं। यदि मुकदमे वापस करने है तो दोनो पक्षों से वापिस करो। हालांकि गंभीर धाराओं के मुकदमे सरकार वापिस ले पायेगी इसमें संशय है। कानून पेचीदगी बहुत सी है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी दंगों के मुद्दे को लेकर माहौल बनाना चाहती है।
बसपा के जिलाध्यक्ष प्रेमचंद गौतम का कहना है कि भाजपा सरकार दंगों के मुकदमे वापिस लेने को केवल ड्रामेबाजी कर रही है। सरकार को मुकदमे वापस लेने हैं तो सबके ले ले। दोनो पक्ष तैयार भी हो जाएंगे। भाजपा केवल लोकसभा चुनाव के कारण स्टंटबाजी कर रही है।
भाजपा का चुनावी पैतरा : गुलाम मौहम्मद
मुजफ्फरनगर। भारतीय किसान मजदूर मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष गुलाम मौहम्मद जौला ने कहा कि हिंदू और मुस्लिमों ने दंगे के मुकदमों को लेकर आपसी समझौते की पहल पहले ही शुरू कर दी है। प्रदेश की भाजपा सरकार ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए माहौल बनाने को मुकदमे वापसी का ढोंग किया है। दंगा जिले के लिए दुर्भाग्यपूर्ण था। हिंदू और मुस्लिमों को बराबर दर्द झेलना पड़ा। सौहार्द और भाईचारे से ही समाज खड़ा होगा। खाप चौधरियों के साथ मुस्लिमों की अनेक पंचायतें हो चुकी है, जिसमें दोनों पक्षों को मुकदमों पर सहमति बनाने की पहल की गई है। भाजपा के नेताओं को समझौते की प्रक्रिया चुनावी नुकसान दिखाई दी, इसीलिए सीएम से मिलकर मुकदमे वापसी का शासन से पत्र मुजफ्फरनगर और शामली के डीएम को भिजवा दिया गया। यह केवल आगामी संसदीय चुनाव को लेकर भाजपा का चुनावी पैतरा है।
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थानों के पैरोकार भी अदालतों में दंगा मुकदमों की मौजूदा स्थिति की रिपोर्ट तैयार करने में जुट गए हैं। दंगे के अधिकांश मुकदमों में सेशन ट्रायल शुरू हो गया है। कुछ मुकदमे अभी निचली अदालत में विचाराधीन है। भाजपा सरकार के फैसले से राजनीति में हलचल मची हुई है।
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शासन ने वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर और शामली दंगे से जुड़े सभी 131 मुकदमों की वर्तमान स्थिति पर प्रशासन से 13 बिंदुओं पर रिपोर्ट मांगी है। जिन मामलों में शासन ने रिपोर्ट तलब की है, उनमें मुजफ्फरनगर के 128 और शामली के तीन मुकदमे है। ये अधिकांश लूटपाट, आगजनी, तोड़फोड़, डकैती, बलवा आदि धाराओं में पंजीकृत है।
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सात सितंबर 2013 को हुए दंगे के बाद तत्कालीन सपा सरकार ने दंगे के मुकदमों की जांच का जिम्मा एसआईटी को सौंपा था। दंगा प्रभावित शाहपुर, फुगाना, भौराकलां, मंसूरपुर, मीरापुर, भोपा, शहर कोतवाली, तितावी थानों में ज्यादातर मुकदमे दर्ज किए गए थे।
पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री एवं सांसद डॉ संजीव बालियान, भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत के नेतृत्व में खाप चौधरियों एवं भाजपा विधायकों का प्रतिनिधिमंडल पांच फरवरी को लखनऊ में सीएम योगी आदित्यनाथ से मिला था। इसी के बाद विशेष सचिव राजेश सिंह ने 23 फरवरी को मुजफ्फरनगर और शामली के डीएम को यह पत्र भेजा था, जिसमें प्रशासन से 131 मुकदमों की वर्तमान स्थिति रिपोर्ट मांगी है। डीएम राजीव शर्मा के निर्देश पर एसपीओ ने शुक्रवार को मुजफ्फरनगर दंगे से जुड़े मुकदमों की मौजूदा रिपोर्ट संबंधित थानों से जुटाने के लिए एसएसपी अनंत देव को पत्रावली भेजनी शुरू कर दी है।
आसान नहीं है सभी मुकदमों की वापसी
मुजफ्फरनगर। शासन ने दंगे के 131 मुकदमों की वस्तुस्थिति की रिपोर्ट तैयार करने के लिए प्रशासन को पूरा वक्त दिया है। विशेष सचिव के पत्र में कही भी दंगा मुकदमों की अद्यतन स्थिति रिपोर्ट भेजने के लिए कोई समयावधि तय नहीं की गई है। ऐसे में पूरी प्रक्रिया में लंबा समय लगना तय माना जा रहा है।
मुकदमों की वापसी के लिए केस डायरी और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद एसएसपी का स्पष्ट मत और जिलाधिकारी को मुकदमे वापसी में जनहित के दृष्टिगत अपना मत देना होगा। सभी मुकदमों की वापसी के संबंध में आख्या देना भी आसान नहीं हैै।सभी बिंदुओं पर ब्योरा जुटाने के बाद एसएसपी को स्पष्ट रिपोर्ट लगानी है और उसके बाद डीएम को वाद वापसी के संबंध में जनहित दृष्टिगत अपना मत स्पष्ट करना है।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे पहले एसपीओ और एपीओ की टीम के लिए सभी थानों से मुकदमों का ब्योरा जुटाना होगा। सबसे बड़ी जिम्मेदारी अभियोजन अधिकारी द्वारा केस डायरी में उपलब्ध सामान का परीक्षण और साक्ष्य का विश्लेषण किया जाना है। एसपीओ के लिए मुकदमों में अपनी रिपोर्ट देना भी पेचिदगी भरा होगा। डीजीसी फौजदारी और सहायक जिला शासकीय अधिवक्ताओं के गहन मंथन के बाद ही मुकदमे वापसी की रिपोर्ट का आधार बनेगा। आखिरी दो बिंदु सबसे अहम है, जिसमें एसएसपी को अपना स्पष्टीकरण देना है। जनहित के दृष्टिगत डीएम का स्पष्ट मत मुकदमे वापसी की पत्रावली पर दर्ज होने के बाद ही रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी।
एसआईटी ने सुनी नहीं, मुकदमों में हो गई नामजदगी
बुढ़ाना। दंगे के मुकदमों की वापसी को लेकर शासन की कार्रवाई के बाद फर्जी तरीके से नामजद किए गए लोगों में आशा की उम्मीद जगी है। दंगा प्रभावित ग्रामों में बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को नामजद कर दिया गया था, जो हिंसा के दिन गांव में मौजूद नहीं थे। कहीं रंजिशन तो कहीं राजनीति के चलते मुकदमों में नामजदगी कराई गई। योगी सरकार के फैसले पर दंगे के आरोपियों ने अपना दर्द बयां किया।
फुगाना गांव के पूर्व प्रधान हरपाल सिंह की उम्र 65 साल हो चुकी है। दंगे के दौरान उनके गांव में हिंसा भड़की थी। उस दिन वह अपनी रिश्तेदारी में गया था। रंजिश की वजह से उसका नाम मुकदमे में लिखवा दिया गया। गलत नामजदगी के कारण उसे जेल जाना पड़ा। इसी गांव के सुनील पुत्र ब्रह्म सिंह का कहना है कि दंगे का दंश उन्हें झेलना पड़ा। उन्हें गलत तरीके से मुकदमे में फंसा दिया गया। प्रशासन ने भी उनकी नहीं सुनी। भौराकलां थाना क्षेत्र के गांव मौहम्मदपुर रायसिंह निवासी प्रवीण का कहना है कि गांव में जिस दिन हिंसा हुई वह मेरठ के प्राइवेट हॉस्पिटल में था। अस्पताल की सीसीटीवी फुटेज भी एसआईटी को प्रस्तुत की, लेकिन उसे भी आरोपी बना दिया गया।
मुजफ्फरनगर। दंगे के मुकदमे वापसी की पूरी प्रक्रिया पर कानूनविद की राय है कि सीआरपीसी की धारा 321 के तहत कोर्ट को ही अंतिम फैसला करना है। सरकार विचाराधीन मुकदमों में अदालतों में वापसी को लेकर अपना पक्ष रखेगी। मुकदमों के वर्तमान तथ्यों और गवाह पक्ष को जानने पर कोर्ट की निगाहें रहेगी।
कोर्ट का फैसला ही होगा अंतिम
पूर्व डीजीसी फौजदारी राजेंद्र सिंह पंवार ने बताया कि दंगे के मुकदमों की पूरी रिपोर्ट तैयार होने के बाद यह संज्ञान में आएगा कि कौन-कौन से मुकदमे वापस हो सकते है। शासन स्तर पर तय होने के बाद सूची डीएम को आएगी। फिर एसपीओ और डीजीसी को संबंधित वाद सौंपे जाएंगे। इसके बाद एपीओ, एडीजीसी संबंधित कोर्ट में वाद वापस के प्रार्थनापत्र देंगे।
इन प्रार्थना पत्रों में सीआरपीसी की धारा 321 की शर्तों को पूरा करना होगा। तब वाद वापस का अंतिम निर्णय अदालत ही करेगी। फौजदारी के पूर्व डीजीसी नरेश कुमार शर्मा ने कहा कि वापसी की प्रक्रिया जटिल है, क्योंकि 131 मुकदमे कोर्ट में विचाराधीन है। जिनके साक्ष्य सहित ज्यादातर गवाहों के बयान हो चुके है। राज्य सरकार के पास मुकदमे वापसी का अधिकार है, मगर अंतिम फैसला कोर्ट को ही लेना होगा है। पूर्व सांसद कादिर राना के खिलाफ दर्ज मुकदमे को तत्कालीन प्रदेश सरकार ने वापसी के लिए प्रक्रिया पूरी की थी, लेकिन कोर्ट ने इंकार कर दिया था।
भाजपा का राजनीतिक स्टंट मुकदमे वापस करने की बात
प्रदेश सरकार द्वारा दंगे के मुकदमे वापिस लिये जाने की प्रक्रिया को विपक्षी नेताओं ने स्टंट बताया है। बीजेपी वापसी की प्रक्रिया कम प्रचारित ज्यादा कर रही है। लोकसभा चुनाव से पहले अपने पक्ष में माहौल बनाना चाहती है। कांग्रेस नेता एवं पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक का कहना है कि भाजपा इस इश्यू को उलझा रही है। जानबूझकर प्रचारित कर रही है, जिससे कुछ लोग इसका विरोध करें। जिले की जनता भाईचारा चाहती है, इसके लिए प्रयास हुए हैं, भाजपा इस भाईचारे पर सवालिया निशान लगाना
चाहती है। बीजेपी के नेता दंगे को लेकर उत्तेजक ब्यान दे रहे हैं। हम लोग पहले से ही बहुत घायल हैं, लोगों को उकसा ओर घायल न करें। मुकदमे वापसी करना अभी तक तो केवल राजनीतिक स्टंट ही नजर आता है।
रालोद जिलाध्यक्ष अजीत राठी का कहना है कि बीजेपी ने कैराना लोकसभा चुनाव को देखते हुए यह शिगूफा छोड़ा है। जनता सब समझ चुकी है, इन्हें करना कुछ नहीं है, प्रचार अधिक करना है। मुकदमे वापस लेने की बात भाजपा की राजनीतिक चाल है। होने वाला कुछ नहीं है।
सपा के जिलाध्यक्ष गौरव स्वरुप का कहना है कि सरकार सबकी होती है। उसके लिए सभी जाति और धर्म के लोग बराबर होते हैं। यदि मुकदमे वापस करने है तो दोनो पक्षों से वापिस करो। हालांकि गंभीर धाराओं के मुकदमे सरकार वापिस ले पायेगी इसमें संशय है। कानून पेचीदगी बहुत सी है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी दंगों के मुद्दे को लेकर माहौल बनाना चाहती है।
बसपा के जिलाध्यक्ष प्रेमचंद गौतम का कहना है कि भाजपा सरकार दंगों के मुकदमे वापिस लेने को केवल ड्रामेबाजी कर रही है। सरकार को मुकदमे वापस लेने हैं तो सबके ले ले। दोनो पक्ष तैयार भी हो जाएंगे। भाजपा केवल लोकसभा चुनाव के कारण स्टंटबाजी कर रही है।
भाजपा का चुनावी पैतरा : गुलाम मौहम्मद
मुजफ्फरनगर। भारतीय किसान मजदूर मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष गुलाम मौहम्मद जौला ने कहा कि हिंदू और मुस्लिमों ने दंगे के मुकदमों को लेकर आपसी समझौते की पहल पहले ही शुरू कर दी है। प्रदेश की भाजपा सरकार ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए माहौल बनाने को मुकदमे वापसी का ढोंग किया है। दंगा जिले के लिए दुर्भाग्यपूर्ण था। हिंदू और मुस्लिमों को बराबर दर्द झेलना पड़ा। सौहार्द और भाईचारे से ही समाज खड़ा होगा। खाप चौधरियों के साथ मुस्लिमों की अनेक पंचायतें हो चुकी है, जिसमें दोनों पक्षों को मुकदमों पर सहमति बनाने की पहल की गई है। भाजपा के नेताओं को समझौते की प्रक्रिया चुनावी नुकसान दिखाई दी, इसीलिए सीएम से मिलकर मुकदमे वापसी का शासन से पत्र मुजफ्फरनगर और शामली के डीएम को भिजवा दिया गया। यह केवल आगामी संसदीय चुनाव को लेकर भाजपा का चुनावी पैतरा है।